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बन्धन : खण्ड 4 / अध्याय 27
उपन्यास
मंगलवार , , 01 अप्रेल
 
manojkumar.jpg मनोज सिंह



''कौन? राधिका, दिस इज़ अदिति।''
''अदिति तू!! कहाँ? और अचानक कैसे?'' राधिका ने दूसरी तरफ़ से आश्चर्य ज़ाहिर किया था।
''बस-बस इतने सवाल एक साथ नहीं। अच्छा मैं तुम्हें अमित के कहने पर फ़ोन कर रही हूँ। उसने कहा है कि उसे तुम फ़ोन मत कर बैठना।''
अदिति सीधे पहले असली बात पर आ गई थी।
''क्यूँ, क्या हुआ?'' राधिका ने फ़ोन पर ही अपना डर, दर्द और आश्चर्य व्यक्त किया था।
''कुछ नहीं यार, लास्ट नाइट ही हैड हार्ट अटैक। होश में आने के बाद सुबह-सुबह ही उसने मुझसे तुम्हें फ़ोन करने के लिए कहा था।'' अदिति ने लंबी साँस छोड़ते हुए कहा था। आवाज़ में उदासी थी।
''क्या!!!'' सुनते ही राधिका फ़ोन पर ही चीख पड़ी थी।
''ठीक है अभी, बट ही इज़ अंडर आब्ज़र्वेशन।''
''बेचारा।'' राधिका ने लंबी साँस लेकर राहत महसूस की थी।
''राधिका ये चक्कर क्या है? मेरी समझ से तो बाहर है।''
''अभागा है अमित, बस यूँ समझ ले।''
''कैसे? और ये निकिता?''
''क्यूँ? मिली नहीं क्या अब तक?''
''नहीं, बस एक बार घर गई थी। जबलपुर पोस्टिंग पर आने पर। वह तो कमरे से भी नहीं निकली, फिर मैं क्या करती। फिर अमित भी आजकल कम ही बात करता है। उसने आगे भी कभी घर पर नहीं बुलाया, न ही हमारे घर आया। हाँ, निकिता के लिए लोग कहते हैं, कि वो थोड़ी डिप्रेशन में रहती है।''
''नो नो, शी इज़ स्किइजोफ्रेनिक।''
''क्या?? कब से? कालेज में तो ठीक-ठाक थी। देखने से तो पहले कभी महसूस भी नहीं हुआ था।''
''सुंदर चेहरे के पीछे बदसूरत दिमाग़, पूर्ण रूप से अव्यवस्थित। हाँ, मुझे भी अचरज हुआ था। कालेज में मेरी तो रूम पार्टनर रही है। मुझे तो लगता था कि थोड़ी लाड़ली और ज़िद्दी है। कई बार रात-रात भर सोती नहीं थी, छोटी-छोटी सी बातों में लड़ती थी। एक बार तुझे याद है, मेरे साथ कमरे की सफ़ाई के लिए कितना लड़ी थी। खुद तो कुछ भी नहीं करती थी। मगर बात-बात पर उलटा सोचना और लड़ाई। पर अब समझ में आता है कि वह भी डिप्रेशन की शुरुआत थी। वास्तव में वो बाइपोलर डिप्रेशन के सिमटम थे। पर ये कब स्किइजोफ्रेनिया में बदल गये, पता नहीं। वैसे भी जब यह ट्रिगर होता है, तो तेज़ी से बढ़ता है, जब तक दबा है तो दबा है। बीच में तो बहुत बुरी हालत थी। अब तो शायद कुछ ठीक भी है।''
''तुझे यह सब कैसे मालूम।''
''यहीं दिल्ली के साइकॉइट्रिक डाक्टर वर्मा से भी इलाज़ चलता रहता है। हमारी जान-पहचान के हैं। इसलिए तक़रीबन सब कुछ ही जानती हूँ।''
''और निकिता के माता-पिता भी तो दिल्ली में ही थे। भाई और बहन भी वहीं हैं शायद। वे कुछ नहीं करते?''
