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क्या होता है नार्को टेस्ट |
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रोचक तथ्य और जानकारी
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गुरुवार , , 01 नवम्बर |
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Team Tarakash
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अब्दुल करीम तेलगी, साध्वी प्रज्ञा, अबु सलेम... सूची लम्बी है जिन लोगों के नार्को टेस्ट खबरें बन गई हों. इसके अलावा समय समय पर कई अन्य लोगों जैसे कि नरेन्द्र मोदी या मुलायम सिंह यादव का नार्को टेस्ट करवाने की मांगे होती रहती है. आज तक कई अपराधियों का नार्को एनालिसीस टेस्ट हो चुका है, जिससे जाँच अधिकारियों को उनके अपराधों से संबंधित जानकारियाँ प्राप्त करने मे मदद मिलती रही है.
नार्को एनालिसीस टेस्ट मुलत: नार्कोटिक्स से बना है. नार्कोटिक्स यानि नशीले पदार्थ. सन 1922 में एक अमरीकन चिकित्सक रोबर्ट हाउस ने पता लगाया कि यदि कुछ खास रसायनों का मनुष्य द्वारा सेवन किया जाता है तो कुछ समय के लिए उसकी कल्पना शक्ति और विचार शक्ति खत्म हो सकती है. इस प्रकार वह व्यक्ति कुछ भी सोचने और समझने की हालत मे नही रहता है और फिर वह वही कहता है जो सच होता है अथवा जो उसके दिमाग मे होता है.
यदि उसे पता है कि अमुक रूपये किसी बैंक में हैं तो इस बाबत उससे पूछे जाने पर वह तुरंत ही बता देता है कि फँलाने बैंक मे इतने पैसे हैं क्योंकि उसका दिमाग फिर अपने कोषों मे संग्रहित बात को ज्यों का त्यों जारी करने लगता है और उसकी विचार शक्ति उस प्रवाह को रोकने अथवा बदलने मे असमर्थ हो जाती है.
जिस व्यक्ति पर नार्को टेस्ट किया जाता है वह व्यक्ति जो भी बोलता है वह अनायास ही बोलता है यानि कि कुछ भी सोच समझ कर नही बोलता है.
रोबर्ट हाउस ने सबसे पहले टेक्सास की जेल के दो कैदियों पर यह टेस्ट किया था. इसके लिए उसने जिस नार्कोटिक अम्ल का प्रयोग किया वह था स्कोपोलामाइन. उसने स्कोपोलामाइन द्रव्य का थोडा डोज दोनों कैदियों को दिया जिससे वे दोनो नशे की हालत मे आ गए, उसके बाद पुलिस उन्हें अदालत मे ली गई जहाँ उन्होने नशे की हालत मे ही सब कुछ सच सच बता दिया. सारी बातें प्रत्यक्ष रूप से बाहर आने केबावजूद अदालत ने उन्हें बरी कर दिया क्योंकि किसी व्यक्ति का नशे की हालत मे दिया गया बयान मान्य नही हो सकता है.
परंतु इससे उन दोनों कैदियों के द्वारा किए गए गुनाह और उनसे जुडे सबूत जाँच अधिकारियों के सामने आ गए, जिससे उनकी आगे की जाँच आसान हो गई.
नार्को टेस्ट के लिए जिन नशीले पदार्थों का उपयोग किया जाता है उनमे प्रमुख है सोडियम पेंटोथाल, सेकोनाल, सोडियम एमिटोल और स्कोपोलामाइन. ये द्रव ट्रुथ सिरम के रूप मे भी जाने जाते हैं, क्योंकि कहा जाता है कि इनका सेवन करने वाला व्यक्ति सच ही बोलता है.
हालाँकि कई उदाहरण ऐसे भी हैं, जब देखा गया कि किसी व्यक्ति का नार्को टेस्ट करने के दौरान भी उसने झूठ बोला हो. यह सब कुछ निर्भर करता है कि उस व्यक्ति की मानसिक क्षमता और भावनात्मक दृढता कैसी है.
नार्को टेस्ट कानूनी रूप से सबूत के तौर पर तो नही लिए जाते हैं, परंतु किसी अपराध की जाँच में बहुत उपयोगी साबित होते रहे हैं.
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