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बन्धन: खण्ड 5 / अध्याय 52
उपन्यास
मंगलवार , , 06 मई
 
manojkumar.jpg मनोज सिंह



निकिता धर्मपुर के गेस्ट हाउस में पहुँचते ही थककर सो चुकी थी। अमित ने बिना समय गँवाए हुए डाक्टर से मिलना ज़रूरी समझा था। पास ही उनका विशाल अस्पताल था। डाक्टर सिंह बड़े सुलझे और अनुभवी लग रहे थे। मिलने पर विस्तार से समझाने लगे,
''देखो अमित तुम खुद ही डाक्टर हो, सब कुछ जानते हो, इंटरनेट पर इसकी जानकारियाँ भी लेते रहते होंगे। रिसर्च तो बहुत हो रही है। लेकिन अधिकतर लोगों का ऐसा मत है कि अभी तक इसका इलाज़ पूरी तरह से संभव नहीं है। नो क्योर। मगर हाँ, हम पर्याप्त रूप में इसके सिमटम को कंट्रोल कर देते हैं। मरीज़ को सिमटम फ्री बना देते हैं, जो भी ग़लत सिमटम अधिकता में दिखाई देते हैं वो चैक हो जाते हैं। मरीज़ समाज में रहने लायक बना दिया जाता है। बेहतर दवाइयाँ आ चुकी हैं उससे निकिता और बेहतर हो जाएगी। साथ ही इसके साइड एफेक्ट भी कम हैं। मेरे हिसाब से पाँच में से एक मरीज़ तक़रीबन पूर्णतः ठीक भी हो जाता है। मगर सामान्य कितना हो पाता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि मरीज़ की अवस्था, तीव्रता कितनी है, वह दवाइयाँ लगातार ले रहा है या नहीं, घर वातावरण, रोगी की उम्र, अन्य बीमारियाँ वगैरह-वगैरह बहुत से ऐसे पैमाने है जिस पर रखकर ही उसके ठीक होने की संभावना निर्भर करती है।''
अमित जानता था। पढ़ा-लिखा था पर आस तो उसकी भी एक साधारण इंसान जैसी ही थी। सुनकर थोड़ा धक्का लगा था। निकिता और बेहतर हो जाए यह भी क्या कम है। डाक्टर सिंह ने जब बताया था कि पाँच मरीज़ों में से एक पूर्णतः सिमटम फ्री हो जाता है, बाकी में सुधरने का प्रतिशत भिन्न-भिन्न होता है। तो फिर निकिता उन पाँच में से एक रोगी क्यूँ नहीं हो सकती है। और फिर डाक्टर के बताए सारे कारणों के पैमाने पर रखकर वह सोचने लगा था...
मरीज़ की अवस्था, कितना पुराना रोग है, घर के हालात, इलाज़ का तरीक़ा, मरीज़ की देखभाल यह सब तो वह देख सकता है ...मगर भगवान? सबसे ऊपर तो वही है जिसे उसने आज तक अपने साथ महसूस नहीं किया था। तो फिर...?
अमित अपने ही विचारों में उलझ रहा था। बाहर अस्पताल में बहुत भीड़ थी। नज़र पड़ी तो देखकर जान-बूझकर पूछने लगा था,
''इतने मरीज़?''
