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रविवार की दोपहर और बकवास फिल्म |
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मंतव्य
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सोमवार , , 23 जून |
मंतव्य
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पंकज बेंगाणी
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अधिकतर समय मै फिल्म समीक्षकों की राय पर यकीन नहीं करता. फिल्म समीक्षकों की राय उनकी अपनी पसंद और नापसंद पर निर्भर करती है. कोई फिल्म किसी को पसंद आती है तो दूसरे को नहीं आती. पास पास की सीट पर बैठे दो समीक्षक अलग अलग राय दे सकते हैं.
इसलिए समीक्षक के दिए सितारों पर यकीन ना रखते हुए खुद फिल्म देखकर तय करना जरूरी होता है. लेकिन फिर उसमे एक खतरा यह होता है कि आपके जेब से पैसे भी जाते हैं और समय भी जाता है.
लेकिन कभी कभी रिस्क लिया जा सकता है. खासकर तब जब फिल्म प्रियदर्शन की हिन्दी फिल्म हो और ओम पुरी तथा परेश रावल भी हों. तो एक गेरेंटी मिल जाती है कि फिल्म में कॉमेडी तो होगी. तो कुछ टाइमपास भी होगा.
पीछले दिनों मैं खराब रेटिंग के बावजूद "मेरे बाप पहले आप" देखने बैठा और फिल्म आधी छोडकर जब सो गया तब यह सोच रहा था आखिर मैने फिल्म देखनी क्यों शुरू की थी.
क्या कोई इतनी बकवास फिल्म भी बना सकता है. और अगर "कोई" का मतलब प्रियदर्शन हो तो मामला गम्भीर मानना चाहिए.
प्रियन थोक के भाव फिल्मे बनाते हैं. एक साथ 5-10 फिल्मो का निर्देशन करते हैं. लोग तारीफ करते हैं कि फिर भी वे अच्छी फिल्में दे पाते हैं. लेकिन कभी ना कभी तो गडबड होगी ही! और गडबड वाली फिल्म यदि रविवार की दोपहर को देखी गई हो तो उसका असर कुछ लम्बे काल तक रहता है.
मेरे साथ शायद यही होगा.
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