''मदद करना तो दूर मेरे ख़याल से तो उलटा बीमारी बढ़ाने में सहायक हैं।''
''वो कैसे?'' आश्चर्यचकित होकर अदिति ने पूछा था।
''और क्या, सूद अंकल, तुम्हें याद नहीं निकिता के पापा। एक-दो बार कालेज आए थे तब भी हर किसी से छोटी-छोटी बातों पर लड़ जाते थे। बेसिकली ही इज़ ऑलसो सफरिंग फ्राम मूड डिसऑडर, उनको डिप्रेशन रहता है। वो तो आँटी थोड़ी समझदार और तेज़ हैं। दवाई, प्यार और ऊपर से किसी भी तरह का स्ट्रेस उन्हें नहीं लेने देती, तो ठीक चल रहे हैं। परंतु उन्होंने अपने बच्चों की ओर ध्यान ही नहीं दिया। बाकी तो किसी तरह निकल गए लेकिन निकिता छोटी और लाड़ली थी तो बिगड़ गयी। बचपन में उसे लाड़-प्यार से तो बिगाड़ा ही और अब भी समझाने की जगह ऐसा कुछ न कुछ कह देते हैं कि उसका दिमाग़ खराब हो जाता हैं और वह अपना सारा पागलपन अमित और बच्चों पर निकालती है।''
''भाई और बहन ने समझाने की कोशिश नहीं की।''
''जुड़वां बहन समझदार है। एक दिन तो मुझसे भी कह रही थी कि निकिता ही बेवकूफ है जो माँ की बातें सुनती रहती है। उसने तो अपनी मम्मी को अपनी शादी के दूसरे दिन ही कह दिया था कि ...उसके पर्सनल जीवन में दखलंदाजी उसे पसंद नहीं, अपने ढंग से जीने दो, अपनी राय अपने पास ही रखो, जय रामजी की। ...सरल, समझदार और बोल्ड है और खुश भी रहती है। रही बात भाई की तो, बहू की हाँ में हाँ तो सभी मिलाते हैं। रहना भी तो उनके साथ ही है। सो बची निकिता बस उसी पर अपनी चौधराहट बताते रहते हैं। ये भी नहीं जानते कि उनके द्वारा कही गई कोई भी बात निकिता को असर कर जाती है और वह कुछ और समझ ही नहीं पाती।''
राधिका विस्तार से समझा रही थी।
''और उनका अमित के साथ व्यवहार...?''
''वे उससे बात ही नहीं करते। बहुत छोटा समझते हैं। वैसे खुद तो कोई बहुत बड़े सेठ नहीं हैं, परंतु अमित को पता नहीं क्यूँ पैरों की धूल समझते हैं। बातों-बातों में ही उसकी बेइज़्ज़ती कर देते थे। शुरू में तो अमित सहता रहा मगर अब आता-जाता नहीं और कम ही बात करता है। मगर ये आज भी निकिता को अमित के बारे में उलटा-सीधा बोलकर, और पागल कर देते हैं।''
राधिका की आवाज़ में आक्रोश था।
''मगर यार पढ़े-लिखे हैं, क्यों लड़की की ज़िंदगी खराब कर रहे हैं? समझ नहीं आता।'' अदिति हैरान थी।
''कौन समझता है आजकल… पता नहीं…। उलटे ऐसे लोगों को लगता है कि वो ठीक कर रहे हैं। …पहले हो सकता है आदमी औरतों पर ज़ुल्म करते होंगे। हो सकता है अब भी करते होंगे। परंतु आजकल तो औरतों के किस्से घर-घर में आम हैं। पूरे घर पर अधिकार के साथ-साथ ज़ुल्म भी कर रही हैं। ऊपर से लड़की के घर वाले भी आग में घी का काम करते हैं। ये तो अब आम बात हो गई है। विदेशों वाला हाल यहाँ भी हो गया है।'' राधिका भावावेश में कह रही थी।
''विदेशों में ऐसी हालात नहीं है, ग़लत सोचते हैं लोग। वहाँ का परिवेश अलग है, संस्कृति अलग है, रिश्तों का बंधन अलग है। वहाँ स्त्री परिपक्व है। उसे मालूम है उसे खुशी कहाँ से मिलेगी। वह झूठ और घुटन की ज़िंदगी जहाँ तक हो सके नहीं जीती। स्वतंत्रता है, नहीं पसंद आया तो अपने-अपने रास्ते में चल देते हैं। तलाक के केस ज़्यादा हैं।'' अदिति सफ़ाई देने की कोशिश कर रही थी।
''तेरा क्या स्टेट्‌स है? विदेश से कैसे वापस आ गई? फिर अमित बता रहा था कि तूने अब तक शादी भी नहीं की...'' राधिका ने टॉपिक बदला था।
''वहाँ लंदन में सब बढ़िया था। मगर अपना देश तो याद आता ही रहता था। माँ को अपने देश की ज़्यादा याद आने लगी तो फिर वापस आ गयी। जहाँ तक रही शादी की बात तो बस यूँ ही ज़िंदगी कब इतनी आगे बढ़ गई पता ही नहीं चला। जब प्यार की उम्र थी तो सिर्फ पढ़ती रही, जब पढ़ाई खत्म हुई और शादी की सोच पाती तब तक उम्र ही निकल गयी। फिर प्यार हुआ ही नहीं। वैसे भी प्यार किया नहीं जाता, हो जाता है। ख़ैर, छोड़ तू ये बता कि अमित इतना परेशान क्यों था कि मुझे तुझ को फ़ोन करने के लिए कहा।''
