एक वरिष्ठ अधिकारी विगत सप्ताह अपने भतीजे के साथ, उसके अनुरोध पर, फिल्म 'रेस' देखने गए थे। मकसद था कुछ मस्ती और मनोरंजन करना। आधुनिक किस्म के मदमस्त इंसान हैं। खुली सोच के हैं और नयी-नयी चीजों में दिलचस्पी रखते हैं। एक खुशमिजाज इंसान जो जीवन को सकारात्मक दृष्टिकोण से देखता है। वरिष्ठ पद की जिम्मेवारियों का निर्वाह करते हुए अपने कार्यक्षेत्र में नये से नया प्रयोग करने से नहीं हिचकिचाते, जिसके मूल में विभाग को आगे ले जाने की मंशा होती है। अर्थात संक्षिप्त में संतुलित इंसान के साथ-साथ सुलझे हुए अधिकारी। इन सब गुणों के बावजूद वे उपरोक्त फिल्म देखकर परेशान हो उठे। अगले दिन अपने कार्यालय में हल्के मूड में बताने लगे कि दस मिनट बाद ही फिल्म में ऐसा लगने लगा कि मैं कहां फंस गया। मगर फिर उनकी अगली बात ने सभी को हंसते से सोचने के लिए मजबूर कर दिया था। वो थी कि इतनी अनैतिकता को लोग कैसे देख लेते हैं, क्या इस तरह से जिया जा सकता है? उनके सवाल में ही जवाब भी छुपा हुआ था जो जरा-सा गौर करने पर सामने आ रहा था। और वो था, 'नहीं'। और इसके बाद वहां उपस्थित सभी लोगों के चेहरे अचानक गंभीर हो गए थे जबकि सभी उच्च-मध्यम वर्ग के आधुनिक पुरुष थे।
विगत सप्ताह एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी समाचारपत्र के रविवारीय विशिष्ट अंक में एक लेख प्रकाशित हुआ था। जिसका भावार्थ था कि आज मां-बाप अपने बच्चों को अपने ब्वाय फ्रेंड व गर्ल फ्रेंड के साथ डेटिंग व घूमने की आजादी देते हैं। और पंद्रह-सोलह वर्ष की उम्र में अगर उनका कोई विपरीत लिंग का दोस्त न बने तो चिंता करने लगते हैं। कुछ चार-छह अभिभावकों के उदाहरण भी दिये गए थे तो कुछ नामी हस्तियों के वक्तव्य भी शामिल थे। मैं पढ़कर बहुत हैरान हुआ था। चारों तरफ नजर दौड़ाई, दोस्तों, यारों, रिश्तेदारों, बड़े-छोटे शहरों में सभी को देखा, लगा कि इस तथाकथित सर्वेक्षण या लेख का सारांश कितना गलत और समाज को भ्रमित करने वाला है। पाठक स्वयं चारों तरफ देखकर अनुमान लगा सकते हैं कि यह कितना झूठ है। क्या उनके या उनके आसपास के परिवारों में आज भी इस तरह की छूट दी जाती है? क्या बच्चों को खुद गर्ल फ्रेंड और ब्वाय फ्रेंड बनाने के लिए प्रेरित किया जाता है? क्या उन्हें अकेले घूमने जाने के लिए खुशी-खुशी इजाजत दी जाती है? वो भी मात्र पंद्रह-सोलह वर्ष की उम्र में। इसका उत्तर आपको स्वयं मिल जायेगा। आज भी जो बच्चे इस काम को जबरदस्ती करते हैं तो मां-बाप या तो उन्हें समझाने और रोकने की कोशिश करते हैं, नहीं तो डराने-धमकाने से भी नहीं चूकते और न रुकने पर चिंतित होते हैं। ऐसे शायद नगण्य होंगे जो खुलेआम इस काम को बढ़ावा देते हैं। जिन्होंने स्वयं यह कार्य अपने जमाने में कर रखा हो वे भी इसे स्वीकार नहीं करते। उनके द्वारा इस तरह के व्यवहार के पीछे मात्र एक कारण होता है कि इससे होने वाले दुष्परिणाम से बच्चों को बचाया जा सके। जिनके पास अपने बच्चों के लिए वक्त नहीं, उनकी बात कुछ और है अन्यथा सामान्यतः घरों में इस खुलेपन को आज भी स्वीकार नहीं किया जाता।