''तुम यह मत सोचना अमित कि तुम अकेले हो। हर तीसरे घर में परेशानी है। ये भीड़ तो कुछ भी नहीं। सिर्फ पाँच प्रतिशत लोग ही हम तक पहुँच पाते हैं। हाँ, लेकिन जो पहुँच जाते हैं हम उन्हें कुछ-कुछ जीने लायक ज़रूर बना देते हैं। आजकल सिंगल फैमिली में, व्यावसायिकता के कारण, कुछ मानव एवं समाज की सोच में फ़र्क के कारण घरों में मानसिक बीमारों की संख्या बढ़ती जा रही है। पहले माँ और बीवी, भावनात्मक रूप से मज़बूत होती थीं और परिवार को सहारा देती थीं। घर आकर आदमी सुकून पाता था। अब घरों में झगड़े, ऑफिस में हाय-तौबा, सबको जल्दी है, पता नहीं किस बात की। मानसिक तनाव बहुत ज़्यादा है। घर-घर परेशानी है। अक्सर लोग यह भी नहीं जान पाते कि अमुक को अमुक बीमारी है। बीमार आदमी या औरत परेशान होकर घूमते रहते हैं, चिल्लाते रहते हैं, झगड़ा करते रहते हैं या फिर चुपचाप गुमसुम होकर समाज से कट जाते हैं। किसी भी तरह आनंद और जीवन का सुख नहीं ले पाते। आम लोग बस यूँ ही 'उसका नेचर ख़राब है' समझकर पीछा छुड़ा लेते हैं। उसको इरैटिक और गुस्सैल करार देते हैं या आम बोलचाल में डिप्रेशन मान लेते हैं। जब बात हद से गुज़र जाती है तभी कुछ डाक्टर के पास लाये जाते हैं। तुम किस्मत वाले हो कि तुम्हें पता है कि तुम्हारी बीवी को मानसिक बीमारी है और तुम उसे सहर्ष स्वीकार करके इलाज़ करवा रहे हो। यहाँ तो इस तरह के भी है जिन्हें यह भी नहीं पता कि उनका अमुक संबंधी बीमार है और वह उसके साथ अनजाने में ही लगातार दुःख झेल रहे हैं।''
डाक्टर साहब दार्शनिक अंदाज़ में नये समाज की नयी बीमारी के बारे में विस्तार से चर्चा कर रहे थे,
''नये समाज ने यह नयी बीमारी मुफ्त में दी है। कारण तो और भी बहुत है परंतु अकेलापन इसका प्रमुख कारण बनता जा रहा है। विदेशों में तो इनकी संख्या बहुत तीव्र गति से बढ़ रही है। हमारे यहाँ पर कम है ऐसा भी नहीं। ...आदमी चला तो था खुशी की तलाश में मगर बदले में बहुत ज़ख़्म ले गया।''
डाक्टर अपने अंदाज में बयान कर ही रहे थे कि बीच में ही सिस्टर ने आकर बताया था,
''कोई पुराने मरीज़ के सिर पर चोट है। अंदर आने के लिए ज़िद्द कर रही है।''
''भेज दो।''
उस मरीज़ के अंदर आते ही जैसे कि तूफान आ गया था। मनोरोगी औरत के सिर से खून बह रहा था। वह आते ही चिल्लाने लगी थी,
''इस हरामज़ादे के साथ नहीं रहना। मारता है साला। देख डाक्टर तू भी देख, खून निकल रहा है।''
पास ही खड़ा अधेड़ आदमी चुपचाप साथ-साथ ही अंदर आया था। उसके पीछे एक नौजवान लड़का अपनी औरत के साथ शांत खड़ा दुःखी हो रहा था।
''तू चिंता मतकर। हम सब देखते हैं। तुम चलो अपने कमरे में, मैं आता हूँ।''
सिस्टर को ट्रंकलाइजर मिश्रित इंजेक्शन देने का बोलकर डाक्टर ने मरीज़ को बाहर भेज दिया था। उसके जाते ही अधेड़ आदमी ने हाथ जोड़ लिये थे। कहने लगा,
''क्या बताऊँ, तूफान खड़ा कर दिया था। बेटे के साथ मिलकर जब इसे यहाँ लाने लगा तो बहू पर झपट पड़ी। ज़ोर से मारना पड़ा, नहीं तो जान ले लेती।''
 अधेड़ आदमी के चेहरे से दर्द टपक रहा था। साथ खड़ी बहू और बेटे भी दुःखी थे। डाक्टर ने सिस्टर को इलेक्ट्रिकशॉक की तैयारी का कहकर उन्हें अभी फ़िलहाल मरीज़ से दूर रहने के लिए कहा था।
''देखा कैसे-कैसे केस हैं। यह आदमी अपनी औरत से अब भी बेहद प्यार करता है। औरत भी जब ठीक होती है तो खूब प्यार देती है। मगर जब उखड़ती है तो आदमी को ही एक नंबर का दुश्मन मानती है। फिर भी यह आदमी 25 सालों से उसकी सेवा कर रहा है। साथ में मार भी खाता है।''
''डाक्टर साहब यह इलेक्ट्रिक  शॉक?''