अदिति आराम से बिस्तर पर लेटकर आँखें बंद करके बोलती चली गई थी। एक हाथ में कार्डलैस टेलीफ़ोन और दूसरा हाथ सिर के नीचे था।
''वैसे इस बारे में ज़्यादा तो नहीं जानती, पर अमित इस कोशिश में है कि उसकी बेटी वहाँ से निकल जाये। वह जल्दी ही उसे किसी हॉस्टल में डालना चाहता है। कुछ परेशान है। मैंने पूछा तो कह रहा था, पढ़ नहीं पाती है, कुछ भी नहीं कर पा रही है। पता नहीं, हो सकता है शायद घर के वातावरण से दूर भेजना चाहता हो।''
''अच्छा, और क्या हाल है, श्याम के? तुम दोनों तो छुपे हुए रुस्तम हो। तभी तो कालेज में भी किसी को कानोंकान तक खबर नहीं होने दी। ...कितने बच्चे हैं?'' अदिति की बंद आँखों में एक मिनट के लिए कालेज घूम गया था।
''बस एक लड़का।''
''भाई ये ग़लत है, एक को कंपनी चाहिए।'' अदिति ने मज़ाक के लहजे में कहा था।
''आई एम विज़िलेंट नागरिक ऑफ इंडिया, समझी। देश की जनसंख़्या नहीं बढ़ानी है।''
ज़ोर से हँसे थे दोनों। अदिति फ़ोन रखने के बाद बहुत सोच में पढ़ गई थी। इतनी सुंदर निकिता और मानसिक रूप से पूर्णतः बीमार, यकीन नहीं होता। दूसरी ओर अमित, बचपन से ही बस लड़ रहा है, भाग रहा है, दुःख ही दुःख। दया आने लगी थी अदिति को। उस रात के अपने व्यवहार पर उसको अब पश्चाताप भी था। मगर वह शायद ग़लत नहीं थी। क्या वह अमित की मुश्किलों के लिए अपना सब कुछ बर्बाद कर देती। अंदर ही अंदर, बचपन से ही उसके दिल में अमित के प्रति अपनापन था, हक़ भी था, परंतु आकर्षण कभी नहीं रहा। पर अब अमित को लेकर उसे दुःख भी महसूस होने लगा था।
उसके अपने जीवन में कुछ भी नहीं था। कई बार सोचती किसके लिए जी रही है। कालेज में खूब पढ़ाई की, अंकल मरने से पहले, बहुत बड़ा बैंक बैलेंस उसके नाम भी छोड़ गए थे। कह गए थे, विदेश जाना पढ़ने। अंकल के गुज़रने के बाद माँ भी किसी भी तरह यहाँ से दूर जाना चाहती थी। सो दोनों विदेश चले गए थे। लंदन में पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद वहीं कालेज में ही काम करने लगी थी कि माँ की ज़िद्द पर वापस आना पड़ा। क्या करती, माँ का दिल विदेश में भी नहीं लगा था। यहाँ प्राइवेट प्रैक्टिस करने का मन नहीं था। इतना पता था कि अमित ने भी रेलवे ज्वाइन की है। अच्छा पैसा, रहन-सहन और रुतबा है। सो भारत लौटकर उसने भी यूपीएससी एप्लाई किया, सिलेक्ट होने पर रेलवे को ज्वाइन कर लिया। माँ बूढ़ी हो गई थी और अब बीमार भी। बहुत कोशिश की थी उसने अदिति की शादी की। एक तो मेडिकल में उम्र निकल गई है पढ़ने में, सो लड़का मिलना वैसे ही मुश्किल। फिर अरेंज मैरिज के लिए संबंध जान-पहचान होनी चाहिए। जो माँ के पास नहीं थी। जो संबंधी थे वह इस लायक नहीं थे। जो कहीं से मिलते भी तो वह या तो उम्र या माँ के पुराने संबंधों की खातिर, आगे बात नहीं बढ़ पाती। प्यार की उसकी उम्र निकल गई थी। फिर प्यार ऐसे तो होता नहीं। फिर सामने वाले को भी तो आपसे प्यार होना चाहिए। उसने शीशे में ध्यान से कई बार देखा था अच्छी-खासी लगती थी। कालेज में भी कम खूबसूरतों में नहीं आती थी। परंतु किसी ने भी पास आकर नहीं कहा था। ...इतने साल अमित साथ रहा वह भी तो आकर्षित नहीं हुआ था।
अदिति ने सोचते-सोचते करवट बदली थी... अमित आज सुबह अस्पताल के बिस्तर पर बूढ़ा लगने लगा था। उस पर उसे याद आया... सुबह-सुबह डाक्टर खुराना, डाक्टर शर्मा चीफ मेडिकल सुपरिटेंडेंट एवं मैडम शर्मा के साथ आए थे। सारी बातें डिस्कस की थी। अमित अस्पताल में अपना वजूद रखता था। सभी उसे बहुत पसंद करते थे। अदिति ने महसूस किया था कि डाक्टर खुराना जिस तरह से चीफ को बतला रहे थे, अमित की हालत ठीक नहीं थी। ईसीजी ग्राफ में एसटी सेगमेंट काफी उठा हुआ था और टी-वेव के ग्राफ में परिवर्तन था। जैसा कि हार्ट अटैक के बाद ईसीजी ग्राफ में परिवर्तन हृदय पर उसके असर को दिखाता है। इन सभी से अटैक की तीव्रता का अंदाज लगाया जा सकता है। अमित की दो आर्टरीज़ में ब्लड का फ्लो नहीं पहुँच पाने से कुछ असर आया था। ज़िंदगीभर उसे पूरा सावधान रहना होगा। तभी तो...
