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मौत के सौदागर और भी हैं जावेद साहब? |
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मंतव्य
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बुधवार , , 19 दिसम्बर |
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पंकज बेंगाणी
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सेक्यूलर हैं तो समभाव रखें. जूमले तो सबके लिए बनने चाहिए ना! जब हमाम मे सब नंगे घूम रहे हैं तो लाज किसी एक की ही क्यों लेते हो?
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गुजरात चुनाव शांतिपूर्ण तरीके से सम्पन्न हो चुके हैं और अब सबको इंतजार है चुनावी नतीजों का. इन चुनावों मे मोदी और काँग्रेस दोनों की साख दाँव पर लगी हुई है. इस समय मैं भाजपा और काँग्रेस की जगह मोदी और काँग्रेस की बात लिख रहा हुं, क्योंकि ऐसा पहली बार हुआ है जब यह गुजरात मे यह देखा गया कि पूरी चुनावी प्रक्रिया एक ही आदमी के आसपास घूमती रही.
यदि मोदी जीत जाते है तो उनकी लार्जर देन लाइफ वाली छवि और मजबूत हो जाएगी और यह भाजपा के लिए शुभ संकेत नहीं होंगे. मोदी का भारी बहुमत से जीतना असम्भव लगता है, और काँग्रेस भी किसी लहर पर सवार नहीं है. यानि भाजपा या काँग्रेस कोई भी जीते अनुमान यही है कि बस जैसे तैसे बहुमत पा जाएँगे.
पहले चरण के मतदान तक काँग्रेस की स्थिति काफी अच्छी लग रही थी. उनके विज्ञापन मोदी को घेर रहे थे. भाजपा के बागी मोदी की राह में हजारों रोडे अटका रहे थे. और मोदी हर रोज 10-12 सभाएँ करके अपनी कुर्सी को बचाने मे जी जाने से जुटे थे.
फिर अचानक ही काँग्रेस की नैत्री श्रीमती सोनिया गांधी ने कुछ ऐसा कह दिया जो उनके लिए बुमरेंग साबित हो सकता है. उन्होने गुजरात सरकार (पढें नरेन्द्र मोदी) को "मौत का सौदागर" कह दिया और मोदी को बैठे बिठाए एक जोरदार मुद्दा हाथ लग गया. गुजरात के अधिकांश लोगों को सोनिया का यह बयान पसंद नहीं आया. मोदी को इससे अच्छा मौका और कब मिल सकता था.
दूसरे चरण के मतदान के आते आते भाजपा की स्थिति सुधरती दिख रही है. हालाँकि अभी पक्के तौर पर कुछ कहा नही जा सकता परंतु यदि मोदी वाकई में जीत जाते हैं तो विश्लेषक जो कारण जताएंगे उनमें से एक सोनिया गांधी का मौत के सौदागर वाला बयान भी होगा.
आज समाचार पत्र में पढा कि आखिर इस मौत के सौदागर वाले जूमले का आविष्कार किसने किया? कई नामों मे सबसे प्रमुख नाम है मोदी के घोर विरोधी मशहूर शायर और गीतकार जावेद अख्तर का. जावेद साहब अपने वामपंथी प्रेम को भी स्विकार करते रहे हैं. उनसे जब पूछा गया कि क्या आपने यह जूमला बनाया तो उनका कहना था कि यह तो बहुत साधारण जूमला है, सोनियाजी ने उनसे यह मौका छीन लिया. वे तो इससे भी कडे शब्दों का प्रयोग करते.
ठीक बात है. गलत चीज का विरोध होना भी चाहिए. और कडे से कडे शब्दों से भर्त्सना भी होनी चाहिए. लेकिन सोच रहा हुँ कि जावेद साहब को कुछ जूमले बंगाल सरकार के लिए क्यों नहीं बनाने चाहिए? हर दिन बंगाल के नंदीग्राम की जिस मिट्टी से लोगों की लाशें निकल रही है उस मिट्टी की सुध लेने तो कोई नही गया कम से कम भर्त्सना तो करनी चाहिए! 1984 में किए गए सिखों के कत्लेआम जिसमें कि 5000 सिख मारे गए थे (गोधरा कांड और गुजरात दंगों से कहीं ज्यादा) उसके पीछे जिन लोगों का हाथ है उनके लिए क्या जूमले बनाए जाएँ? घर से बेघर कर दिए गए लाखों कश्मीरी पंडितों के घाव किसी को नही दिखते. कश्मीरी पंडितों के हत्यारे और उन पंडितों को उनके ही घरों से बाहर फेंकने वाले लोग कौन थे? और उनके आकाओं के लिए भी तो जूमले इजाद किए जाने चाहिए.
गलत कार्य हमेशा गलत कार्य ही होता है. उसे सही सिद्ध नहीं किया जा सकता. अब जब सेक्यूलर शब्द का क्रियाकर्म कर उसे गाली जैसा बना ही दिया है तो कम से कम उसका वास्तविक अर्थ तो ना भुलें. सेक्यूलर हैं तो समभाव रखें. जूमले तो सबके लिए बनने चाहिए ना! जब हमाम मे सब नंगे घूम रहे हैं तो लाज किसी एक की ही क्यों लेते हो?
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