''मेरे हिसाब से ठीक भी है और ज़रूरी भी। आम लोगों को छोड़ो, पढ़े-लिखों में भी ग़लत धारणा है। यहाँ तक कि कुछ डाक्टर भी इससे सहमत नहीं हैं। मेरी राय में हिन्दुस्तान जैसे देश में जहाँ सुविधाएं बहुत अधिक नहीं है, यह एक कारगर तरीक़ा है। फिर मेरा अपना मत और अनुभव है। इससे बहुत अधिक फायदा होता है और राहत पहुँचती है। जहाँ तक रही नुक़सान या कोई हादसे की बात तो दुनिया में कोई भी चीज़ परफेक्ट नहीं है। मैंने अपने जीवन के इतने लंबे अनुभव में कभी भी इससे स्थायी, परमानेन्ट मेमोरी लॉस होते नहीं देखा है। हाँ, टेम्परेरी याददाश्त पर थोड़ा बहुत आंशिक असर ज़रूर पड़ जाता है। फिर कुछ मरीज़ों के साथ इलेक्ट्रिक शॉक ज़रूरी भी हो जाता है।''
कहते हुए डाक्टर मरीज़ को देखने चले गये थे। अमित बाहर आकर मरीज़ों की भीड़ में गुम हो गया था। वह आदमी अब भी दूर वहीं खड़ा हुआ था। जहाँ उसकी पत्नी को इलेक्ट्रिक शॉक के लिए ले जाया गया था। अमित को उससे बात करने की इच्छा हुई तो उसके पास पहुँचकर अपना परिचय देने लगा। अपने और निकिता के बारे में संक्षिप्त में बताकर उसका विश्वास जीतकर बात आगे बढ़ाने की कोशिश की थी। पहाड़ी आदमी बस इतना ही कह पाया था,
''जब से इसकी डोली मेरे घर पर उतरी है साहब, मेरी तो अर्थी उठ चुकी है।''
''फिर भी इतना लंबा साथ और बच्चे?''
 अमित ने कौतूहलवश पूछा था।
''जब कुछ ठीक होती है कुछ देर के लिए तो जो प्यार देती है उसी में ये पैदा हो गये। अच्छे व़क्त में वैसे खूब प्यार देती है। फिर मैंने अपना सारा जीवन इसी के नाम कर दिया है। मैं तो जीते-जी मर चुका हूँ साहब मगर इसे तो जीते-जी नहीं मार सकता। कहाँ छोडूँ? ...आख़िरकार बीवी है मेरी।''
संबंधों की परिभाषा, बंधन की मज़बूती और त्याग का चरमोत्कर्ष देखकर अमित को अत्यंत खुशी हुई थी। नये उत्साह से वह गेस्ट हाउस की ओर गया था। रास्तेभर सोचता रहा निकिता ने तो उसे बहुत कुछ दिया है। दो बच्चे और प्यार के ढेर सारे पल। उस आदमी ने उसे फिर से जीवन की राह दिखायी थी।
गेस्ट हाउस पहुँचा तो देखा निकिता काले रंग का स्लीवलैस गाऊन पहनकर उसका इंतज़ार कर रही थी। काले रंग के गाऊन में उसका गोरा रंग और अधिक खिल रहा था, स्लीवलैस होने से बाँहों की माँसलता निकल रही थी। डीप नेक में से वक्षस्थल का उभार झलक रहा था।
चेहरे पर यात्रा की थकावट और आँखों में हमेशा की तरह दवाई का नशा तो था। मगर बाल आज उसने खोल रखे थे। जिसमें से सफेद बाल निकलकर उसकी खूबसूरती को नया आयाम प्रदान कर रहे थे। अमित के अंदर आते ही निकिता दरवाज़ा बंद करके उससे लिपट गई थी। आँखों में आँखें डालकर धीरे से कहने लगी,
''हनीमून है...''