इस सत्य के बावजूद समाचारपत्र में इस तरह से छापा गया कि मानो सारा हिन्दुस्तान आज नयी संस्कृति में जी रहा है। बड़ी हैरानी होती है कि हमारी फिल्में, पत्र-पत्रिकाएं समाज को पता नहीं क्या देना चाहती हैं। माना कि बच्चों को स्वतंत्रता होनी चाहिए, उन्हें आधुनिक होना चाहिए, उन्हें स्वयं अपना निर्णय लेने की क्षमता होनी चाहिए। उन्हें जीवन को समझने और आनंद लेने की छूट होनी चाहिए, मगर फिर हमें इतनी नादान व कच्ची उम्र में उनके द्वारा लिये गए गलत फैसलों से होने वाली परेशानियों के लिए तैयार भी रहना चाहिए। क्या हम उसके लिए तैयार हैं? नहीं।
बात यहीं नहीं खत्म हो जाती, विगत दिवस रेडियो में मैंने एक प्रोग्राम सुना जिसमें लड़के-लड़कियां अपने प्रेमी का नाम लेकर रेडियो पर उनके नाम की उदघोषणा करवाते हैं और साथ ही संदेश भेजते हैं और फिर मनपसंद गाना सुनवाते हैं। इस तरह से प्रेम जो अंतरंग संबंधों की कोमल भावना है उसे छत पर खड़े होकर चिल्लाकर बताने की कोशिश की जा रही है। कमाल है। प्रोग्राम सुनकर साफ लग रहा था कि प्रेम का भी बाजार बन चुका है ओर लोग इसे खरीद-बेच रहे हैं। वाशिंगटन से मेरे एक मित्र ने विगत वर्ष मुझसे एक सलाह मांगी थी कि अब उसकी लड़कियां बड़ी हो रही हैं तो क्या उसे अब हिन्दुस्तान वापस आ जाना चाहिए। तो मैंने बस इतना ही कहा था कि यहां भी अब स्थितियां ठीक नहीं।
उपरोक्त संदर्भ में ही, पिछले दस-पन्द्रह दिनों से स्थानीय समाचारपत्रों के मुख पृष्ठों को देख रहा हूं। यह एक दुःखद संयोग भी हो सकता है, जो इन दिनों हर एक दिन किसी न किसी परिवार द्वारा सामूहिक आत्महत्या की खबर पढ़ने में आई। यह आत्महत्याएं किसानों की आत्महत्याएं नहीं थी, न ही बेरोजगारी, भूख, ऋण, कर्ज या राजनीति से प्रेरित। इनमें से अधिकांश अच्छे खाते-पीते समाज के प्रभुत्व वाले लोग थे। हां, अगर कोई एक चीज सभी में सामान्य थी तो वह है इन सभी आत्महत्याओं के पीछे किसी न किसी परिवार के सदस्य का कोई अनचाहा और अनैतिक संबंध। इन आत्महत्याओं को देखकर लगता है कि यह एक नया ट्रेंड चला हुआ है। आदमी पहले बच्चों और बीवी को खत्म करता है और फिर खुद मर जाता है। एक-दो जगह जहर से तो अधिकांश ने अपनी आत्मसुरक्षा के लिए खरीदी गई पिस्तौल से घर को तबाह कर दिया। एक ने गाड़ी में बैठकर परिवार सहित नदी में कूद लगा दी। इसी तरह से दूसरी हत्याओं व आत्महत्याओं के पीछे भी अमूमन यही अनैतिक संबंध पाये जाते हैं। ये एक दिन की पेपर की सुर्खियां समाज को कुछ नहीं देती और न ही समाज इसे समझने को तैयार है। यह तो पाठक के लिए मात्र एक सनसनी में डूबी खबर है जिसका असर उसके दिल और दिमाग पर तभी तक बरकरार रहता है जब तक वो समाचारपत्र का पन्ना न पलट ले। बहरहाल ये हैं अनैतिक संबंधों के अंतिम परिणाम अन्यथा अधिकांश तो सदमे या हताश होकर डिप्रेशन में जीवन जीते रहते हैं। और यह इस देश में ही नहीं, बल्कि