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संपादकीय अनुभवों को भोगना
मेरे विचार
सोमवार , , 21 जुलाई
मेरे विचार
manojkumar.jpg मनोज सिंह



'माना कि परिंदों को पंख हुआ करते हैं, ख्वाबों में उड़ना कोई गुनाह तो नहीं' इन पंक्तियों ने मन में बहुत पहले अनायास ही जन्म लिया था। कैसे और क्यूं उत्पन्न हुईं, यह तो नहीं पता मगर हां, जीवन के हर मोड़ पर इसने राह खूब दिखाई। हो सकता है कुछ नया करने की प्रेरणा, जिसे सनक भी कह सकते हैं, की ऊर्जा इन्हीं शब्दों से मिलती रही हो। वैसे कुछ नया करने की इच्छा हर एक व्यक्ति में होती है। और कुछ बनने के सपने जन्म देते हैं महत्वकांक्षाओं को। परिवर्तन प्रकृति का नियम है तो यह हमारे व्यक्तित्व का प्रथम गुण, पहली चाहत। कभी-कभी किसी घटना-दुर्घटना से व्यथित होकर भी प्रतिक्रियात्मक रूप से कुछ करने की इच्छा उभरती है। वैसे मुझे बचपन से नये-नये प्रयोग करने की एक आदत-सी बन गयी है। मगर इसे संयोग ही कहेंगे कि पूर्व में किसी पत्रिका के संपादन करने के ऑफर को जहां मैं स्वीकार करने को हिम्मत नहीं जुटा पाया वहीं कहानी लेखन महाविद्यालय अम्बाला की श्रीमती उर्मि कृष्ण जी से एक छोटी-सी बातचीत के दौरान उनकी प्रतिष्ठित पत्रिका शुभ तारिका के चंडीगढ़ विशेषांक को संपादित करने के कार्य को स्वीकार करने में मिनट नहीं लगा।

इतने वर्षों से लेखन से जुड़ा होने के कारण संपादकों से आमना-सामना तो होता ही रहता है। उनके प्रति आकर्षण और ईर्ष्या होना स्वाभाविक है। विचारों पर कई बार मुठभेड़ हो जाती। उनके द्वारा कई बार रचनाएं स्वीकार की जातीं तो कई बार अस्वीकृत। कई बार मन में प्रश्न उभरता कि जो मेरी जगह छपे हैं क्या वो मुझसे बेहतर हैं? देखने पर ऐसा लगता नहीं। यह स्वयं के प्रति मोह भी हो सकता है। लेकिन फिर संपादक के प्रति विरोध और विद्रोह तो पनप ही जाता। अब मेरे विरुद्ध भी इसी तरह की भावनाएं कइयों के दिलो-दिमाग में पनप रही होंगी। जिसके लिए मुझे मानसिक व सामाजिक रूप से तैयार रहना होगा। इसमें कोई शक नहीं कि सरेआम गुटबाजी, भाई-भतीजावाद और हर तरह के हथकंडे प्रकाशन और संपादन के क्षेत्र में भी प्रारंभ से हैं। इससे किसी का फायदा हो न हो, अंत में पाठक का नुकसान जरूर होता है। वो ऐसी बहुत-सी जानकारियों, सूचना, ज्ञान व विचारों से वंचित रह जाता है जिसे वो पढ़ सकता था, अच्छा लेखक तो हतोत्साहित होता ही है। संपादन का दूसरा अध्याय, एक वरिष्ठ लेखक ने (नाम यहां आवश्यक नहीं) अपने एक लेख में लिखा था कि हिन्दी साहित्य में तथाकथित चर्चित व सफल नाम कहीं न कहीं संपादक जरूर थे। अर्थात्‌ जाने-अनजाने वे अपनी मदद कर गये। बात ठीक लगती है अन्यथा केवल वो ही बेहतर रचनाकार थे ऐसा बिल्कुल भी नहीं। तो कहीं मूल में यही वजह तो नहीं जिस कारण से मैंने संपादन का स्वाद चखने के लिए इस क्षेत्र का अतिथि बनना स्वीकार किया? इस बात की संभावना से मैं इंकार नहीं करता क्योंकि इंसान होने की वजह से वो तमाम मानवीय गुण-अवगुण मुझमें भी रचे बसे हैं जो कि अन्य में देखे जा सकते हैं। लेकिन इतना तो कह सकता हूं कि मेरा भरसक प्रयास रहा कि उपरोक्त सभी दुर्भावनाओं से ऊपर उठने का प्रयास करूं। फलस्वरूप पाठक के पास नवीनतम व श्रेष्ठ विचारों का सम्मिश्रण साधारण शब्दों में लिपटकर सरलता से पहुंच सके।

