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फिल्म समीक्षा: थोडा प्यार थोडा मैजिक |
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समीक्षा
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शनिवार , , 28 जून |
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हल्की फुल्की, टिपिकल बॉलीवुड मसाला फिल्म देखनी हो तो थोडा प्यार थोडा मैजिक जरूर देखिए. अन्यथा अपना समय परिवार के साथ बिताइए.
यदि मैं कहुँ कि यशराज फिल्मस के पास कहानियों की कमी हो गई है तो शायद मैं झूठ नही बोल रही हुँ. यशराज फिल्मस की अधिकतर कहानियाँ नई बोतल में पुरानी शराब जैसी लगती हैं. उनकी फिल्मे ऐसी होती हैं जिन्हे फील गुड फिल्मे कहा जा सकता है. जहाँ अंत मे सबकुछ ठीक हो जाता है और यदि नहीं होता तो फिल्म अभी बाकी है मेरे दोस्त.
कहानी:
रणवीर [सैफ अली खान]एक धनवान बिगडैल किस्म के व्यक्ति हैं (सैफ के लिए यह भूमिका आसान रही होगी). कोर्ट के एक फैसले के बाद उन्हे चार अनाथ बच्चों का लालन पालन करना पडता है. ना तो उन्हे बच्चे पसंद हैं ना ही बच्चों को सैफ पसंद हैं. एक रात वे भगवान से गुहार लगाते हैं और लीजिए भगवान भी पसीज जाते हैं और उनकी मदद करने ऐंजल [रानी मुखर्जी] को भेज देते हैं.
जी नहीं, आप उन्हे परी मत कहिए. परी तो मध्यमवर्गीय जूमला हो गया. फील गुड फिल्मों में ऐंजल होती है. जो पहले जादू दिखाएगी फिर समाज सुधारक का रोल अदा करेगी.
और अंत. अब जाने भी दीजिए, किसी बच्चे को भी पता होगा कि अंत क्या होगा.
फिल्म क्यों देखें:
हल्की फुल्की फिल्म देखना चाहते हों और यदि आपके बच्चे कार्टुन बहुत अधिक देखते हों तो परिवार के साथ यह फिल्म जरूर देखिए. आपके बच्चों को कम से कम यह फिल्म अच्छी लग सकती है.
फिल्म क्यों ना देखें:
कुछ अलग और सार्थक देखने की ईच्छा हो तो कोई और विकल्प ढुंढिए. ना मिले तो डीवीडी पर पुरानी कोई फिल्म ही देख लीजिए. लेकिन यदि शंकर अहसान लॉय का थका हुआ संगीत, बेतुके सवांद, सपनों की दूनिया, ऐंजल की करामात और अंत भला तो सब भला देखना हो तो यह फिल्म देख सकते हैं.
अंत मे:
जरूरी नहीं कि आपके बच्चों को यह फिल्म पसंद आए ही, लेकिन आ भी सकती है. वैसे कई लोगों को मसाला फिल्में अच्छी भी लगती है. अब यह आपकी पसंद पर निर्भर करता है.
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