इसे पश्चिम की खुली सभ्यता भी स्वीकार नहीं करती और परिवार में तलाक व विघटन का प्रमुख कारण बनती है। तो इस अनैतिकता के अंतिम परिणाम, जो कि आधुनिकता की देन है, को जानने के बाद भी, क्या उपरोक्त फिल्म बनाने वाले और समाचारपत्र के अंतर्गत विशिष्ट संस्करण निकालने वालों को समाज से सरोकार नहीं? शायद नहीं। तो क्या उन्हें इन घटनाओं की जानकारी नहीं? शायद उनके घर इस आग से बचे हुए हैं या फिर वो इस बात को भी पैसों से तोलने के लिए तैयार खड़े हैं।
यह कहना कि अनैतिकता पूर्व में नहीं थी, सरासर गलत होगा। परंतु आज इनकी संख्या अचानक बढ़ गयी है। जिसका कारण उपरोक्त व्यवस्था है। हम रोज इसको प्रचारित व प्रसारित कर रहे हैं। नाटक, कहानी, फिल्मों में ये महिमामंडित हो रहे हैं। आधुनिकता ने हमारे दिलोदिमाग को भ्रमित कर रखा है। हम विकास के नाम पर अपनी शांति खो चुके हैं। एक नये मस्ती की तालाश में चिरपरिचित नैसर्गिक सुख को त्याग रहे हैं।
माना कि प्राकृतिक रूप से हर एक प्राणी स्वतंत्र है और वह अपने साथी को चुनने के लिए भी स्वतंत्र है। उसकी पसंद नापसंद भी मायने रखती है। मगर ये तो जानवरों में भी पाया जाता है। वो तो सिर्फ साथी का परस्पर विश्वास हमें जानवरों से भिन्न करता है। वैसे तो जानवर भी कुछ समय तक ही सही एक बार में एक ही के साथ संपर्क में रहते हैं। मगर मानव तो भावनाओं से भरी जिंदगी जीता है। मनुष्य की प्राकृतिक सोच को ध्यान से देखें तो इसी बात ने उसे जानवरों से भिन्न बनाया है। यह हमारे मानसिक विकास की देन ही है कि हम अपने साथी को किसी और के साथ नहीं बांट सकते। तभी तो आधुनिक से आधुनिक समाज में भी इस बात का विशेष महत्व है। एक-दूसरे को न समझने पर, दुःख और घुटन में अलग तो हुआ जा सकता है नये साथी की तलाश की जा सकती है, लेकिन साथ रहते-रहते किसी और के साथ संबंध स्थापित करना यह आज भी उतना ही अनैतिक और अस्वीकार्य है जितना हजारों वर्ष पूर्व था। असल में सामान्य मनुष्य इस बात को कदापि स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि वह शारीरिक संभोग के साथ-साथ आत्मिक प्रेम भी करता है। और इसी प्रेम से सुखी परिवार की उत्पत्ति होती है और फिर सुदृढ़ समाज का निर्माण। अन्यथा फिर जानवरों का निवास स्थान जंगल क्या बुरा है। आधुनिकता के चक्कर में आदमी ने अपनी परिभाषाओं को लचीला तो बना लिया लेकिन वो समझ न पाया। और परिणाम में इस तरह के हादसे होने लगे। इस अनैतिकता का कभी सुखद अंत नहीं हो सकता। आप खुद देखिए, जो भी स्त्री या पुरुष अपने साथी के अनैतिक संबंधों को स्वीकार करते हैं, क्या वे सामान्य होते हैं? नहीं। जो चीज हमें मान्य नहीं, जिस रास्ते हमें चलना नहीं, उसकी ओर हमें क्यों अग्रसर कराया जा रहा है? शायद बाजार की ताकत है जो हमें सोचने-समझने भी नहीं देना चाहती। और हम अंधे कुएं की ओर बढ़ रहे हैं।
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मनोज सिंह
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