| मुफ्त की देशभक्ति |
| संजय दृष्टि | ||
| गुरुवार , , 27 सितम्बर | ||
अगर दूसरा के पैसों से पुण्य कमाने को मिले तो कौन बेवकूफ नहीं कमाना चाहेगा? और नालायक धूर्त लोग दूसरों की सफलता को अपने कंधों पर उठाने से भी नहीं चुकते.
यही दो बातें हुई भारत की शानदार जीत के साथ लौटी भारतीय टीम के साथ. भारत जीत के जश्न में डूबा हुआ था तब क्षेत्रीय नेता युवा खिलाड़ीयों की सफलता को भुनाने पर तुले हुए थे. पैसा जनता का था, लुटाते हुई कैसे शर्म? सब जानते है इन खिलाड़ीयों पर वैसे ही पैसों की बरसात होने वाली है फिर इन पर जनता का धन लुटाना समझ से बाहर था. वह भी देशभक्ति के नाम पर. ऐसी देशभक्ति भी समझ से बाहर है. यह पैसा अन्य खेलों के खिलाड़ीयों पर लुटाये जाते तो अच्छा था, जहाँ के खेल संघ अभी सरकारी शिकंजे में होने से इन खेलों की दुर्दशा हो रखी है. जो बीसीसीआई अभी तक 20-20 क्रिकेट खिलाने के लिए ही तैयार नहीं थी(नई चीज का पहले बहिष्कार करना भारतीय स्वभाव है) और जब मजबूरी में खिलाना ही पड़ा तो अपने अंग्रेजी में गिटपिटाते महान खिलाड़ीयों को इससे बाहर ही रखा. उसे अपनी टीम से उम्मीदें भी नहीं थी. वो तो ज्यादातर छोटे शहरों से आये युवकों के जोश को मौका मिल गया और ऑस्ट्रेलिया जसी दंभी और पाकिस्तानी जैसी घर्मजनूनी टीमों को कुचलते हुए विजेता बन गये. बीसीसीआई को खिसयाना चाहिए था, उसकी जगह खिलाड़ीयों की जीत को अपने सर लेते हुए अग्रीम पंक्ति में विराजमान हो गए. आखिर नेता है, इनके धंधे में शर्म नहीं होती. बहरहाल खेल खेल होता है और जीत जीत होती है. इन दो चीजों को छोड़ दें तो जीत का जश्न मनाया ही जाना चाहिए और हाँ, हिन्दी पहली बार विजेता की भाषा बनी. मुबारक हो.
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टिप्पणियाँ
(4)
द्वारा प्रेषित mamta , सितम्बर 27, 2007
धोनी ने हिन्दी में बोलकर हिंदुस्तान यानी देश को उपर रखा है.
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द्वारा प्रेषित श्रीश शर्मा , सितम्बर 27, 2007 आखिर नेता है, इनके धंधे में शर्म नहीं होती. बस जी, हमारे कहने के लिए कुछ बचा ही नहीं। report abuse
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द्वारा प्रेषित समीर लाल , सितम्बर 28, 2007
संजय जी
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आप बहुत गहन चिंतन करते हैं. कई बार डर लगता है कि कहीं रक्तचाप जैसा कुछ न परेशान करे आपको. वैसे हिन्दी की विजय है, इस बात की बहुत खुशी है. आप भी ज्यादा चिंतित न हुआ करें. हम हैं न!! report abuse
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द्वारा प्रेषित Ravindra Ranjan , अक्टूबर 05, 2007
अपने यहां हाल कुछ ऐसा है कि जब लोग जीत के खुमार में डूबे होते हैं तो सारे खिलाड़ियों को सर आंखों पर बिठी लेते हैं। जैसे ही हार सामने आते है वही खिलाड़ी बेकार हो जाते हैं। लेकिन ऐसा सिर्फ क्रिकेट में ही होता है। दूसरे खेल से जुड़ी प्रतिभाओं को तो न पैसे मिल पाते हैं न ही नाम। अगर उन्हें ये सब मिलता भी है तो काफी संघर्ष के बाद और अपने बलबूते पर। जबकि क्रिकेट खिलाड़ियों का समर्थन करने वाले बड़ी तादात में हैं। कभी क्षेत्र के नाम पर तो कभी किसी के नाम पर। हालिया उदाहरण सहवाग का ही ले लें। जाटों ने कहा है कि वो सहवाग की टीम में वापसी के लिये प्रदर्शन करेंगे। क्या कभी दूसरे खेलों के लिये ऐसे लोग सामने आतें हैं। यकीनन नहीं।
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