14 अगस्त 1947 को भारत विभाजित हुआ और पूर्व और पश्चिम में एक नए देश पाकिस्तान ने जन्म लिया. पाकिस्तान के कायदे आज़म मोहम्मद अली जिन्नाह का सपना या हठ जो भी समझें वो साकार हुआ. जिन्नाह पाकिस्तान को मुस्लिम राष्ट्र बनाना चाहते थे, लेकिन वे उसे एक ऐसे देश के रूप में प्रचारित करना चाहते थे जो सभी धर्मों के अनुयायियों को समान दृष्टि से देखता हो.
नया देश बनने के साथ ही देश के लिए विभिन्न चिन्ह और प्रतीक चुनने का काम भी शुरू हुआ. देश का झंडा पहले ही तैयार हो चुका था, लेकिन राष्ट्र-गीत नही बना था. आज़ादी के समय पाकिस्तान के पास कोई राष्ट्र-गीत नही था. इसलिए जब भी ध्वज वन्दन होता " पाकिस्तान जिन्दाबाद, आज़ादी पैन्दाबाद" के नारे लगते थे.
मोहम्मद अली जिन्नाह को यह मंज़ूर नही था. वे चाहते थे कि पाकिस्तान के राष्ट्र-गीत को रचने का काम शीघ्र ही पूरा करना चाहिए. उनके सलाह कारों ने उनको अनेकों जानेमाने उर्दू शायरों के नाम सुझाए जो गीत रच सकते थे. लेकिन जिन्नाह की सोच कुछ ओर ही थी. उन्हें लगा कि दुनिया के समक्ष पाकिस्तान की धर्मनिरपेक्ष छवि स्थापित करने का यह अच्छा मौका है. इसलिए उन्होने लाहौर के महानउर्दू शायर और मूल हिन्दू जगन्नाथ आज़ाद को कहा कि "मैं आपको पाँच दिन का ही समय दे सकता हुं, आप पाकिस्तान के लिए राष्ट्र-गीत लिखें". जगन्नाथ आज़ाद अचम्भित भी थे और खुश भी थे. लेकिन पाकिस्तान के कट्टरपंथी नेता इससे बहुत नाराज़ हुए कि एक हिन्दू पाकिस्तान का राष्ट्र-गीत लिखेगा. लेकिन जिन्नाह की मर्ज़ी के आगे वे बेबस थे.
आखिरकार जगन्नाथ आज़ाद ने पाँच दिनों के अंदर राष्ट्र-गीत तैयार कर लिया जो जिन्नाह को बहुत पसंद आया. गाने के बोल थे -
ऐ सरज़मी ए पाक
जर्रे तेरे हैं आज
सितारो से तबनक
रोशन है कहकशाँ से कहीं
आज तेरी खाक
जिन्नाह ने इसे राष्ट्र-गीत के रूप मे मान्यता दी और उनकी मृत्यु तक यही गीत राष्ट्र-गीत बना रहा. लेकिन इस गीत की स्वीकृति के महज 18 महीने बाद ही जिन्नाह का देहांत हो गया और उनके साथ ही राष्ट्र-गीत की मान्यता भी खत्म कर दी गई. जगन्नाथ आज़ाद बाद में भारत चले आए.
जिन्नाह की मृत्यु के बाद पाकिस्तान सरकार ने एक राष्ट्र-गीत कमेटी बनाई. और जाने माने शायरो के पास से गीत के नमूने मंगवाए. लेकिन कोई भी गीत राष्ट्र-गीत के लायक नही बन पा रहा था.
आखिरकार पाकिस्तान सरकार ने 1950 मे अहमद चागला द्वारा रचित धुन को राष्ट्रीय धुन के रूप मे मान्यता दी. उसी समय ईरान के शाह पाकिस्तान की यात्रा पर आए और उन्होने धुन को काफी पसंद किया. यह धुन पाश्चात्य अधिक लगती थी, लेकिन राष्ट्र-गीत कमेटी का मानना था कि इसका यह स्वरूप पाश्चात्य समाज मे अधिक स्वीकृत होगा.
सन 1954 में उर्दू शायर हाफ़िज़ जलन्धरी ने इस धुन के आधार पर एक गीत की रचना की. यह गीत राष्ट्र-गीत कमेटी के सदस्यों को पसंद भी आया. और आखिरकार हाफ़िज़ जलन्धरी का लिखा गीत पाकिस्तान का राष्ट्र-गीत बना, जिसके बोल कुछ इस प्रकार से हैं:
पाक सरज़मी शाद बाद,
किस्वरें हसीँ शाद बाद,
तु निशाने अज़्मे आलीशान
अर्जे पाकिस्तान
मर्केज़े हसीँ शाद बाद .
यह गीत पाकिस्तान का "कौमी तराना" बना और जगन्नाथ आज़ाद का गीत आखिरकार भूला दिया गया.
पाकिस्तान का राष्ट्र-गीत यहाँ सुनें.