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मुद्रास्फीति 11% पर. इसकी वजह और असर
विशेष
शनिवार , , 21 जून
teamtarakash.jpg तरकश ब्यूरो



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मुद्रास्फीति की दर आसमान छूने की वजह

विशेषज्ञों के अनुसार मुद्रास्फीति की दर में अचानक आए उछाल की वजह पेट्रोलियम की किमतों मे हुई बढोत्तरी है. लेकिन इसके अलावा मुद्रास्फीति की दर में धीरे धीरे बढोत्तरी हो ही रही थी क्योंकि अन्न, सीमेंट और स्टील की किमतो में भी उछाल आ रहा था. इसके अलावा एक और वजह जो बताई जा रही है वह है विदेश से भारी मात्रा में मुद्रा का देश मे आना


इससे कब राहत मिलेगी

तुरंत राहत मिलने की तो कोई उम्मीद नही हैं. क्रुड ऑयल के भाव कुछ कम जरूर हुए हैं लेकिन इससे मुद्रास्फीति की दर में कोई खास फर्क नहीं पडेगा. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मॉनसून अच्छा जाता है और फसल अच्छी होती है तो इसका कुछ असर मुद्रास्फीति की दर पर भी पडेगा. लेकिन अभी तो सिर्फ इंतजार ही करना होगा.


ब्याज की दरें क्या रहेंगी

ब्याज की दरें अमूमन मुद्रास्फीति की दर के साथ ही बढती हैं. यदि मुद्रास्फीति की दर उपर जाती है तो ब्याज की दरें भी बढती है. अभी वार्षिक ब्याज की दर करीब 8% है और मुद्रास्फीति 11% है यानि कि 3% नकारात्मक ब्याज दर लागू है. जो समय के साथ ठीक की जाती रहेगी. 

शेयर बाजार का रूख क्या रहेगा

शेयर बाजार और ब्याज की दरें भी एक दूसरे से संबंध रखती है. जब ये दरें अधिक होती हैं तो शेयर बाजार मे गिरावट देखी जाती है. जब मुद्रास्फीति की दर बढ जाती है तो कम्पनियाँ अपने बढ रहे खर्चों को ग्राहकों के उपर ही डालती है, जीवन जरूरी चीजों की कीमते बढने से जो हताशा का माहौल बनता है उसका नकारात्मक असर शेयर बाजार पर पडता है.

तो इसका क्या इलाज है?

अपने खर्चों को व्यवस्थित करना ही एकमात्र उपाय है. एक आकलन के मुताबिक 10000 रूपयों की कीमत घटकर 9009 रूपये हो गई है. मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए यह स्थिति बद से बदतर होती जा रही है. इसलिए उनके पास जो एकमात्र उपाय रह गया है वह है अपने दैनिक खर्चों का विश्लेषण कर उनमें यथासम्भव कमी लाना. सार्वजनिक परिवहन प्रणाली का इस्तेमाल, मनोरंजन के खर्चों मे कमी और आय के स्रोत बढाना कुछ उपाय हो सकते हैं.
 





टिप्पणियाँ (3)add
रोज जेब कट रही है
द्वारा प्रेषित सुरेश चंद्र गुप्ता , जून 21, 2008
विशेषज्ञों का काम है विश्लेषण करना, वह करते रहें और अपनी प्यास वुझाते रहें. हमारी तो जेब कट रही है, हर रोज कीमतें ऊपर चली जाती हैं. कल जो सब्जी १६ रुपए किलो थी, आज २० रुपए किलो है. पेंशन याफ्ता लोगों के दिल में इस सरकार के लिए केवल बद्दुआ है.

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जेब का काम तो कटना ही है
द्वारा प्रेषित अविनाश वाचस्‍पति , जून 28, 2008
जेब का जन्‍म ही कटने के लिए हुआ है। दर्जी जब से काटना शुरू करता है। उसके बाद जेब कटना कभी नहीं रूकती। इस जेबकटी में सरकारों की भूमिका बड़ी जायकेदार होती है। सबसे बड़ी जेबकट तो सरकार ही है जो अपने असर का प्रयोग या दुष्‍प्रयोग कर काटती रहती है। बाकी तो माल निकाल कर छोड़ देते हैं जेब को सही सलामत पर सरकार उसमें कट लगा देती है और माल निरंतर बहता रहता है, जेब से बाहर निकलता रहता है. इस जेबकतरे या जेबकटर को कौन पकड़ सका है.
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मुद्रास्फ़ीती तो बनी रहेगी
द्वारा प्रेषित गरिमा , जुलाई 16, 2008
मुद्रा स्फ़ीती तो बनी रहेगी, अभी कम होने के कोई चान्स नही है, पर जेब को भरा पुरा रखने के लिये हम कुछ नये कदम उठा सकते हैं, आय के नये स्रोत की तलाश कर सकते हैं, जिससे हम भी दुनिया के साथ कदम मिला के चले ना कि अपने बजट मे काटपीट करके जीना पडे।
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