लेखन के क्षेत्र में, कार्पोरेट व नौकरी की प्रतिस्पर्धा, पैसे की चकाचौंध, मृगतृष्णा से चित्रित महत्वकांक्षा, अंतहीन भागदौड़, राजनीति जिसका कभी शिकार तो कभी शिकारी बनता हुआ, अंत में अशांत होकर आया था। सोचा था कुछ शांति, राहत और सकारात्मक ऊर्जा मिलेगी। पर उतनी ही उठापटक, लेखकों में गुटबाजी और जबरदस्त ईर्ष्या और प्रकाशक-लेखक का घमासान देखकर हैरान हुआ था। कुछ दिनों बाद ही समझ पाया था कि आखिरकार यहां भी तो इंसान ही हैं फिर इनसे भगवान वाले गुणों की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। ऊपर से फिर लेखकगण तो बुद्धि वाले हैं वे दूसरे को कैसे स्वीकार कर सकते हैं। फिर भी लेखकों के बीच मानसिक प्रतिस्पर्धा के संतुलन को बनाने का प्रयास अति महत्वपूर्ण है। यह नये रचनाकारों को जन्म देता है।
विशेषांक पर कार्य शुरू करते ही मेरे मन में एक विचार आया था कि यह विशिष्ट होना चाहिए। इसे मेरा अहम्‌ भी कहा जा सकता है और स्वभाव भी। अब इस विशिष्ट को परिभाषित करना नामुमकिन है। किसी एक का विशिष्ट दूसरे के लिए व्यर्थ तो तीसरे के लिए सामान्य हो सकता है। तभी सवाल उठा कि विशिष्ट बनाने के लिए क्या-क्या किया जाए। प्रथम विचार आया, मुद्रण, सेटअप, गेटअप, आकर्षण को लेकर। मार्केटिंग का जमाना है। चमकदार चीजें आकर्षित करती हैं। यह तो ठीक है, लेकिन पैकिंग के अंदर अगर सामग्री ठीक और ठोस नहीं तो उपभोक्ता संतुष्ट नहीं होता, आगे के लिए संबंध नहीं जोड़ता। तो फिर सामग्री के संदर्भ में चिंतन शुरू किया। यह पठनीय, विविधतापूर्ण, गहरी मगर सरल, उद्देश्यपूर्ण मगर सहज, ज्ञानपूर्वक मगर व्यावहारिक होनी चाहिए। आगे विचार आया कि स्थापित लेखन जैसी कोई बात नहीं होती। नये विचार, नये रास्ते से ही आते हैं। सभी बड़े लेखक व साहित्यकारों ने भी कभी न कभी, कहीं न कहीं से शुरुआत की होगी। और फिर नवीनता भी तो जरूरी है। वैसे भी पत्रिका में हर क्षेत्र व वर्ग का अनुभव रखने वाले लेखक के होने से उसकी पठनीयता व उपयोगिता बढ़ती है। अंततः यही कोशिश रही कि स्थापित लेखकों के अलावा अधिक से अधिक, नये से नये, हरेक क्षेत्र के प्रतिनिधि के रूप में, अनुभवी व शीर्ष व्यक्तियों को जोड़ सकूं। फिर चाहे वो सेवानिवृत्त नौकरशाह हो, स्थापित पत्रकार, इंजीनियर, डॉक्टर या फिर महत्वाकांक्षी टेक्नोक्रेट। असल में हिन्दी का नया पाठकवर्ग तैयार करने के लिए यह जरूरी भी है। साहित्य के नाम पर सिर्फ ड्राइंगरूम गोष्ठियों या अलमीरा बंद पुस्तक से काम नहीं चलेगा। यह एक प्रमुख कारण है जो हिन्दी का पाठक नदारद है। साहित्य को जिंदा व खुशहाल बनाये रखने के लिए भाषा को खुले में घूमने दो, फिर देखो प्रसार व प्रचार।

