| मुंबई में सर्वभाषा सम्मेलन का आयोजन |
| विशेष | ||||||
| रविवार , , 05 अक्टूबर | ||||||
टिप्पणियाँ
(2)
लेख देखकर, पढ़कर बड़ा अच्छा लगा.
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इस प्रकार के लेख लिखने से कोई बड़ा भला होने वाला नहीं है. ज़्यादा शुद्ध भी नुकसानदायक होता है. हिन्दी के कथित साहित्यकारों ने हिन्दी का सबसे ज़्यादा अहित किया है और कर रहे हैं. उन्होने प्रचलित शब्दों का ऐसा क्लिष्ट अनुवाद किया कि लोग हिन्दी का नाम सुनकर ही भागने लगे. बल्ब को विद्युत चिराग, संसाधन, कूटशब्द, अद्यावधि, प्रयोक्ताओं, कर करेत्तर. जैसे शब्द बनाकर हिन्दी के संरक्षक कौन हित करना चाहते हैं और कर लेगें? इस प्रवृति से ऐसा लगता है कि ये लोग हिन्दी को अपनी संपत्ति बनाए रखना चाहते हैं ताकि लोग इनके बनाए ..... शब्दों को समझे बिना ही इनके साहित्य ज्ञान पर वाह-वाह करें. लोग भ्रांति में न रहें, हिन्दी वें लिख रहे हैं जो अच्छी अँग्रेज़ी नहीं लिख पाते. IAS, IPS, MBA वो बनता है जो बेझिझक अँग्रेज़ी बोलता हो कॉनवेंट स्कूल का पढ़ा हो. भाषा किसी की दास नहीं होती है. भाषा आम आदमी की बोलचाल से उपजती है. संस्कृत से जब हिन्दी बनी होगी यदि तब भी ऐसी सोच के लोग रहे होगें तो उन्होनें भी ऐसा ही हल्ला मचाया होगा. किसी भाषा को पुष्ट करना है, चलने देना है तो कथित साहित्यकारों धरातल पर आकर सोचो. वैश्विक युग में जो चलता है, जो बिकता है, वही बनेगा, उसका ही उत्पादन होगा. आज लोग अपनी बच्चियों को स्वयं चिथड़े पहिनाकर, उन्हें देखकर इतराते हैं, दाँत फाड़कर हंसते हैं. हिन्दी को चलने देना है तो धरातल पर आना होगा, व्यवहारिक कदम उठाने होगें. नहीं रोते रहिये, सबके सामने भाषा की मृत्यु होगी और कांधा ये कथित साहित्यकार ही देगें. लोग कुछ पल निकालकर यह भी सोचे की 1947 के बाद हिन्दी का उत्थान हुआ कि पतन और अँग्रेज़ी का चलन बढ़ा है कि घटा है. 1947 के बाद तो देश आज़ाद है. बाज़ार में अच्छी अँग्रेज़ी जानने वाले की क्या कीमत है और हिन्दी जानने वाले की क्या? लोग नाच देखने तवायफ़ों के यहाँ कोठे पर जाया करते थे. आज अपनी बच्चियों का नाच देखते हैं, उन्हें देखकर इतराते हैं, दाँत फाड़कर हंसते हैं. जमाना तेज़ी से बदल रहा है. ज़्यादा ही कुछ देखना है तो उदाहरण के लिये दिल्ली संस्करण पंजाब केसरी का आज का रविवसरीय देखो. समाज में, बाज़ार में, रोज़गार में, धर्म में, सब जगह उच्चकों की भरमार है, जो सोने का दिख रहा है, बड़ी-बड़ी डिंगे हाँक रहा है, तांबे का भी नहीं निकलेगा, गोबर पर पोलिश मिल गयी तो गनीमत मानना. ईमानदारी ढूढ़ने निकलोगे तो जिंदगी भर घर नहीं लौट पाओगे. जीना है तो किसी हद तक उच्चका प्रशिक्षण लेना