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मुंबई में सर्वभाषा सम्मेलन का आयोजन
विशेष
रविवार , , 05 अक्टूबर
तरकश ब्यूरो



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हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं ने हाल के दिनों में इंटरनेट पर जिस गति से
अपनी जगह बनाई है वह चौंकाने वाली है। इस बात में कोई शक नहीं कि हिन्दी
और अन्य भारतीय भाषाओं के अख़बारों और हिन्दी टीवी चैनलों से लेकर हिन्दी
फिल्मों ने हिन्दी को स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। लेकिन
इसके साथ ही हिन्दी को बाजार की भाषा बनाने के नाम पर उसके साथ शर्मनाक
दुराचार भी किया है। इसका कारण यह है कि अंग्रेजी स्कूलों में अंग्रेजी
माहौल में पले-बढ़े लोगों ने अपनी एमबीए और मास कम्युनिकेशन की डिग्रियों
के बल पर मीडिया, कॉर्पोरेट और सैटेलाईट चैनलों की महत्वपूर्ण जगहों पर
कब्जा कर लिया। यहाँ आने के बाद भाषा की शिष्टता, उसकी शुध्दता और भाषाई
सौंदर्य का उनके लिए कोई मतलब नहीं रहा। हिन्दी मात्र बोली रह गई यानी
जिसको हिन्दी बोलना आता है और जो  हिन्दी समझ लेता है वह  देश और दुनिया
में बसे 70 करोड़ हिन्दी भाषियों का मसीहा हो गया। हिन्दी लिखना या पढ़ना
आना कोई योग्यता नहीं रही।

इसका परिणाम यह हुआ कि हिन्दी को भ्रष्ट तरीके से लोगों पर थोपा जा रहा
है। टीवी पर ख़बर देने वाला हो, या टीवी पर खबर पढ़ने वाला दोनों को अगर
हिन्दी का कोई शब्द नहीं सूझता तो वह फट से अंग्रेजी का शब्द बोलकर अपनी
खबर को परोस देता है। भले ही उस अंग्रेजी शब्द से अर्थ का अनर्थ हो जाता
हो। विज्ञापनों की दुनिया में बैठे लोगों का भी यही हाल है, हिन्दी
विज्ञापनों पर अंतिम फैसला वो लोग करते हैं जो न हिन्दी  पढ़ सकते हैं न
लिख सकते हैं। बस सुनकर अगर उनको मजा आ जाए तो उस विज्ञापन को हरी झंडी
मिल जाती है और करोड़ों रुपये खर्च कर उसको बाज़ार में चला दिया जाता है।
मगर हिन्दी की शुध्दता के नाम पर कुछ हजार रुपये तक नहीं खर्च किए जाते
हैं।

हिन्दी शब्दों को जिस आज़ादी के साथ तोड़-मरोड़कर पेश किया जाता है ऐसा
धृष्टता अंग्रेजी शब्दों को लेकर कतई नहीं की जाती क्योंकि तब
हिन्दुस्तानी अंग्रेज ऐसी विज्ञापन एजेंसी, टीवी चैनल या खबर पढ़ने वाले
से लेकर खबर देने वाले तक के अंग्रेजी ज्ञान का उपहास उड़ा सकते हैं,
लेकिन हिन्दी को भ्रष्ट करके लिखा और बोला जाए तो किसी को कोई फर्क नहीं
पड़ता। क्योंकि अगर किसी ने हिन्दी में कुछ गलत लिखा है या बोला है तो
उसे कहने वाला कौन... ? हिन्दी अखबार तो और आगे जाकर हिन्दी के शब्दों की
बखिया उधेड़ने में लगे हैं। भले ही ऐसा वे व्यावसायिक मजबूरियों के तहत
ही क्यों न कर रहे हों ।