फिर आँखें झुकाकर बुदबुदाने लगी,
''...प्यार करो न।''
यह सब देखकर अमित के मन में भी प्यार के बीज अंकुरित होने लगे थे। उसने वर्षों बाद उसके शरीर से कपड़े उतारे थे। और फिर उसे अपने आगोश में लेकर उसके मासूम चेहरे को प्यार से चूमा था। वैसे तो शरीर साथ नहीं दे रहा था पर मस्तिष्क में प्रेम का कीड़ा मचलने लगा था। घंटों तक वह उसके शरीर से खेलता रहा और निकिता शरमाती हुई उसे कुछ और करने के लिए प्रेरित करती रही। पूरी रात प्यार में इस तरह कब गुज़र गई पता ही नहीं चला। सुबह नये-नये जीवन साथी की तरह दोनों बहुत देर से उठे थे। निकिता की आँखों में चमक थी और अमित के चेहरे पर जीवन की रेखाएं।
दिनभर पास ही कसौली में घूमते रहे। दूसरे दिन शिमला के लिए रवाना होना था इसके पहले ही अमित निकिता के साथ डाक्टर सिंह के घर पर शाम को गया था। डाक्टर ने बहुत देर बातचीत करने के बाद विस्तार से नयी दवाइयाँ लिख कर दी थी। दवाइयों में रेसपैरिडॉन, आनेन्जापिन एवं क्वाइटापिन के बारे में अमित ने सुन तो रखा था मगर जबलपुर में डाक्टर से परामर्श नहीं कर पाया था। डाक्टर सिंह ने पूरे दो तीन महीने का कोर्स विस्तृत जानकारी के साथ दिया था। कहने लगे ...इसके साइड एफेक्ट न के बराबर हैं। उधर, निकिता बागीचे के किनारे से दूर-दूर तक फैली घाटी को निहार रही थी।
''यू आर लक्की, शी इज़ ब्यूटीफुल।''
तुम किस्मत वाले हो, वह बेहद खूबसूरत है ...डाक्टर के मुँह से इन्हीं आशावादी बातों को सुनकर, अमित शिमला के लिए रवाना हुआ था। डाक्टर की जीवन के प्रति सकारात्मक सोच, जो जैसा है उसे स्वीकार करते हुए उसी में अच्छाई ढूँढ़ने की प्रवृत्ति से वह बहुत प्रभावित हुआ था।
दोपहर शिमला पहुँचे तो मौसम खुशनुमा था। शाम होते ही हवा में ठंडक आ चुकी थी। माल रोड शिमला के बारे में अमित ने सुन रखा था। निकिता से घूमने चलने के लिए पूछा तो वह बहुत खुश हुई थी। उस दिन निकिता पूरी तरह से तैयार होने की कोशिश में थी। वैसे तो वह हरेक रंग की साड़ी में बेहद आकर्षक लगती मगर आज उसने हल्के नीले आसमानी रंग की साड़ी निकाली थी। पहनने की कोशिश करने लगी तो बहुत देर तक परेशान हुई थी और फिर बड़ी मुश्किल से ही पहन पायी। साड़ी के फॉल और पल्ले को सैकड़ों बार ठीक किया था। साड़ी पहनने के बाद चेहरे पर मेकअप करते-करते कभी फेस पैक ज़्यादा लगाती तो कभी धोकर मुँह फिर से साफ़ कर लेती। आँखों में काजल लगाने की कोशिश में, वो कई बार फैल जाता। हाथ जो काँप रहे थे। फिर मॉइस्चराइज़र में पाउडर मिलाती और फिर चेहरे पर लगाकर इस कालेपन को छुपाने की कोशिश करती। घंटेभर, अमित उसे यूँ ही सजता देखता रहा था। किसी तरह अंत में थककर वह चलने के लिए तैयार हो पाई थी। दरवाज़ा बंद किया और निकलने लगे तो फिर दरवाज़ा खुलवाकर चेहरे को ग़ौर से देखा और फिर लिपस्टिक लगाने लगी थी। इतना चेहरे पर मेकअप और काजल फैल जाने से उसकी सुंदरता एक नाटक कंपनी की हीरोइन से ज़्यादा कुछ नहीं हो पाई थी। बिना मेकअप में वह आज भी बेहद सुंदर और आकर्षक लगती थी। अमित ने उसे बहुत देर तक निहारा फिर प्यार से माथे पर एक चुंबन लिया था। निकिता बड़े आत्मविश्वास से उसके साथ निकल पड़ी थी। माल रोड पर थोड़ी ठंड लगी तो उसने शॉल लेकर अपने आप को ठंड से बचाया था और अमित के साथ थोड़ा सटकर चलने लगी थी। माल रोड की जवान रात में कई जोड़े हाथों में हाथ डाले, जीवन की नयी कल्पना की ओर उडऩे के लिए तत्पर, चहलकदमी करते दिख रहे थे। धीरे से निकिता ने भी उसका हाथ पकड़ा तो उसने उसका पूरा साथ दिया था। निकिता अब उसके एकदम नज़दीक थी। उनके शरीर आपस में बार-बार टकरा जाते, जो दोनों को एक आनंद की अनुभूति दे देते थे। निकिता के वक्षस्थल की ऊँचाइयाँ अमित को छूकर उसे प्रेरित कर रही थी।
''मैं तुम्हें हनीमून गिफ्ट देना चाहता हूँ। वैसे तो सरप्राइज़ देना चाहता था। मगर चलो अब तुम अपनी इच्छा से ही ले लो। ...क्या लेना चाहोगी?''
