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मुम्बई मेरी जान: फिल्म समीक्षा |
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समीक्षा
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शुक्रवार , , 22 अगस्त |
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जुलाई 2006 को मुम्बई हिल गई थी. मुम्बई की जीवनरेखा मानी जाने वाली लोकल ट्रेनों मे हुए सीरियल धमाकों ने मुम्बई के जनजीवन को तहस नहस कर दिया था. मुम्बई मेरी जान उन्ही पलों को याद करती है.
कहानी
यह फिल्म पाँच कहानियों पर आधारित है. इस फिल्म में एक बहादुर ब्रोडकास्टिंग पत्रकार, एक देशभक्त कोर्पोरेट, एक पुलिस कॉंस्टेबल जो रिटायर होने वाला है, एक अफसर, एक गुस्सेल बेरोजगार युवक और एक कॉफी बनाने वाले की कहानी है.
यह फिल्म इनकी जिंदगी, और धमाकों के दौरान और उसके बाद उनके जीवन पर क्या प्रभाव पडता है उसकी कहानी है. इन लोगों के माध्यम से पुरी मुम्बई के जनमानस को खंगालने की कोशिश की गई है.
क्यों देखें:
यह फिल्म निशिकांत कामत की पहली हिन्दी फिल्म है. उन्होने निर्देशक के रूप में बहुत अच्छा काम किया है. इस फिल्म को बेहतरीन तो नहीं कह सकते लेकिन यह फिल्म एक अच्छे उद्देश्य के साथ बनाई गई बढिया फिल्म है.
परेश रावल, के. के. मेनन और इरफान खान ने बेहतरीन अभिनय किया है. सोहा अली खान और माधवन भी प्रभावित करते हैं लेकिन उनके ट्रेक इतने अच्छे नही हैं.
क्यों ना देखें:
हालाँकि यह फिल्म 2 ही घंटों की है, लेकिन फिर भी कहीं कहीं खिंची हुई लगती है. पार्श्वसंगीत और बढिया हो सकता था. यह एक गम्भीर फिल्म है और मसाला फिल्मों के शौखिन लोगों को इसमें आनंद नही आएगा.
अंत में:
यह फिल्म एक बार जरूर देखनी चाहिए.
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