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समीक्षा
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शनिवार , , 30 अगस्त |
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एक कहावत समझ लीजिए कि बॉलिवुड की फिल्में मध्यांतर तक ही देखी जा सकती हैं, क्योंकि मध्यांतर के बाद अमूमन सभी फिल्में बोझिल और एक जैसी हो जाती हैं. सी कम्पनी भी ऐसी ही फिल्म है. मध्यांतर के बाद कभी भी फिल्म को छोड सकते हैं.
कहानी
यह तीन दोस्तों अक्षय कुमार [तुषार कपूर], मि. जोशी [अनुपम खेर] और लम्बोदर [राजपाल यादव] की कहानी है जो एक सोसाइटी के "सी" विंग मे रहते हैं. सभी अपनी अपनी जिंदगियों से परेशान हैं.
एक दिन वे एक मजाक करते हैं और उन्हे पता भी नही चलता कब उनका मजाक उनकी पूरी जिंदगी को बदल देता है.
क्यों देखें:
फिल्म हिस्सों मे देखी जा सकती है. कहीं यह बहुत हँसाती है तो कहीं बोझिल हो जाती है. अनुपम खेर और तुषार कपूर इस फिल्म मे जमे हैं. तुषार के अभिनय मे निखार आता जा रहा है.
लेकिन सबसे यादगार अभिनय मिथुन चक्रवर्ती का कहा जा सकता है.
क्यों ना देखें:
फिल्म टुकडों मे ही अच्छी है और सबसे बडी कमी फिल्म की पटकथा है. फिल्म जल्दबाजी मे बनाई गई लगती है.
अंत में:
टाइमपास करने के लिए फिल्म देखी जा सकती है, लेकिन यदि ना देखें तो भी कुछ खोने को नही है.
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