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मेरे विचार
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सोमवार , , 28 जुलाई |
मेरे विचार
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मनोज सिंह
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ईश्वर द्वारा बनाई गई मनुष्य की शारीरिक संरचना पर ध्यान दें तो बोलने के लिए जहां सिर्फ एक मुंह दिया गया है वहीं सुनने के लिए दो कान उपलब्ध हैं। प्रकृति की इस व्यवस्था पर बहुत अधिक लिखा-पढ़ा और बताया गया है। युगों-युगों से कहा जाता रहा है कि हमें कम से कम बोलना और अधिक से अधिक सुनना चाहिए। इसके कई फायदे गिनाये जाते रहे हैं। वैसे भी अधिक बोलने पर गलत बोलने की संभावना बढ़ जाती है और अधिक सुनने से सूचना व ज्ञान में बढ़ोतरी होती है। यह पूर्णतः आज भी सत्य है। प्रशासनिक व प्रबंधन की सफलता का यह प्रमुख राज़ है कि शीर्ष पर बैठे व्यक्ति को अधिक सुनना चाहिए। इसके माध्यम से उन्हें अपने व्यवस्था की ज्यादा से ज्यादा जानकारी व सूचना मिलती है। अंग्रेज़ी में इसके लिए सही शब्द है 'फीडबैक'। और फिर सुधार के लिए यथोचित दोषनिवारक क्रियाएं की जा सकती हैं। अधिक बोलने से बचने के लिए ज्ञानियों ने भी बहुत कुछ कहा है। इस संदर्भ से तो धर्म और धार्मिक पुस्तकें भरी पड़ी हैं। प्राचीन युग में राजाओं को भी ऐसी ही कुछ शिक्षा दी जाती थी। राजदरबार की व्यवस्थाएं भी कुछ इसी तरह की होती थी तभी तो गुप्तचर से लेकर विभिन्न मंत्रीगण राजा के लिए कान का ही काम करते थे। हां, राजा के द्वारा बोला गया एक भी शब्द आदेश बन जाता था। इसीलिए राजा को कम से कम बोलने की हिदायत हुआ करती थी। सफल सम्राटों में यह गुण आसानी से देखा जा सकता है। क्रोधी और बड़बोले राजाओं को इतिहास ने कभी माफ नहीं किया। चाणक्य नीति में कहा गया है कि प्रशासन को अगर बेहतर ढंग से चलाना है तो राजा में अधिक से अधिक सुनने की क्षमता होनी चाहिए। साहित्य, दर्शन और चिंतन में तो एक कदम आगे बढ़कर कहा गया है कि निंदा करने वालों को अपने नजदीक रखकर उन्हें और अधिक सुनना चाहिए। परंतु क्या यह वास्तविक जीवन में संभव है? क्या ऐसा किया जाता है? आमतौर पर नहीं। सामान्यतः हम जैसे अधिकांश जन बक-बक करने में अपनी हेकड़ी समझते हैं और परिणामस्वरूप अक्सर बेवकूफ समझे जाने का शिकार होते हैं। ऐसे लोगों को गंभीरता से नहीं लिया जाता। अपने चारों ओर नजर दौड़ाए तो आज भी पायेंगे कि अपने-अपने क्षेत्र के शीर्ष, सफल व वास्तविकता में जो महान हैं, वो बहुत कम बोला करते हैं। मौन को शास्त्र ने भी कई स्थान पर उचित व गुणकारी कहा है। यह कई मुसीबतों को टालता व ऊर्जा बचाता है।
विगत सप्ताह एक चर्चा कार्यक्रम में छह महानुभावों का भाषण होना था। यह अपने-अपने क्षेत्र के शीर्ष पुरुष हैं। विषय सुनिश्चित था। आयोजकों ने समय सीमा के बारे में उन्हें पूर्व में ही अगाह कर दिया था। ये सभी दिग्गज, अनुभवी, ज्ञानी और नामी हैं। ऐसा भी नहीं कि इन्हें बोलने का मौका नहीं मिलता। उसके बावजूद जो कुछ देखा वो बड़ा अप्रत्याशित ही नहीं अटपटा भी था। पहले ही वक्ता द्वारा समय की सारी सीमाएं तोड़ दी गयी थीं। दोगुना तिगुना समय तक बोला गया। और तो और विषय-वस्तु से हटकर बोला गया। बातचीत के केंद्र में शीर्षक था ही नहीं। दुर्भाग्यवश आगे के वक्ताओं का भी यही हाल था। शुरू के एक-दो वक्ताओं को तो श्रोतागण झेलते रहे। परंतु फिर उनके चेहरों पर भी शिकन आने लगी थी। तीसरे वक्ता के आते-आते तो आयोजक के चेहरे पर भी पसीना था। समय की सीमा अवधि बढ़ती देख, जब आगे का कार्यक्रम चौपट होने लगा तो आयोजकों ने वक्ता के पास एक छोटा-सा कागज का टुकड़ा भेजा, जिसमें लिखा था, 'समय का ध्यान रखें'। खैर, वक्ता ने समझदारी दिखाई और अपनी बात तुरंत खत्म कर दी। मगर तब तक माहौल बिगड़ चुका था और समय हाथ से निकल भागा था। वक्ता के यह कहने पर कि मुझे समय के लिए