''नो अल्कोहल, नो स्मोकिंग एंड नो स्ट्रेस।'' चीफ ने धीरे से कहा था।
''हाउ इज़ मम्मी, बेटा?'' मैडम डाक्टर शर्मा ने आकांक्षा को देखकर उसके पास जाकर पूछा था।
''ठीक है।'' आकांक्षा ने नीची आँखें करके कहा था।
''कोई बात नहीं सब ठीक हो जायेगा, टेक केयर। …अदिति, मिसेज डीआरएम काफी खुश थीं। जब मुझे परसों पार्टी में मिलीं तो तुम्हारी काफी तारीफ़ कर रही थीं। तुमने उनकी बहू की सीजर ऑपरेशन से डिलीवरी काफी अच्छी तरह से की थी। कास्मेटिक सर्जरी में तुम्हारा हाथ बहुत साफ़ है। पेट पर कोई निशान नहीं। आई टोल्ड हर, यू आर टेलेण्टेड। कीप इट अप।''
अंतिम लाइनें अदिति को देखकर मिसेज डाक्टर शर्मा ने कही थी। और फिर तीनों चले गए थे। अच्छी हँसमुख और ज़िंदा दिल जोड़ी थी डाक्टर और मिसेज डाक्टर शर्मा की। अब भी इस उम्र में पूरे जवान लगते हैं।
निकिता के बारे में सब जानते हैं, काफी कुछ। और वह बहुत कम जानती है। यह सोचकर उसे बुरा लगा था। जबकि बचपन से वो अमित को जानती है। पर वह भी क्या करे, अमित ने उसे कभी भी घर पर नहीं बुलाया, न ही कुछ बताया। उसे तो यही लगा था कि शायद निकिता को पसंद नहीं। फिर उसने कोशिश भी नहीं की और न ही अमित ने। हाँ, कभी-कभी ड्‌यूटी पर साधारण-सी बात हो जाती थी। फिर उस रात के हादसे के बाद तो वैसे भी वह अमित से दूर ही रहती थी। आज घर आकर उसने सब कुछ माँ को बताया था। आकांक्षा अस्पताल में ही रह गई थी। सुबह घर आते समय अदिति गाड़ी उठाने, अमित के घर गई तो देखा अनिरुद्ध की आँखें सूजी हुई थी। लगता है रातभर सोया नहीं था। पापा के बारे में हालचाल पूछ रहा था। उसने भी निकिता के बारे में पूछा तो अनिरुद्ध ने कोई जवाब नहीं दिया था। थोड़ा गुस्सा ज़रूर उसके चेहरे पर उसने पढ़ लिया था।
''बीच में तुम भी चले जाना। वैसे कोई ज़रूरत होगी तो आकांक्षा फ़ोन करके मँगवा लेगी। चाहो तो तुम बात कर लेना। वैसे अस्पताल में सब कुछ ठीक है। सभी ख़याल रख रहे हैं चिंता की बात नहीं। आकांक्षा दिन में शायद आ जाएगी। शाम को मैं भी आऊँगी। थोड़ा आराम कर लूँ।'' अदिति ने अनिरुद्ध से, कार में बैठे-बैठे ही कहा तो,
''थैंक यू आँटी।'' बस इतना ही कहा था उसने।
बड़ी दया-सी उमड़ पड़ी थी उसे आकांक्षा और अनिरुद्ध की हालत देखकर। शायद ठीक ही कर रहा है अमित आकांक्षा के लिए। शाम को ही उसे सब कुछ बताएगी और पूछेगी... यही कुछ सोचते-सोचते उसे कब आँख लग गई होश ही नहीं रहा।

यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
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