| पहले घर तो सम्भालें वामदल |
| मंतव्य | ||
| मंगलवार , , 13 नवम्बर | ||
2002 दंगो के बाद की बात है. एक फोटो तब दंगो की पहचान बन गई थी. उस तस्वीर मे एक मुस्लिम युवक था जो हाथ जोडे रो रहा था. दर्द भरी तस्वीर थी. वह गरीब था और दंगों मे सबकुछ गँवा चुका था. वह व्यक्ति बहुत जल्द ही तथाकथित धर्मनिरपेक्ष नेताओं और पत्रकारों का ब्रांड एम्बेसडर बन गया. कोई उसे इधर खींचता कोई उधर. हर कोई उसका हम दर्द बनकर अपनी सेक्युलर छवि को चमकाने मे व्यस्त हो गया. और इस खेल मे सबसे आगे निकले वामदल.
वामदल उस व्यक्ति को अपनी स्वर्ण भूमि पश्चिम बंगाल ले गए. उसे रोज़गार देने का वादा किया गया. उसे विद्यालयों और ना जाने कहाँ कहाँ घुमाया गया. स्वयंसेवी संस्थाओं ने कई प्रेस कोंफ्रेस की. फिर सबकुछ धीरे धीरे भुलाया जाने लगा. दंगो के करीब दो साल बाद अचानक एक खबर पर मेरा ध्यान गया. एक गुजराती अखबार ने लिखा कि वह व्यक्ति रोजी की तलाश मे फिर से अहमदाबाद लौट चुका है. और अब यही रहकर कमा रहा है. बंगाल मे उसे दो वक्त की रोटी भी नसीब नही हुई. पर यह खबर कभी सुर्खी नही बनी. अंदर के पन्नो पर दब कर रह गई. आज भी दंगो के इतने साल बाद वही हाथ जोडे तस्वीर छाई रहती है. आज भी उसे भूनाया जा रहा है. पर किसी को परवाह नही है कि पता करे अब वो व्यक्ति है कहाँ? जो वामपंथी उसे अपने साथ ले गए थे उन्होने भी उसे भूला दिया, या फिर दूसरे शब्दों मे अपना मतलब पूरा होते ही छोड दिया. आज बंगाल के हालत पर तरस आता है. वहाँ व्यापार उद्योग ठप्प है. एक महीने मे चौथी बार बंद हुआ है और जारी है. राजनैतिक दल अपनी रोटियाँ सेकने में लोगों का भविष्य दाँव पर लगा रहे हैं. नन्दीग्राम में कोई माओवादी पुलिस है तो कोई तृणमुल रक्षक है. उनके सामने लाल झंडॆ उठाए मार्क्सवादी हीरो है. वे लोग एक क्रांति ला रहे है. वह क्रांति जो 25 साल से तो नही आ पाई. पर कोशिश जारी है. लोगो के पास खाने को अन्न नही है. राशन की दुकानों पर कर्मठ कामरेड क़ब्ज़ा किए हुए हैं और भ्रष्टाचार सारी सीमाएँ लाँघ कर मुख्य धारा मे शामिल हो गया है. मेरे एक मित्र को बंगाल में अपनी ज़मीन बेचने के लिए एक चौथाई रकम भू माफियाओं को देने पड़ती हैं, कोई शक नही ये लोग किस पार्टी से संबंध रखते हैं. मेरा एक अन्य घनिष्ट बंगाली मित्र जो कि कट्टर वामपंथी है, बंगाल का नाम सुनते ही भड़क जाता है. वह किसी भी किमत पर वहाँ जाना नहीं चाहता. क्योंकि बक़ौल उसके वहाँ कोई ज़िंदग़ी नही है. और वामदलों ने राज्य और क़ानून व्यवस्था का बँटाढार कर रखा है. विकास सिर्फ कागज़ पर ही रह गया है. यह वामपंथियों के स्वर्णिम सपने का बंगाल है. प्रकाश करात का बयान है कि, भारत को अमरीका के साथ संबंध घनिष्ट नही करने चाहिए क्योंकि इससे चीन को खतरा हो सकता है. वैसे करात साहब समझदार व्यक्ति हैं, उन्हें पता होगा कि वे किस देश के नागरिक हैं. शायद उन्हें यह भी पता होगा कि चीन भारत के चारों और सैनिक घेराबंदी कर रहा है और अरुणाचल को अपना प्रदेश बता रहा है. टिप्पणियाँ
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कार्ल मार्क्स ने कहा था- हिंसा क्रांति की जननी है।
चारू मजूमदार ने कहा था- जिसने वर्ग शत्रुओं के खून में अपनी उंगली नहीं डुबाई, उसे कम्युनिस्ट नहीं कहा जा सकता।
साम्यवादी हिंसा ने लगभग दस करोड लोगों को मौत के घाट उतार दिया।
सोवियत संघ - दो करोड मौतें
चीन - साढे छ करोड मौतें
वियतनाम - दस लाख मौतें
लेटिन अमेरिका - डेढ लाख मौतें
उत्तरी कोरिया - बीस लाख मौतें
कम्बोडिया - बीस लाख मौतें
पूर्वी यूरोप - दस लाख मौतें
अफगानिस्तान - पन्द्रह लाख मौतें
अफ्रीका - सत्रह लाख मौतें
केरल, बंगाल में माकपा द्वारा राजनीतिक विरोधियों की हत्या और दर्जन भर राज्यों में पिछले 30 सालों से निरंतर हो रही नक्सली हिंसा का कोई हिसाब किताब नहीं है।
महाश्वेता देवी ने लेख लिखा है- माकपा कार्यकर्ता नंदीग्राम में किसान, मजदूर, महिलाओं की हत्या कर उनका पेट चीरकर तालाब में फेंक देते है ताकि लाश पानी के उपर न आ सके, महिलाओं का बलात्कार कर उन्हें जला देते है,महिलाओं की योनि में रॉड घुसा कर उसे चीर देते है।
दुनिया में साम्यवादी क्रांति कब आएगी।
जेपी ने कहा था- हिंसा का सहारा वे लेते है जिन्हें जनता का विश्वास प्राप्त नहीं होता।
सच में, हिंसा कायरों की विचारधारा है। मार्क्सवादी कायर हैं।