पड़ेगा, सशक्त बनना पड़ेगा. मैं भी निरंतर प्रयत्न कर रहा हूँ, प्रशिक्षण ले रहा हूँ, आज कुछ सिखता हूँ, कल भूल जाता हूँ, लगा हुआ हूँ इस काम में. संपादक जी से भी गुज़ारिश है कि अगर अभी उन्होनें प्रशिक्षण न लिया हो तो अविलम्ब लें, देर न करें और अपने घनिष्ट लोगों को भी बताएँ, जन हित में खूब प्रचार-प्रसार करें, कराएँ. फिर कहता हूँ जीना है और जीने देना है तो धरातल पर आना होगा. report abuse
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इस प्रकार के लेख लिखने से कोई बड़ा भला होने वाला नहीं है. ज़्यादा शुद्ध भी नुकसानदायक होता है. हिन्दी के कथित साहित्यकारों ने हिन्दी का सबसे ज़्यादा अहित किया है और कर रहे हैं. उन्होने प्रचलित शब्दों का ऐसा क्लिष्ट अनुवाद किया कि लोग हिन्दी का नाम सुनकर ही भागने लगे. बल्ब को विद्युत चिराग, संसाधन, कूटशब्द, अद्यावधि, प्रयोक्ताओं, कर करेत्तर. जैसे शब्द बनाकर हिन्दी के संरक्षक कौन हित करना चाहते हैं और कर लेगें? इस प्रवृति से ऐसा लगता है कि ये लोग हिन्दी को अपनी संपत्ति बनाए रखना चाहते हैं ताकि लोग इनके बनाए ..... शब्दों को समझे बिना ही इनके साहित्य ज्ञान वाह-वाह करें.
लोग भ्रांति में न रहें, हिन्दी वें लिख रहे हैं जो अच्छी अँग्रेज़ी नहीं लिख पाते. IAS, IPS, MBA वो बनता है जो बेझिझक अँग्रेज़ी बोलता हो कॉनवेंट स्कूल का पढ़ा हो.
भाषा किसी की दास नहीं होती है. भाषा आम आदमी की बोलचाल से उपजती है. संस्कृत से जब हिन्दी बनी होगी यदि तब भी ऐसी सोच के लोग रहे होगें तो उन्होनें भी ऐसा ही हल्ला मचाया होगा. किसी भाषा को पुष्ट करना है, चलने देना है तो कथित साहित्यकारों धरातल पर आकर सोचो. वैश्विक युग में जो चलता है, जो बिकता है, वही बनेगा, उसका ही उत्पादन होगा. आज लोग अपनी बच्चियों को स्वयं चिथड़े पहिनाकर, उन्हें देखकर इतराते हैं, दाँत फाड़कर हंसते हैं.
हिन्दी को चलने देना है तो धरातल पर आना होगा, व्यवहारिक कदम उठाने होगें. नहीं रोते रहिये, सबके सामने भाषा की मृत्यु होगी और कांधा ये कथित साहित्यकार ही देगें. लोग कुछ पल निकालकर यह भी सोचे की 1947 के बाद हिन्दी का उत्थान हुआ की पतन और अँग्रेज़ी का चलन बढ़ा है कि घटा है. 1947 के बाद तो देश आज़ाद है. बाज़ार में अच्छी अँग्रेज़ी जानने वाले कि क्या कीमत है और हिन्दी जानने वाले की क्या?
लोग नाच देखने तवायफ़ों के यहाँ कोठे पर जाया करते थे. आज अपनी बच्चियों का नाच देखते हैं, उन्हें देखकर इतराते हैं, दाँत फाड़कर हंसते हैं. जमाना तेज़ी से बदल रहा है. ज़्यादा ही कुछ देखना है तो उदाहरण के लिये दिल्ली संस्करण पंजाब केसरी का आज का रविवसरीय देखो.
फिर कहता हूँ जीना है और जीने देना है तो धरातल पर आना होगा.