चेतावनी आ गयी है, दर्शक हंस पड़े थे। यह पूरे भाषण में श्रोताओं की तरफ से पहली अच्छी प्रतिक्रिया थी। अगले एक वक्ता ने जब इस बात पर विशेष ध्यान दिया तो श्रोताओं का मंत्रमुग्ध होना स्वाभाविक था। वे न केवल अपनी सीमा में रहकर बोले अपितु अपनी बात ज्यादा अधिक प्रभावपूर्ण ढंग से सभी के समक्ष रख पाये और अंत में श्रोताओं के बीच चर्चा का विषय बने। मगर फिर बात यहीं खत्म नहीं हो जाती, आगे आने वाले वक्ताओं ने फिर वही गलती की और जानते हुए भी कि श्रोताओं की सहनशक्ति खत्म हो चुकी है वे उसी विस्तार में बोलते रहे। हां, यह जरूर हुआ कि कुछ एक ने समय का प्रेशर देख अपनी बात ज्यादा तीव्र गति से बोली जिसके चलते जल्दबाजी में बहुत कुछ गलत बोल दिया गया। अंत में कार्यक्रम से निकलते हुए लोगों के बीच, विषय और वक्ता से अधिक उनके द्वारा ज्यादा अधिक बोलना चर्चा का विषय रहा, और लोग वक्ताओं की हंसी उड़ाते नजर आये।
आमतौर पर यह एक सामान्य परिस्थिति है। हिन्दुस्तान में ऐसा अधिकांश कार्यक्रमों में पाया जाता है। राजनेता तो इसके लिए पूरी तरह बदनाम हैं। एक तो वे देरी से आते हैं और आकर बहुत अधिक लंबा भाषण देना शुरू कर देते हैं। ऐसा ही कुछ हाल विशेष रूप से अध्यापन से जुड़े हुए उन तमाम महानुभावों का भी है, जो अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और अध्यक्ष भी अक्सर इस तरह की गलतियां करते पाये जाते हैं। श्रोतागण उनकी इस मार को सहने के लिए मजबूर हो जाते हैं और अक्सर आगे कभी न आने की कसम खाते हैं। तभी इन कार्यक्रमों में सुनने वाले कम, बोलने वाले अधिक होते हैं। कई जगह तो सुनने वालों को लालच देकर बैठाया जाता है। धर्मोपदेश देने वाले गुरु भी इस तरह की आदत के शिकार होते देखे जा सकते हैं। मगर यहां चूंकि श्रोता-भक्त धर्म की भक्ति में डूबा हुआ होता है इसलिए उसे समय का ध्यान नहीं होता।
अधिक बोलना एक तरह की मानसिक बीमारी है। जिस तरह से शराब को देखकर, सुंदर स्त्रियों को देखकर, आकर्षक वस्तुओं को देखकर, कई लोगों का दिल ललचा जाता हैं, और फिर उन्हें कुछ याद नहीं रहता। कुछ एक लोग तो अपना होश तक खो देते हैं। अनैतिक व असमाजिक कार्य करने के लिए प्रेरित हो जाते हैं। कई हिंसा के पीछे यह एक प्रमुख कारण होता है। ऐसा ही कुछ मंच व माइक को देखकर कुछ लोगों के साथ होता है। वो सब कुछ भूल जाते हैं। उन्हें होश ही नहीं होता कि सामने वाले के साथ कहीं ज्यादती तो नहीं हो रही। एक और उदाहरण देखें, यह जानते हुए भी कि पाचनशक्ति जवाब दे देगी, हम अधिक से अधिक दिनभर खाने में विश्वास रखते हैं। यही हाल मंच पर चढ़ते ही अधिकांश लोगों के साथ होता है। उन्हें बोलना शुरू करते ही कुछ और दिखाई नहीं देता। वे भूल जाते हैं कि सुनने वाले को उनके शब्दों से अपच हो सकती है। वे यह भी नहीं जानना चाहते कि जिनके लिए वे बोल रहे है क्या वे वास्तव में उन्हें सुनना चाहते हैं? क्या उन्हें पसंद किया जा रहा हैं?
असल में बोलना एक कला है। अच्छा वक्ता होना मानवीय गुण है जो मेरे मतानुसार जन्मजात होती है। इसे कुछ हद तक ही विकसित किया जा सकता है। ऐसा भी देखा गया है कि कुछ ज्ञानी अच्छे वक्ता नहीं होते और कुछ अज्ञानी अच्छा बोलकर अपना प्रभाव छोड़ जाते हैं। इसीलिए आयोजकों को किसी भी वक्ता को सुनिश्चित करने से पहले उसके इस गुण को परख लेना चाहिए। क्या वो कार्यक्रम के दौरान प्रभाव छोड़ पायेगा, समझ लेना चाहिए। अन्यथा आप किसी को कितना भी कह लीजिए माइक पर पहुंचते ही लोग अपनी हरकतों से बाज नहीं आते और मंच देखते ही उन्हें नशा चढ़ने लगता है। श्रोताओं को भी उसी कार्यक्रम में जाना चाहिए जहां जांचे-परखे वक्ताओं का नाम दिया गया हो अन्यथा उन्हें बोरियत के अलावा कुछ नहीं मिलेगा।
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मनोज सिंह
425/3, सेक्टर 30-ए, चंडीगढ़।
www.manojsingh.com
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