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सास-बहू ने खुले में सांस ली होगी
मेरे विचार
गुरुवार , , 27 नवम्बर
मेरे विचार
manojkumar.jpg मनोज सिंह






इसे महज एक इत्तफाक कहें या फिर कुछ और कि एकता कपूर की 'सास भी कभी बहू थी' के बंद होने  के ऐलान के दौरान ही बाकी तमाम सीरियलों पर भी, किसी और कारण से ही सही, मगर रोक लग गयी। मेरे मतानुसार यह एक बार पुनः प्रमाणित करता है कि एकता कपूर भाग्यशाली हैं। जिस वक्त उनकी सास जो कि कभी बहू थी, अपने सीरियलों में अंतिम सांसें गिन रही थी, टीवी निर्माताओं और सहयोगी सिने कर्मचारियों के बीच उपजे विवाद ने एक ऐसा बवंडर खड़ा किया कि सारे सीरियल अपनी तीव्र गति से आगे बढ़ने वाली दिशाहीन चाल में जहां खड़े थे अचानक वहीं खड़े रह गए। मैंने 'सास भी कभी...' तो देखी नहीं लेकिन कई सासों को इसके बंद होने से आंसुओं से रोते हुए देखा है। ऐसे में तकरीबन सभी धारावाहिक के बंद हो जाने पर भारतीय आम जनमानस पर क्या प्रभाव पड़ा होगा, यह एक विचारणीय प्रश्न है। और इस पर गौर किया जाना चाहिए। वैसे तो एकता कपूर के सास-बहू वाले शीर्षक में दुनिया के तमाम ज्ञान व पारिवारिक संबंधों के माधुर्य का निचोड़ है मगर सुना है इसने कई घरों में सास-बहू के बीच ईंट से ईंट बजा दी। एकता कपूर किस्मत वाली हैं या चतुर-चालाक, यहां कोई मुद्दा नहीं, न ही वो प्रथम डायरेक्टर हैं, जिसने भारत के जनमानस की नब्ज को पहचाना और उसका दोहन किया। ऐसे कई हैं, जिनमें उन्हें प्रमुख कहा जा सकता है। समाज को सकारात्मक दिशा या ज्ञान बांटा जाता तो कुछ और बात होती मगर ऐसे कई धारावाहिक हैं जिसने समाज की गति और दिशा को खराब करने में अहम भूमिका निभाई। एक पूरी पीढ़ी संस्कृति व संस्कारविहीन हो गयी। इन तमाम टीवी सीरियलों ने मानवीय कमजोरियों का सहारा लेकर ऐसी घुसपैठ की कि हर घर में ड्राइंग रूम से लेकर शयनकक्ष और रसोईघर तक एक काल्पनिक संसार रच दिया गया। एक से एक विचित्र किरदार, अनेक असामान्य घटनाएं, कल्पनालोक के भूखे सपनों की प्यास बुझाती अनैतिक व असमाजिक प्रेम कहानियां, स्वर्ग की अप्सराओं को मात देती हर वक्त इठलाती-इतराती नारी के कई चरित्र, फिर चाहे वो अनपढ़-गंवार घर में काम करने वाली बाई हो, खानदान की बहू या फिर ननद, भाभी, बहन, दादी, सास। सभी हर वक्त साफ-सुथरी, श्रृंगार से लदी सजी ऐसे कि जैसे शहर के सबसे महंगे ब्यूटीपार्लर से अभी-अभी निकली हों। पता नहीं यह कब खाती हैं, कब पीती हैं, कब सोती हैं, कि होंठों से लाली नहीं उतरती, बालों की साज-सज्जा नहीं बिखरती। दिखने में बार्बी डॉल मगर गुड़ियों की तरह मोम की नहीं। बोलने में ऐसे संवाद कि एक से एक नाटककार व कहानीकार भी पानी मांगे। पुरुष किरदार भला कैसे पीछे रहेंगे। नायकों के डिजाइनर कपड़ों को देख तो शायद सलमान खान भी कपड़े पहनने लगें।