पत्रिका में साहित्य के स्थायी स्वाद के लिए कहानी कविताओं को डिलीट नहीं किया जा सकता था। लेकिन ये सामान्य पाठकों से दूर क्यों हैं? जवाब हम सभी जानते हैं। मगर पता नहीं क्यों लेखक इससे अनजान बने रहना चाहता है। सत्य है, एक तो पाठक अतिव्यस्त हो चला है। दूसरा रचनाओं में उसे रोक कर पढ़वाने की क्षमता नहीं रही। दर्द नहीं, भाव नहीं, रस नहीं, जीवन नहीं। कविता में तो अमूमन काव्य सौंदर्य ही नहीं। इसी बात को ध्यान में रखकर विशेषांक की रूपरेखा बनाने की कोशिश की गयी। इसमें कितना सफल हुआ हूं यह सिर्फ पाठक का मन-मस्तिष्क जान सकता है, जिसके चलायमान हो जाने मात्र से यह अहसास होगा कि हां तीर निशाने पर लगा है।

कई नये प्रयोग किए। जैसे सफल कवियों से कविता ही लेता तो कुछ नया नहीं था। मैंने उनके व्यक्तित्व को टटोला और पाया कि वे दूसरी विधा में भी चमत्कार कर सकते हैं। कई जगह सिर्फ यह देखा कि लेखक मेहनत कर सकते हैं या नहीं, और लेख लिखवा लिया। एक अतिविशिष्ट व्यक्ति ने लिखने से मना किया, हिन्दी भाषा के लिए तकलीफ बतायी तो कहा गया कि जिस भाषा में बातचीत करते हैं, वही लिख दें। साथ यह भी बतला दिया गया कि चिंता न करें, पढ़ने वाला पाठक भी समझदार है। परिणाम अप्रत्याशित था। हो सकता है कि पत्रिका के कुछ और लेखकों ने भी इस तरह से, विशेष रूप से, हिन्दी में, पूर्व में कुछ भी न लिखा हो। लेकिन फिर यही तो इसकी विशिष्टता होगी। वैसे भी मातृभाषा कभी आड़े नहीं आती। विचार जैसे भी आएं उन्हें उसी रूप में लिख देना अच्छे परिणाम देता है। शायद यह प्रयोग पसंद किया जाए।
नये-नये विषय व शीर्षक पर सोचना, लेखक से उन पर बातचीत, यह एकदम नया और विशिष्ट अनुभव था। मैंने हर एक के साथ हर एक पल का आनंद लिया। इसका मतलब यह भी नहीं कि इस क्षेत्र में कोई तकलीफ नहीं, मुश्किलें नहीं। यह कोई फूलों की शैय्‌या नहीं, इसमें भी कांटे हैं जिसके चुभने का दर्द वहीं समझ सकता है जिसने इसे झेला हो। लेखन का ऐसा बहुत-सा कमजोर पक्ष है जो मैं अब समझ पाया। कटु सत्यों को जान पाया। रचनाओं का शुद्धीकरण व संपादन एक मुश्किल काम है। यह कमर तोड़ देता है। जिन रचनाओं पर रचनाकार पसीना बहा लेता है वहां संपादक को करने के लिए कुछ विशेष नहीं होता मगर जहां रचनाकार ने आलस्य दिखाया संपादक का तेल निकल जाता है।

पहली बार सृजन से दूर सृजन प्रक्रिया का मात्र साक्षी रहा हूं। प्रसव पीड़ा व जनन में दाई की भूमिका निभाने के आनंद का बयान चंद शब्दों में मुश्किल है। हां, इस भोगे हुए सत्य का उपयोग अपनी अगली किसी कहानी या उपन्यास में कर सकता हूं। पाठकों के लिए यह रोचक होगा।

***
मनोज सिंह
425/3, सेक्टर 30-ए, चंडीगढ़।
www.manojsingh.com


 

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