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राष्ट्र बनने की चुनौती
मेरे विचार
सोमवार , , 18 अगस्त
मेरे विचार
manojkumar.jpg मनोज सिंह



विगत सप्ताह आठ तारीख की देर शाम अमेरिका के एक मित्र को फोन किया तो उसने कुछ देर बातचीत करने के पश्चात आगे बात करने में दिलचस्पी नहीं दिखाई तो मैं आश्चर्यचकित हुआ था। कोई गलतफहमी होती उसके पहले ही वो बोल पड़ा, तू ओलम्पिक नहीं देख रहा। मैंने कहा था, नहीं। वो जल्दी में लग रहा था, तभी तुरंत बोल पड़ा, तो तू पहले टीवी ऑन कर और देख, अब तो क्लाइमेक्स आ रहा है, देख, चीन का बढ़ता साम्राज्य, बाकी बात हम कल कर लेंगे। और उसने तुरंत फोन काट दिया था। हारकर मैं टीवी ऑन करने के लिए मजबूर हुआ था। देखा तो सत्य था। चीन अपना वैभव दिखाने में सफल था। तेज रोशनी में नहाता भव्य कार्यक्रम, आधुनिक विज्ञान का सफल प्रदर्शन। यही नहीं, हजारों एथलीट, सैकड़ों राष्ट्राध्यक्ष व लाखों लोग और करोड़ों टीवी दर्शकों के सामने अपने वैभवपूर्ण इतिहास व गौरवशाली संस्कृति को दिखाकर मानो वो फूला नहीं समा रहा था। और हम सब उसे एक टक निहार रहे थे। टीवी चैनलों के पास, खासकर हमारे हिन्दी समाचार चैनलों के लिए तो वैसे भी आग लगाने वाली काल्पनिक बातों व सवालों की कोई कमी नहीं होती।

चिल्ला-चिल्ला कर बार-बार चीन को भावी महाशक्ति घोषित कर रहे थे। अमेरिका को मानो चिढ़ाने की कोशिश की जा रही थी। ऐसा महसूस कराया जा रहा था कि मानो अमेरिका इसे सुनकर बिल में घुस जायेगा। हमें किसी और की सफलता पर उसके प्रतिद्वंद्वी को चिढ़ाने में खुशी व अत्यधिक संतुष्टि मिलती है। फिर चाहे हम स्वयं कुछ न हो। इसी बीच एक अंग्रेजी समाचारपत्र के संपादक ने अंग्रेजी में जो बोलना शुरू किया तो लगा कि वो हम सभी को लताड़ रहा है। साथ में संचालन कर रहे टीवी के उस उदघोषक को तो क्या फर्क पड़ना था वो तो वैसे भी विशेष गुणों सेलैस होते हैं, चेहरे पर कोई शिकन नहीं, मगर मुझे संपादक की बातों में सत्यता लगी थी। और मैं उसकी नजर से बीजिंग को देखने लगा। एक विकास करता, तीव्र गति से आगे बढ़ता राष्ट्र। एक अनुशासित व संगठित राष्ट्र। देश प्रेम में डूबा अवाम, जिसका अपनी संस्कृति के प्रति मोह साफ झलक रहा था। एक कुशल नेतृत्व व परिपक्व राजनीतिज्ञ जिज्ञासा। इन्ही सब बातों का तो नतीजा था कि बीजिंग ओलम्पिक व्यवस्थित रूप से ऐसे चल रहा था मानो किसी ने सच कहा हो कि रिमोट कंट्रोल से चीजें चल रही हैं। अंत में संपादक महोदय का कहना था कि हमें इससे सबक लेना चाहिए, हमें इसे समझना चाहिए, हमें सीखना चाहिए।

सर्वप्रथम सवाल उठता है कि इस तरह की बातें सुनकर भी कितने लोगों ने अपने आप को सोचने के लिए मजबूर किया होगा? कुछ देर तो शायद असर रहा भी हो मगर फिर जल्द ही हम अपने असली रूप में आ गए होंगे। दूसरे दिन हमारे समाचारपत्र भी चीन की बड़ाई से भरे पड़े थे। इसमें कोई बुराई नहीं है। यह होना भी चाहिए। दूसरे की सफलता हो या खुशियां उसमें शरीक होकर खुश होना अच्छी बात है मगर सदैव ताली बजाते रहना ठीक नहीं। ऊपर से स्वयं निट्ठले बैठे रहना या हालात का रोना रोना, मूर्खता कहलाती है। यह कमजोर लोगों की निशानी है। दूसरे के घर की प्रशंसा करने की आदत तब तक अच्छी है जब तक हम अपने घर को व्यवस्थित करने का प्रयास कर रहे हों। क्या इतना बड़ा आयोजन हमारे यहां संभव है? नहीं। आज की तारीख में हम ऐसा सोच भी नहीं सकते। तो सवाल उठता है क्यूं नहीं? हमारे यहां तो छोटे से छोटे आयोजन के लिए भी बड़ी-बड़ी कमेटियां बना दी जाती हैं परिणामस्वरूप खींचातानी में कोई कार्य नहीं हो पाता। और अक्सर अंत में भागादौड़ी करके हम हर काम को किसी तरह निपटाते हैं। कोई भी प्रोजेक्ट कभी समय पर पूरा नहीं होता। हमारा नेतृत्व आपस की मोहब्बत में ही फंसा रहता है। उपरोक्त संपादक ने भी इसी तरह के कई सवाल खड़े किए थे जो सभी सही और संदर्भित थे। सुनने में बड़े तीखे लग रहे थे। असरदार भी थे। मगर न तो दर्शकों में न ही नेतृत्व को सोचने की परवाह दिखाई दी।

