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फिल्म समीक्षा: मिशन इस्ताम्बुल |
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समीक्षा
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शनिवार , , 26 जुलाई |
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आतंकवाद एक ऐसा विषय हो गया है जिसको लेकर हर किसी को लगता है कि उसे विशेषज्ञता प्राप्त है. किसी भी स्क्रिप्ट लेखक को ले लीजिए वह आपको एक आतंकवाद आधारित कहानी लिखकर दे सकता है. यह अलग बात है कि इतने जटिल विषय का ढंग से अभ्यास करना शायद ही कोई जरूरी समझता है.
मिशन इस्ताम्बुल ऐसी ही एक फिल्म है. फिल्म अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद पर आधारित है. फिल्म मे सबकुछ है बस एक ही चीज नहीं है. और वह चीज ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण है. फिल्म की पटकथा ही बेजान है.
कहानी:
एक उभरते हुए पत्रकार विकास [जायेद खान] को औवेस [सुनील शेट्टी], जो कि इस्ताम्बुल के एक टीवी चैनल अल जोहरा [क्या यह आपको अल जजीरा की याद दिलाता है] के निदेशक हैं, अपने चैनल से जुडने का प्रस्ताव देते हैं. अपनी पत्नी अंजली [श्रिया सरन] से तलाक के केस में उलझे विकास के लिए यह एक अच्छा प्रस्ताव होता है. लेकिन वह नहीं जानता कि उसका भविष्य उसे किन मुश्किलों मे डालने वाला है.
औवेस का कत्ल हो जाता है और एक तुर्की कमांडो रिजवान [विवेक ओबेराय] उसे बताता है कि अगर वह जल्दी से देश छोडकर नहीं गया तो उसका हाल भी बुरा होगा....
फिल्म क्यों देखें:
फिल्म के लोकेशन अच्छे हैं. फिल्म भारत से तुर्की फिर अफगानिस्तान होते हुए फिर से तुर्की तक जाती है. फिल्म के एक्शन सीन भी काफी अच्छे हैं. जायेद खान और विवेक ओबेराय ने अच्छा अभिनय किया है. श्रिया फिल्म में अच्छी लगी हैं.
फिल्म क्यों ना देखें:
बहुत से कारण हैं. फिल्म लम्बी है और बहुत सारे झोल हैं. फिल्म मे पटकथा जैसी कोई चीज नहीं है और आतंकवादियों की पुरी सेना को सिर्फ दो सुपर हीरो तबाह कर देते हैं. लेकिन फिर यह बॉलीवुड मसाला फिल्म है, यह तो होता ही है.
अंत मे:
इस सप्ताहांत आप कोई और विकल्प भी देख सकते हैं. मिशन इस्ताम्बुल अपने मिशन मे फेल हुई है.
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