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समाचारपत्रों में अपठनीयता
मेरे विचार
मंगलवार , , 03 जून
मेरे विचार
manojkumar.jpg मनोज सिंह






रविवार के दिन घर पर दस समाचारपत्र विशेष रूप से मंगाए जाते हैं। जिसमें हिन्दी और अंग्रेजी दोनों की संख्या पांच-पांच होती है। सामान्य दिनों में इनकी संख्या कुछ कम होती है। ऐसा हर दूसरे घर में देखा जा सकता है। अवकाश वाले दिन अधिक समाचारपत्र लेने के पीछे एकमात्र मकसद होता है अधिक से अधिक पढ़ने के लिए सामग्री जुटाना। इसके माध्यम से समय का उपयोग तो होता ही है साथ ही साथ मानसिक थकावट भी दूर की जाती है। मन प्रफुल्लित हो जाता है और तरोताजगी महसूस होती है। और फिर लेखन के लिए अधिक से अधिक पढ़ना वैसे भी आवश्यक है। कभी-कभी इनमें से ही उपन्यास के लिए पात्र मिल जाते हैं तो कई बार अगले स्तंभ के लिए एक नया विषय। इतने वर्षों से पढ़ते-पढ़ते अपना एक विशिष्ट स्वाद बन चुका है। जिसमें प्रत्येक अखबार के कुछ विशिष्ट पन्ने व लेख, किसी-किसी का संपादकीय और इसी तरह के कुछ अन्य स्थायी स्तंभ को सर्वप्रथम खोलकर पढ़ने की कोशिश की जाती है। वैसे प्रथम पृष्ठ से लेकर अंतिम पृष्ठ तक सरसरी निगाह से सारा समाचारपत्र एक बार जरूर देखा जाता है, लेकिन जो उसमें महत्वपूर्ण, उपयोगी तथा दिलचस्प लगे उस पर निगाह टिक जाती है और फिर उसे विस्तार से पढ़ा जाता है। अवकाश के दिन की शुरुआत अक्सर इस तरह से होती है जिसमें दो से तीन घंटे कहां गुजर जाते हैं पता ही नहीं चलता।