लेकिन इस अंधरे में रोशनी पैदा की है इंटरनेट के विस्तार ने। दुनिया भर
में फैले हमारे हिन्दी प्रेमी साथियों ने अपनी जिंदगी की जद्दोजहद को
जारी रखते हुए, नौकरी और परिवार के लिए अपना समय देने के साथ ही हिन्दी
को बचाने की एक ऐसी सार्थक पहल शुरु की है जिससे लगता है कि चैनल और
अखबारवालों को बहुत जल्दी अपनी हिन्दी सुधारना पड़ेगी, अगर नहीं सुधारी
तो इंटरनेट की हिन्दी जमात उनको इस बात के लिए मजबूर कर देगी।

दरअसल कॉर्पोरेट जगत और सैटेलाईट चैनलों के लोगों को हमें यह अहसास कराना
होगा कि इस देश के कोने-कोने में हिन्दी लिखने वाले और हिन्दी में सोचने
वाले लोग बैठे हैं, उनकी सोच जमीन से जुड़ी है और उसके अंदर भाषा की महक
भी है। लेकिन दुर्भाग्य से अपने कमजोर अंग्रेजी ज्ञान की वजह से उनकी
शुध्द हिन्दी और मौलिक सोच अंग्रेजी के घुटन भरे माहोल में
पुष्पित-पल्लवित नहीं हो पाती।

इंटरनेट की दुनिया में आने वाला कल हिन्दी वालों का होगा। क्योंकि अब समय
आ गया है कि अगर किसी को हिन्दुस्तान में कारोबार करना है अपना माल बेचना
है और 70-80 करोड़ लोगों तक सीधे पहुँचना है तो उसे हिन्दी में ही अपनी
बात कहनी होगी। देश में और दुनिया में कहीं भी कारोबार करने वाली हर
कंपनी को अपनी वेब साईट हिन्दी में बनानी होगी और इसके लिए हजारों लाखों
हिन्दी लिखने वालों की जरुरत होगी। ये हिन्दी लिखने वाले अमरीका, जापान,
रुस या चीन से नहीं आएंगे, यह काम आपको ही करना होगा।

आज तो हालात यह है कि जिन मोबाईल कंपनियों और बैंकों को आप करोड़ों रुपये
दे रहे हैं उनकी वेब साईट तक हिन्दी में नहीं है। आपको अगर अपने मोबाईल
या बैंक की सेवा को लेकर कोई शिकायत करना है तो आप अपनी भाषा में नहीं कर
सकते। लेकिन जब आपको मोबाईल बेचा जाता है तो आपको तमाम प्रचार सामग्री
हिन्दी में दी जाती है। अगर आप आज ही जाग जाएं तो वह दिन दूर नहीं कि देश
की मोबाईल कंपनियों और बैंकों को अपनी वेब साईट हिन्दी में बनाने के लिए
मजबूर होना पड़ेगा। और अगर वेब साईटें हिन्दी में बनेगी तो लिखेगा
कौन...जाहिर है यह मौका अपको ही मिलेगा....तो हम चाहते हैं कि आप अभी से
जागें और इंटरनेट पर हिन्दी में लिखना शुरु करें। हमारे लिए नहीं बल्कि
अपने आपके लिए, आपका लिखने का शौक आपके लिए नौकरी का और पैसा कमाने का
जरिया हो जाएगा। और जल्दी ही वह दिन भी आएगा जब नौकरी मिलने की योग्यता
अंग्रेजी नहीं बल्कि हिन्दी हो जाएगी।

तो तैयार हो जाईये इंटरनेट पर हिंदी के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं की
प्रयोगविधि सीखने और समझने के लिए ।

 इसी सप्ताह महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी द्वारा मुंबई में
आयोजित हो रहे सर्वभाषा सम्मेलन के तीसरे दिन, अर्थात आगामी रविवार (05/10/08) को
सुबह १०-३० बजे, दादर (पश्चिम) स्थित पु.ल.देशपांडे सभागृह में इंटरनेट
पर हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाएं - नामक सत्र होगा । जिसमें इंटरनेट एवं
भाषा दोनों विषयों के कुछ मानिंद जानकार हमको आपको पावर प्वाइंट
प्रेजेंटेशन के जरिए यह बताएंगे कि हम यूनीकोड एवं अन्य माध्यमों से किस
प्रकार इंटरनेट पर हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं का प्रयोग कर सकते हैं ।
यह सत्र हमारे-आपके-सबके लिए उपयोगी है । कृपया जरूर पधारें , और इसका
लाभ उठाएं ।