बीजिंग ओलम्पिक को देखकर लगा कि क्या हम वास्तव में एक राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान बना पाये हैं? शायद नहीं। चीन के इस ओलम्पिक में उनकी अपनी भाषा थी, उनकी अपनी संस्कृति, उनकी अपनी पहचान। नीचे से लेकर शीर्ष तक हर एक चीनी आयोजन में समर्पित दिखा। क्या हमारे यहां यह संभव है? बिल्कुल नहीं। बहाने बनाने की आवश्यकता नहीं, सत्य को स्वीकार करने में भी हमें तकलीफ होती है। क्या हम एक संगठित राष्ट्र के रूप में खड़े हो सकते हैं? बिल्कुल भी नहीं। क्या हमारा अवाम इस तरह से पूर्णतः सुगठित और अपनी मंजिल की ओर मजबूती से आगे बढ़ता हुआ दिखाई देता है? बिल्कुल नहीं। क्या हमारा नेतृत्व अपनी भाषा में बात करने के लिए तैयार है? बिल्कुल नहीं। हम अंग्रेजी के पक्ष में अच्छे-अच्छे तर्क दे सकते हैं, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में अपनी पकड़ बनाये रखने के लिए बाते बना सकते हैं। सवाल करना चाहिए कि क्या चीन को इसकी आवश्यकता नहीं? बिल्कुल है। मगर उसने अपनी पहचान बनाए रखते हुए विश्व बाजार पर ज्यादा मजबूत पकड़ बनायी है।

विदेश प्रवास के दौरान, एक बार एक चीनी से मुलाकात हुई थी। उसके मन में, व्यक्तित्व में अपने राष्ट्र, भाषा, संस्कृति के प्रति मोह देखते बनता था। इसे कट्टरता भी कह सकते हैं। मगर फिर प्रेम के लिए बंधन तो जरूरी है। ऐसा नहीं कि वहां आधुनिकता का असर नहीं। संस्कृति में आदान-प्रदान सतत्‌ प्रक्रिया है। सवाल उठता है कि लेने वाले की नीयत कैसी है। उसकी मानसिकता कहीं संकुचित तो नहीं। हम अपनी संस्कृति को हेय दृष्टि से देखकर तुरंत पश्चिमी देश का पीछा करने के लिए प्रेरित हो जाते हैं। बहुत जल्दी मोहित, बहुत जल्दी नकल करने लगे जाते हैं। यह इंफीरियर काम्प्लेक्स की भावना गलत है। वहीं चीन को एक राष्ट्र के रूप में जब देखा तो महसूस हुआ कि वो अधिक अनुशासित, संगठित, संतुलित, आत्मसम्मान से लैस आत्मसंतुष्ट अवाम है। एक ऐसा राष्ट्र जिसे अपनी कमियों का अहसास है, कमजोरियों का पता है और उसने उसे हटाने और छुपाने की सफल कोशिश की भी है। क्या हमारे यहां इस तरह की राजनैतिक इच्छाशक्ति देखी जा सकती है? शायद नहीं। कहने को तो क्या चीन में भौगोलिक, धार्मिक, सामाजिक व राजनैतिक विभिन्नता नहीं है? बिल्कुल है। तो फिर हमारे यहां ही ऐसे हालात क्यूं? ऐसा प्रजातंत्र किस काम का जो प्रजा को कुछ न दे सके। एक सफल राष्ट्र के रूप में चीन आज आगे बढ़ा है। उसने अपनी बढ़ती आबादी की ओर ध्यान दिया और उसे नियंत्रित किया। वर्षों पूर्व चीन की दीवार बाहरी दुनिया को चीन से दूर रखने के एक प्रयास के रूप में खड़ी की गई थी। आज भी इस दीवार को सांकेतिक रूप में ही सही बरकरार रखा गया है। तभी बाहरी संस्कृति का वहां वो असर नहीं जैसा हमारे यहां है। ऐसा खुलापन किस काम का जो स्वयं का अस्तित्व ही मिटा दे। हमारे लिये सबक है कि क्या अपनी भाषा और संस्कृति के साथ चीन एक नयी चुनौती बनकर नहीं उभरा है? बिल्कुल। मगर हमने इन सब बातों से कोई सबक नहीं लेना। हम तो भविष्य में चीन की सफलता पर उसका गुणगान करने लग जाएं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। क्या हम इतने कमजोर हैं कि हर किसी सफल आदमी के साथ पीछे लग जाते हैं? हम कभी-कभी चीन को अपना प्रतिस्पर्द्धि घोषित करते हैं। क्या ऐसा है? लगता तो नहीं। एक राष्ट्र के रूप में वो हमसे कहीं आगे प्रतीत होता है। इस सत्य को जब तक हम स्वीकार नहीं करेंगे, महाशक्ति बनने की सोच भी नहीं सकते। और कोई शक हो तो ओलंपिक की पदक तालिका पर निगाह डालें, हमारी सारी गलतफहमियां दूर हो जाएगी। क्या करें, हमारी फितरत है जो हम राजनीति में खेल भावना नहीं रख पाते और खेल में राजनीति करके उसका भी सत्यानाश कर देते हैं।

***
मनोज सिंह
425/3, सेक्टर 30-ए, चंडीगढ़।
www.manojsingh.com


 

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