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समीक्षा
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शुक्रवार , , 03 अक्टूबर |
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यह अमर चित्रकथा मार्का फिल्म है, जिसमें सबकुछ है बस कहानी नहीं है. और इसलिए यह फिल्म काम नहीं करती. अंत तक यह समझना मुश्किल हो जाता है कि आखिर यह फिल्म बच्चों की है, बडों की है या बुजुर्गों के लिए है. और इसके लिए यदि कोई दोषी है तो वह निर्देशक गोल्डी बहल हैं.
कहानी
फिल्म की कहानी एक सामान्य आदमी आदित्य [अभिषेक बच्चन] की है जो यूरोप में रहता है और अपने असली माँ बाप से अनजान है. उसे नहीं पता कि वह देवताओं का वंशज है.
दूसरी तरह एक मायावी जादूगर रिज राइजादा [के के मेनन] है जो समूद्र मंथन के बाद हासिल हुए अमृत को पाना चाहता है. वह द्रोण को ढूँढ रहा है लेकिन जानता नहीं कि वह कौन है.
सोनिया [प्रियंका चोपडा] अभिषेक को उसके असली वशंजों से मिलाती है और रिज भी उसे पहचान जाता है और फिर अच्छाई और बुराई का खेल शुरू होता है.
क्यों देखें:
फिल्म मे विशेष प्रभाव काफी अच्छे हैं. इसके अलावा प्रियंका चोपडा के स्टंट दृश्य भी कमाल के हैं.
क्यों ना देखें:
अभिषेक सुपर हीरो के रोल मे जमते नहीं है. द्रोण का पात्र भी उलझन मे दिखता है. यही समझ मे नही आता कि आखिर उसके पास कौन कौन सी शक्तियाँ है. वह कुछ मंत्र पढता है और कुछ भी कर सकता है. कमाल की बात यह भी है कि उससे अधिक स्टंट उसकी अंगरक्षक करती है.
अंत में:
के के मेनन और जया बच्चन के पात्र निराशाजनक हैं. के के इतने अच्छे अभिनेता होते हुए भी ओवर एक्टिंग करते दिखते हैं. कहानी उलझन भरी है और पठकथा का तो नामोनिशान नहीं है.
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