- ओमप्रकाश तिवारी
सदस्य - महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी

 




टिप्पणियाँ (2)add
Bhasha par jagdishjain ki tippni
द्वारा प्रेषित jagdishjain , अक्टूबर 05, 2008
लेख देखकर, पढ़कर बड़ा अच्छा लगा.
इस प्रकार के लेख लिखने से कोई बड़ा भला होने वाला नहीं है. ज़्यादा शुद्ध भी नुकसानदायक होता है. हिन्दी के कथित साहित्यकारों ने हिन्दी का सबसे ज़्यादा अहित किया है और कर रहे हैं. उन्होने प्रचलित शब्दों का ऐसा क्लिष्ट अनुवाद किया कि लोग हिन्दी का नाम सुनकर ही भागने लगे. बल्ब को विद्युत चिराग, संसाधन, कूटशब्द, अद्यावधि, प्रयोक्ताओं, कर करेत्तर. जैसे शब्द बनाकर हिन्दी के संरक्षक कौन हित करना चाहते हैं और कर लेगें? इस प्रवृति से ऐसा लगता है कि ये लोग हिन्दी को अपनी संपत्ति बनाए रखना चाहते हैं ताकि लोग इनके बनाए ..... शब्दों को समझे बिना ही इनके साहित्य ज्ञान वाह-वाह करें.
लोग भ्रांति में न रहें, हिन्दी वें लिख रहे हैं जो अच्छी अँग्रेज़ी नहीं लिख पाते. IAS, IPS, MBA वो बनता है जो बेझिझक अँग्रेज़ी बोलता हो कॉनवेंट स्कूल का पढ़ा हो.
भाषा किसी की दास नहीं होती है. भाषा आम आदमी की बोलचाल से उपजती है. संस्कृत से जब हिन्दी बनी होगी यदि तब भी ऐसी सोच के लोग रहे होगें तो उन्होनें भी ऐसा ही हल्ला मचाया होगा. किसी भाषा को पुष्ट करना है, चलने देना है तो कथित साहित्यकारों धरातल पर आकर सोचो. वैश्विक युग में जो चलता है, जो बिकता है, वही बनेगा, उसका ही उत्पादन होगा. आज लोग अपनी बच्चियों को स्वयं चिथड़े पहिनाकर, उन्हें देखकर इतराते हैं, दाँत फाड़कर हंसते हैं.
हिन्दी को चलने देना है तो धरातल पर आना होगा, व्यवहारिक कदम उठाने होगें. नहीं रोते रहिये, सबके सामने भाषा की मृत्यु होगी और कांधा ये कथित साहित्यकार ही देगें. लोग कुछ पल निकालकर यह भी सोचे की 1947 के बाद हिन्दी का उत्थान हुआ की पतन और अँग्रेज़ी का चलन बढ़ा है कि घटा है. 1947 के बाद तो देश आज़ाद है. बाज़ार में अच्छी अँग्रेज़ी जानने वाले कि क्या कीमत है और हिन्दी जानने वाले की क्या?
लोग नाच देखने तवायफ़ों के यहाँ कोठे पर जाया करते थे. आज अपनी बच्चियों का नाच देखते हैं, उन्हें देखकर इतराते हैं, दाँत फाड़कर हंसते हैं. जमाना तेज़ी से बदल रहा है. ज़्यादा ही कुछ देखना है तो उदाहरण के लिये दिल्ली संस्करण पंजाब केसरी का आज का रविवसरीय देखो.
फिर कहता हूँ जीना है और जीने देना है तो धरातल पर आना होगा.

