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हास्य की खोज इंसान ने नहीं बल्कि बंदर ने की थी! |
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रोचक तथ्य और जानकारी
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शुक्रवार , , 04 जनवरी |
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तरकश ब्यूरो
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विशेषज्ञ मानते हैं कि हँसने की क्रिया बंदर जाति के जानवार इंसान की उत्पति से पहले से जानते थे.
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हँसने वाला व्यक्ति अपने
आसपास खडे लोगों को भी हँसने के लिए बाध्य कर देता है. यह एक ऐसी
भावनात्मक क्रिया है जिसकी प्रतिक्रिया बहुत तेजी से नजर आती है.
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वह कोई भी हो सकता है, सर्कस में मनोरंजन करने वाला जोकर, एक नन्हा सा शिशु या फिर हिन्दी फिल्म का एक खलनायक. और कुछ मिले ना मिले लेकिन इन सभी में एक चीज एक जैसी हो सकती है, वह है मुस्कुराहट या हास्य. तरीके अलग अलग हो सकते हैं, जोकर की हँसी गुदगुदी पैदा करती हो, शिशु की हँसी मासूमियत से भरी हो और खलनायक की हँसी कूटिल हो. लेकिन हँसी एक ऐसी भावनात्मक अभिव्यक्ति है जो ना केवल हँसने वाले को बल्कि उसके आसपास के वातावरण को खुशनुमा बना देती है और आसपास खडे लोगों पर अपना प्रभाव पैदा कर देती है.
हँसने वाला व्यक्ति अपने आसपास खडे लोगों को भी हँसने के लिए बाध्य कर देता है. यह एक ऐसी भावनात्मक क्रिया है जिसकी प्रतिक्रिया बहुत तेजी से नजर आती है. एक आदमी को हँसता देख दूसरा आदमी भी हँसने लगता है. लेकिन यह क्रिया अमूमन इंसानों मे ही देखी जाती है. लेकिन अब यह सच भी उजागर हुआ है कि हँसी की खोज वास्तव में इंसान ने नहीं बल्कि बंदर ने की थी.
हमारे पूर्वज बंदरों के कुल के थे, बायोलोजिकल रूप से बंदरों से अलग होने के बाद हमने कई विधाएँ विकसित की, लेकिन हँसी उनमें से एक नही है. विशेषज्ञ मानते हैं कि हँसने की क्रिया बंदर जाति के जानवार इंसान की उत्पति से पहले से जानते थे.
पोर्ट्समाउथ विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों के अनुसार अब यह स्पष्ट है कि भावनाओं के सकारात्मक प्रभाव को व्यक्त करने के लिए हँसने की क्रिया का किया जाना तथा अपने आसपास के समान कुल के प्राणियों मे उसका प्रभाव उत्पन्न कर पाने की क्रिया मानव के जन्म से पहले ही बंदर जाति के प्राणियों द्वारा विकसित कर ली गई थी.
विशेषज्ञों ने यह अनुमान एक प्रशिक्षण के बाद लगाया. उन्होनें ने 25 ओरेंगउटांग जाति के बंदरों को चार समूहों मे विभाजित कर दूनिया के अलग अलग कोनों में रखा. फिर उनपर निगरानी रखी गई. शोध के बाद पता चला कि दूनिया में जहाँ कहीं भी उन्हे रखा गया उन्होने एक समान भावनात्मक क्रियाओं को अंजाम दिया. यदि कोई ओरेंगउटांग अपने मुँह को फैलाकर अपने दाँत दिखाने लगता था तो उसके बाकि के साथी भी वही करने लगते थे. यह क्रिया हँसने की क्रिया जैसी ही होती थी.
इससे यह भी सिद्ध होता है कि समूह मे रहने की भावना इंसानों की उत्पति से बहुत पहले ही विकसित हो गई थी.
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