हर बार की तरह इस रविवार भी दस के दस समाचारपत्र के पलटने के बाद सारे मनपसंद स्तंभों को पढ़ने की कोशिश की थी। परंतु मात्र आधे घंटे में सब कुछ समाप्त हो गया तो आश्चर्य हुआ था। इस बार कुछ लेख दिलचस्प नहीं लगे तो कुछ उबाऊ थे। अधिकांश समाचारपत्रों में क्रिकेट, सिनेमा एवं अमीरों ने स्थान घेर रखा था। आईपीएल के आने के बाद क्रिकेट ने अखबारों पर एकाधिकार-सा जमाते हुए अपने साम्राज्य का जबरदस्त विस्तार किया है। पहले देश की एक टीम और उसके मैच कभी-कभी हुआ करते थे। उनकी हार-जीत व खिलाड़ियों के ग्लैमर को भरने के लिए कोई एकाध ही पेज हुआ करते थे। अब दस-दस बारह-बारह टीमें, जिसमें दुनिया के तमाम क्रिकेट के सितारे एक जगह इकट्ठे हैं तो उनकी स्टार पब्लिसिटी के लिए उनके दैनिक जीवन व खेल की अनावश्यक बातों को छपने और छपवाने के लिए स्थान तो चाहिए। किसी जमाने में समाचारपत्र के अंतिम पृष्ठ में आने वाला खेल समाचार अब प्रथम पृष्ठ पर छाने लगा है। क्रिकेट के बाद दूसरा स्थान था बालीवुड के सितारों की लुकाछिपी, प्रेम के चटपटे किस्से व उनके पतले और मोटे होने की खबरों का। इनकी समाचारपत्रों में कवरेज देखकर कई बार लगता है कि मानो सारा संसार इनके जीवन के इर्दगिर्द घूम रहा हो। क्रिकेट और बालीवुड के बाद जगह घेर रखी थी हिन्दुस्तान के नये-नये रईसों से संबंधित खबरों ने। किसी रईस के मकान की लंबाइ-चौड़ाई, उसकी कीमत तो कहीं पर विश्व की सबसे महंगे मकान के खरीदने और बेचने की खबर और कुछ नहीं तो विश्व के सबसे अधिक रईस लोगों की सूची में भारतीयों का नाम। दस के दस समाचारपत्रों के प्रथम पृष्ठों पर इन तीनों की ही भरमार थी। हां, इसके अतिरिक्त एक प्रमुख मुद्दा जिसने सभी अखबारों में अपनी उपस्थिति प्रमुखता से दर्ज कराई थी, वो थी दो सनसनीखेज हत्याएं। एक में बाप के द्वारा बेटी का कत्ल तो दूसरे में पति द्वारा पत्नी का कत्ल बताया जा रहा था। अंदर के पृष्ठों में भी इसी तरह की खबरें क्षेत्रीय और स्थानीय स्तर की छपी हुई थीं जिसके केंद्र में भी क्रिकेट, फैशन और हत्याएं ही थी। ध्यान से देखा तो कोई-कोई समाचारपत्र तो पेज थ्री का रूपांतरण लग रहा था। एक समाचारपत्र के संपादकीय पृष्ठ पर एक वरिष्ठ लेखक का कई बार छप चुका लेख को पुनः देखकर हैरानी हुई थी। जिसकी एक-एक बातें मुझे पहले से ही रटी हुई थी। कहानियां और साहित्य तो तकरीबन समाप्त ही हो चुका है। और जो थोड़ा बहुत छप रहा है वो संदर्भहीन व पढ़ने लायक नहीं था। स्तरहीन व रसहीन साहित्य को छपा हुआ देखकर लेखक व संपादन के मिलीभगत होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। अंत में एक मुख्य बात जिस पर गौर किया जाना चाहिए कि राजनीतिक समाचार ने बैकफुट ले लिया है। वो प्रथम पृष्ठ से तकरीबन गायब ही थी। अब तो समाज में राजनीतिज्ञों की स्थिति देखकर हंसी आती है। डर इस बात का लगता है कि प्रजा का शासन के प्रति इतना अरुचिकर होना प्रजातंत्र के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं। जो थोड़ी बहुत राजनीति की खबरें थीं भी उसमें विरोधी पार्टी के विरोध का जन्मसिद्ध अधिकार और सत्तापक्ष के आत्मप्रशंसा के अतिरिक्त कुछ विशेष नहीं था।

उपरोक्त स्थिति के कारण मात्र आधे घंटे में ही मैं खाली हो चुका था। ऐसे अतिरिक्त समय में आत्मचिंतन का होना स्वाभाविक था। तो क्या आज सब कुछ खेल-तमाशा हो चुका है? शायद हां। आज के युग को मस्ती का युग कहा जा सकता है। लेकिन गौर करने वाली बात है कि खेल, प्रेम, ग्लैमर व पैसे का आकर्षण, मानवीय जीवन और समाज में प्रारंभ से विद्यमान हैं। इतिहास के पन्नों को ध्यान से पढ़ने पर मालूम होता है कि आज के युग में हत्याओं, अनैतिक संबंध, सनसनी का होना कोई अनहोनी बात नहीं। हां, पूर्व में प्रतिशत के कुछ कम ज्यादा होने से इंकार नहीं किया जा सकता। असल में नैतिक मूल्यों के गिरावट एवं बदतर स्थिति के लिए हर तत्कालीन पीढ़ी चिंता करती रही है। और जो कुछ निवर्तमान में गलत घटता है उसके विरोध में खड़ी होती रही है। ऐसा नहीं है कि आज ही कलियुग है और पूर्व का काल शत प्रतिशत सतयुग था। तो फिर आज किस बात की परेशानी है? असल में चिंता का विषय यह है कि अब इन विषयों को मीडिया ने ब्रह्मास्त्र बनाकर समाज पर उल्टा प्रहार करना प्रारंभ कर दिया है। उसे बढ़ावा देकर महिमामंडित करना प्रारंभ किया है। इससे इसके रुकने की स्थिति कम बढ़ने की संभावना अधिक हो जाती है। सामग्री दूषित परोसी जा रही है तो मानसिकता का भ्रमित व अशांत होना स्वाभाविक है। यह आत्मघाती हमला है। विश्व समुदाय के द्वारा सामूहिक आत्महत्या का एक प्रयास। ऊपर से तुर्रा की मीडिया जोश में अपनी पीठ पर खुद ही शाबासी ठोक रहा है। राखी सावंत और बिपाशा बासु जब एक सामान्य व्यक्तित्व के होते हुए भी मीडिया ने उन्हें एक कोहिनूर हीरा बनाकर पेश कर दिया तो अगर सचमुच में वे अनुपम सौंदर्य के धनी होते तो पता नहीं क्या होता। आज हर एक घटनाक्रम पर तुरंत निर्णायक प्रतिक्रिया व्यक्त करना मीडिया का एक स्टाइल बन चुका है। और फिर शासन व्यवस्थाएं भी इनके प्रभाव में आकर कदम उठाती हैं। पाठक भी उसी को सत्य मानते हैं जो उन्हें पढ़ाया जाता है। उतना ही देख पाते हैं जितना दिखाया जाता है। और इसी के अंतर्गत ही हम अपनी सोच विकसित करते हैं। किसी भी हत्याकांड में समाचारपत्र के द्वारा आरोपित व्यक्ति को तत्काल खलनायक मानकर उससे नफरत करने लगते हैं तो पीड़ित के प्रति अतिरिक्त संवेदनाएं। इस आपाधापी में सत्य कहीं छुप जाता है।