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Tippni jagdishjain ki
द्वारा प्रेषित jagdishjain , अक्टूबर 06, 2008
लेख देखकर, पढ़कर बड़ा अच्छा लगा.
इस प्रकार के लेख लिखने से कोई बड़ा भला होने वाला नहीं है. ज़्यादा शुद्ध भी नुकसानदायक होता है. हिन्दी के कथित साहित्यकारों ने हिन्दी का सबसे ज़्यादा अहित किया है और कर रहे हैं. उन्होने प्रचलित शब्दों का ऐसा क्लिष्ट अनुवाद किया कि लोग हिन्दी का नाम सुनकर ही भागने लगे. बल्ब को विद्युत चिराग, संसाधन, कूटशब्द, अद्यावधि, प्रयोक्ताओं, कर करेत्तर. जैसे शब्द बनाकर हिन्दी के संरक्षक कौन हित करना चाहते हैं और कर लेगें? इस प्रवृति से ऐसा लगता है कि ये लोग हिन्दी को अपनी संपत्ति बनाए रखना चाहते हैं ताकि लोग इनके बनाए ..... शब्दों को समझे बिना ही इनके साहित्य ज्ञान पर वाह-वाह करें.
लोग भ्रांति में न रहें, हिन्दी वें लिख रहे हैं जो अच्छी अँग्रेज़ी नहीं लिख पाते. IAS, IPS, MBA वो बनता है जो बेझिझक अँग्रेज़ी बोलता हो कॉनवेंट स्कूल का पढ़ा हो.
भाषा किसी की दास नहीं होती है. भाषा आम आदमी की बोलचाल से उपजती है. संस्कृत से जब हिन्दी बनी होगी यदि तब भी ऐसी सोच के लोग रहे होगें तो उन्होनें भी ऐसा ही हल्ला मचाया होगा. किसी भाषा को पुष्ट करना है, चलने देना है तो कथित साहित्यकारों धरातल पर आकर सोचो. वैश्विक युग में जो चलता है, जो बिकता है, वही बनेगा, उसका ही उत्पादन होगा. आज लोग अपनी बच्चियों को स्वयं चिथड़े पहिनाकर, उन्हें देखकर इतराते हैं, दाँत फाड़कर हंसते हैं.
हिन्दी को चलने देना है तो धरातल पर आना होगा, व्यवहारिक कदम उठाने होगें. नहीं रोते रहिये, सबके सामने भाषा की मृत्यु होगी और कांधा ये कथित साहित्यकार ही देगें. लोग कुछ पल निकालकर यह भी सोचे की 1947 के बाद हिन्दी का उत्थान हुआ कि पतन और अँग्रेज़ी का चलन बढ़ा है कि घटा है. 1947 के बाद तो देश आज़ाद है. बाज़ार में अच्छी अँग्रेज़ी जानने वाले की क्या कीमत है और हिन्दी जानने वाले की क्या?
लोग नाच देखने तवायफ़ों के यहाँ कोठे पर जाया करते थे. आज अपनी बच्चियों का नाच देखते हैं, उन्हें देखकर इतराते हैं, दाँत फाड़कर हंसते हैं. जमाना तेज़ी से बदल रहा है. ज़्यादा ही कुछ देखना है तो उदाहरण के लिये दिल्ली संस्करण पंजाब केसरी का आज का रविवसरीय देखो.
समाज में, बाज़ार में, रोज़गार में, धर्म में, सब जगह उच्चकों की भरमार है, जो सोने का दिख रहा है, बड़ी-बड़ी डिंगे हाँक रहा है, तांबे का भी नहीं निकलेगा, गोबर पर पोलिश मिल गयी तो गनीमत मानना. ईमानदारी ढूढ़ने निकलोगे तो जिंदगी भर घर नहीं लौट पाओगे.
जीना है तो किसी हद तक उच्चका प्रशिक्षण लेना पड़ेगा, सशक्त बनना पड़ेगा. मैं भी निरंतर प्रयत्न कर रहा हूँ, प्रशिक्षण ले रहा हूँ, आज कुछ सिखता हूँ, कल भूल जाता हूँ, लगा हुआ हूँ इस काम में. संपादक जी से भी गुज़ारिश है कि अगर अभी उन्होनें प्रशिक्षण न लिया हो तो अविलम्ब लें, देर न करें और अपने घनिष्ट लोगों को भी बताएँ, जन हित में खूब प्रचार-प्रसार करें, कराएँ.
फिर कहता हूँ जीना है और जीने देना है तो धरातल पर आना होगा.

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