| ब्लॉगिंग यानी सच्चा साम्यवाद |
| संजय दृष्टि | ||
| शुक्रवार , , 19 अक्टूबर | ||
श्रेणी : हास्य
रविशकुमार जब भी टीवी के परदे पर चमकते है तब हम सबको बता देते हैं की ये रविश कुमार है, इससे पहले कि वे खुद अपना परिचय दें, “मैं रविशकुमार अलाने फलाने चैनल के लिए”.
क्या है घर वाले खामखां उन्हे हमसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण व्यक्ति मान बैठते है. भई पत्रकार है, टीवी पर भी दिख जाता है. मगर हम ऐसा होने नहीं देते. झट साबित कर देते हैं की हमारी ही तरह ब्लॉगर है, बस. इससे हममें हीन भावना नहीं पनपती की भई हम कुछ भी नहीं है. एक बार हमने किसी विद्वान से पूछा यह साम्यवाद क्या है? तो उन्होने बताया की जब इंजिन बनाने वाले और उसे चलाने वाले को एक ही धरातल पर तौला जाता है समझो साम्यवाद स्थापित हो गया. मैंने कहा अरे! तब तो समझो साम्यवाद का सपना सच हो गया. अच्छा कैसे? अब देखो ज्ञानदत्तजी हैं ना, वो भले ही सैलून में सफर करे और वहीं पर लिखे, मगर लिखते तो चिट्ठा ही है ना. चिट्ठा तो हम भी लिखते है. लो हो गए ना बराबर. कहते हैं अनुप शुक्लाजी देश के लिए बम टाइप कुछ बनाते है. बनाते होंगे, लिखते तो चिट्ठा ही है ना, चिट्ठा तो हम भी लिखते है. हो गए ना बराबर. ये आलोक पौराणिक सॉरी पुराणिक हैं, इनके मस्त चमचमाते दाँत हैं और दाँत माँजने से समय मिल जाये तो लिख भी लेते है. इधर उधर छप भी जाते हैं, लोग वाह वाह भी करते हैं. तो क्या? लिखते तो चिट्ठा ही है ना, चिट्ठा तो हम भी लिखते है. हो गए बराबर. वे कैनेडा रहते हैं, मजे है. मौज लेते है और कविता भी लिखते है. उन्हे कवि सम्मेलनों में बुलवाया जाता है. बड़े चहेते बने फिरते है, समीरलालजी. मगर करते क्या हैं? चिट्ठा लिखते है. चिट्ठा तो हम भी लिखते है. हो गए बराबर. इनके चर्चे रतलाम से बाहर खूब है. तकनीक पर लिखते हैं, हिन्दी के लिए हाड़मारी भी करते है. टीवी पर जब रवि-रतलामी का इंटरव्यू आता है, हम कहतें है, ये चिट्ठा लिखते हैं जी, वैसे चिट्ठा तो हम भी लिखते है. हो गए बराबर. अब कौन हमारे बराबर होना चाहता है, बताये. अभी नम्बर लगा देते हैं.
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टिप्पणियाँ
(3)
द्वारा प्रेषित श्रीश शर्मा , अक्टूबर 19, 2007
ये सञ्जय भाई हैं, लोग बताते हैं कि अहमदाबाद में इनका बड़ा नाम है, तरकश, छवि वगैरा बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ हैं इनकी। होंगी, लेकिन लिखते तो चिट्ठा ही है ना, चिट्ठा तो हम भी लिखते है, हो गए ना बराबर।
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