आज भूख खबर नहीं बनती। सकारात्मक घटनाएं हैडलाइन नहीं होती। प्रमुख विषय भुखमरी, अनाज की परेशानी, विश्व की राजनैतिक परिस्थितियां, समाज की दिशा व दशा, प्राकृतिक असंतुलन, वैचारिक विकास प्रक्रिया व नैसर्गिक क्रिएटिविटी, चिंतन, दर्शन, कला एवं जीवन समाचारपत्रों में कहीं कोने में सिसकती दिखाई देते हैं। राजनीति अगर दिखाई भी देती है तो बस इतनी कि किस भी विशिष्ट वर्ग के लोग अपनी जाति या समूह विशेष की मांग को लेकर अपने ही देश की व्यवस्थाओं को उखाड़ते व जलाते नजर आते हैं। मानों कि उखाड़ दी गयी ट्रेक पर आने वाली ट्रेन में उनका अपने जाति का कोई भी आदमी नहीं होगा।

इसी बीच मुझे एक खबर मिली कि एक पूर्व अधिकारी जिसे कुछ वर्ष पूर्व रिश्वत लेते हुए दबोचा गया था, विगत सप्ताह नौकरी पर पुनः बहाल कर दिया गया। इसकी सत्यता को मैं नहीं जानता मगर कुछ वर्ष पूर्व यह घटना समाचारपत्रों व मीडिया में प्रमुखता से छपी थी। आरोपी के घर से लाखों के नोट बरामद होना दिखाया गया था। सच क्या था पता नहीं मगर उसे एक अपराधी के रूप में दिखाया गया था। इसे एक उदाहरण के तौर पर लिया जाए। आज मीडिया इसे भूल चुका है। पाठक के पास नयी खबरें हैं। तो क्या आज समाचारपत्रों द्वारा ठहराये गये दोषी कल आसानी से छूट जाते हैं? अगर हां, तो ऐसे रिपोर्टिंग का क्या फायदा? क्या समाचारपत्रों ने सिर्फ आज के लिए जीना शुरू कर दिया है? क्या इनका प्रभाव सिर्फ पढ़ने के दौरान तक ही रह जाता है? हां, यह सत्य है। तो समाचारपत्र अपनी वास्तविक कीमत को कब बढ़ा पायेंगे? खोयी हुई प्रतिष्ठा कब पायेंगे? कब का तो पता नहीं लेकिन हां, यह तभी माना जाएगा जब लोग उसकी कतरनों को काटकर संभालकर भविष्य के पढ़ने के लिए रखना शुरू कर देंगे।

***
मनोज सिंह
425/3, सेक्टर 30-ए, चंडीगढ़।
www.manojsingh.com


 

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