''मुझे अच्छी-सी साड़ी लेनी है।'' निकिता ने कानों में पास आकर धीरे से प्यार में कहा था, हाथ उसने मज़बूती से पकड़ रखे थे।
''हाँ हाँ क्यूँ नहीं।''
कपड़ों की दुकान पर कई जोड़े साडिय़ाँ व सूट ले रहे थे। उन्हें बड़े ग़ौर से देख-देख कर निकिता खुश हो रही थी। पास ही खड़ी नवयुवती की बातें सुनकर वह भी एकदम से बोल पड़ी,
''मुझे भी अपनी सास के लिए साड़ी लेनी है। ...क्यों अमित? ...अच्छी-सी दिखाइएगा। हाँ, मेरी ननद के लिए भी एक सूट दीजिएगा। ...बढ़िया होना चाहिए।''
अमित चकराया था। पर जल्द ही संभलते हुए कहने लगा,
''हाँ, हाँ।''
उसने साड़ी लेते-लेते उसके कान में धीरे से कहा था,
''मम्मी की ज़्यादा महंगी नहीं लेगें, बूढ़ी हैं और फिर छोटे शहर में कहाँ पहनेंगी। सुप्रिया तो वैसे भी गंदा करती रहती है। क्या ज़रूरत है महंगे की। ...वैसे, पैसे हैं न?'' अमित सुनकर मुस्कुराया था। निकिता के साथ कपड़े खरीदने में उसकी मदद करता रहा। निकिता ने अपने लिये महंगी-सी और माँ के लिए साधारण-सी साड़ी मगर सुप्रिया के लिए अच्छा-सा सूट लिया था।
 पैसे देकर वह बाहर आया तो निकिता के भाव में अचानक शून्यता थी। रिज पर रात ग्यारह बजे तक बैठी रही, दूर पहाड़ों पर सितारों-सी चमक रही जगमग लाइटों को देखती रही और कुछ सोचती रही। कई बार अमित ने चलने के लिए कहा था मगर उसने सुना ही नहीं। अमित का ठंड से बुरा हाल हो रहा था। हाथ कांपने लगे थे। मगर निकिता को न तो ठंड लग रही थी न ही कुछ और ख़याल था। बहुत देर बाद उठते हुए धीरे से कहने लगी,
''मगर इस ड्रेस को हम उन्हें देंगे कैसे?''
''तुम चिंता मत करो, कुछ न कुछ इंतज़ाम हो जाएगा।''
अमित ने धीरे से उसके कंधों पर हाथ रखकर कहा था। और फिर हाथ पकड़कर जबरदस्ती गेस्ट हाउस लाया था। निकिता बुरी तरह सहमी हुई थी, डर उस पर फिर से हावी हो रहा था। पूरी रात उससे लिपटकर सोने की कोशिश करती रही थी। सुबह होते-होते उसे हल्का-सा बुखार हो चुका था। खामोश गुमसुम-सी दो दिन कमरे में ही रही। शरीर और बिस्तर दोनों गंदा कर रही थी। बहुत कोशिश करने पर भी ठीक नहीं हुई तो अमित दो दिन बाद ही जबलपुर लौट आया था। रास्तेभर बहुत दिनों बाद आकांक्षा को निकिता ने याद किया था। मगर नशे की अवस्था में भी रह रहकर उसे भला-बुरा कहती और फिर बुदबुदाती चली जाती।

यहाँ प्रकाशित श्रृंखला मूल रूप से उपन्यास “बन्धन” का डिजिटल रूपांतरण है तथा लेखक मनोजसिंह के पास इसके सर्वाधिकार सुरक्षित है. इसका पूरा या आंशिक, किसी भी रूप में पुनः प्रकाशन वर्जित है तथा इसे कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जायेगा.
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