हिन्दुस्तान की आम जनता कठिन परिस्थितियों में रहती है और इसीलिए सपनों को पालकर उसी में जीती है। अपने आसपास एक भ्रम का मायाजाल बुनकर रहना उसकी आदत बन जाती है। दिन में 'मुंगेरी लाल के हसीन सपने' देखना उसकी कमजोरी है। सौ रुपए की दिहाड़ी कमाकर आने वाला आदमी थक-हारकर जब किस्तों में लाये गए टीवी के सामने बैठता है तो अतृप्त स्वप्नलोक में डूब जाता है। दिन-रात बर्तन मांज कर टीवी के सामने बैठकर औरतें जब अपनी दबी हुई इच्छाओं को परदे पर ही सही हकीकत होते देखती हैं तो खुशी से झूम उठती हैं। ईश्वर ने सुंदरता के सारे पैमाने तोड़कर चाहे बेहद बदसूरत ही क्यूं न बनाया हो पर नारी के अंदर कहीं न कहीं खुद के सुंदर होने की मृगतृष्णा चढ़ती-उतरती रहती है। इसी कमजोरी का फायदा उठाकर आदमी ने युगों से औरतों पर राज किया है। और इसी भावना से खेलते हुए हिन्दुस्तान के धारावाहिकों की नायिका-खलनायिका सदा सौंदर्य की प्रतिमूर्ति दिखाई देती हैं। टीवी सीरियल ने हिन्दुस्तान के अवाम को यथार्थ से उठाकर कल्पनालोक में भेज दिया। उसे इस तरह से फंसाया कि वह इससे निकल ही नहीं पाता। निकलना भी नहीं चाहता। ख्वाबों का ऐसा नशा पिलाया कि अफीम भी क्या असर करेगी। ये नशा जो चढ़ा तो फिर उतरता ही नहीं। अपनी पत्नी के रसोई में निकले पसीने से लिप्त शरीर से परेशान युवक को टीवी के अंदर नाचती नारी मोहित कर लेती है। जब वो सीरियल के हर दूसरे नायक को दो-तीन सुंदरियों के साथ आंख-मिचौली खेलते देखता है तो उसकी दबी-छिपी पाश्विक इच्छाएं उभरकर नृत्य करने लगती हैं। जिसे फिर वो नैनों से ही संतुष्ट कर लेता है। उधर, नारी का त्रियाचरित्र इन धारावाहिकों को देखते ही उभर कर मंद-मंद मुस्काता है। और उसके कलेजे को ठंडक पहुंचती है। संक्षिप्त में कहें तो सदियों से मनुष्य को जानवर से मानव बनाने में, धर्म और ज्ञान ने जितनी कोशिश की उसे मात्र आधे घंटे में इन धारावाहिकों ने मटियामेट कर दिया।
इन सीरियलों का आम जीवन पर इतना जबरदस्त प्रभाव पड़ा कि शाम को औरतें घर के बाहर आंगन में निकलना भूल गईं। पड़ोस की औरतों से गुफ्तगू का अब कोई मौका ही नहीं बचा। मोहल्लों का सामाजिक ताना-बाना टूट गया। इन सीरियलों ने हर परिवार को ही अकेला नहीं किया बल्कि इसके द्वारा घर के अंदर हर इंसान भी एकदम अकेला हो गया। हरेक की अपनी पसंद के चैनल, कार्यक्रम और अपने पसंदीदा किरदार। अपने दबे-छुपे व्यक्तित्व की जरूरत के अनुसार। उन्हीं से अपने आप को जोड़कर वह हर शाम गुजार देता है। और उसी में डूबकर सो जाता है। बच्चों के शाम के गली-मोहल्लों के खेल खत्म हो गए। गांव के चौपाल तो शहर के आते ही खत्म हो चुके थे, शहरी क्लबों, दोस्तों की महफिलें सूनी होने लगी। साहित्य की गोष्ठियों में जुड़ने वाली भीड़, कविता का रस और हास्य-व्यंग्य सूने हो गए। पिकनिक, बाहर घूमना, शाम की सैर अब इस बात से सुनिश्चित होने लगी कि अपने पसंदीद टीवी कार्यक्रम का समय क्या है। और जो घूम रहे हैं वो सेहत की मजबूरीवश। इसके नशे के सामने शराब क्या चीज है लोग पहाड़ों पर जाकर भी कमरे में बंद होकर अपने पसंदीदा टीवी सीरियल देखने लगे। टीवी के सामने अकेले में शराब पी जाने लगी तो अमूमन घरों में धारावाहिक देखते हुए खाना खाया जाने लगा। और लोग खाने का स्वाद भूल गए, भोजन का पचना कम हुआ तो बीमारी ने आ घेरा। राजनेता देश को क्या बांटेंगे जो इन रियेलिटी शो ने वोटिंग के द्वारा हिन्दुस्तान को पूरी तरह से बांट दिया। कला में ऐसी क्षेत्रीयता कभी न थी। पूर्व में जहां सफल लेखकों को एक-एक कविता कहानी लिखने में महीनों सालों लग जाते थे वहीं आज का लेखक सीरियल की कहानी दिहाड़ी के हिसाब से लिख रहा है। हर सुबह उठते के साथ वह अपने किरदार को एक नयी कहानी दे देता है। कई बार तो मरे हुए कलाकारों को पता नहीं कैसे जिंदा कर दिया जाता है। यह हिन्दुस्तान के इन टीवी पटकथा लेखकों का कमाल है जो अपने डायरेक्टरों के साथ मिलकर कोई भी अजूबा कर सकते हैं। इस छोटे पर्दे के असर के सामने बड़े परदे की क्या कीमत। अच्छे-अच्छे स्टार भी इसमें दिखने के लिए लालायित होने लगे हैं। लाखों-करोड़ों जो मिलने लगे हैं और लोकप्रियता अलग। संक्षिप्त में टीवी अब मात्र मनोरंजन नहीं हमारी संस्कृति और सभ्यता का मूल स्रोत बन गया।

पिछले कुछ दिनों से इन सीरियल के शूटिंग में रुकावट आने से उपरोक्त सभी लोगों के रोजमर्रा की जिंदगी में अचानक परिवर्तन आया होगा। लेखकों को रोज सुबह उठकर कागज काले करने के लिए कलम नहीं घिसनी पड़ती होंगी। परदे पर सजधज कर खड़ी मोम-सी नकली गुड़ियों को घरों में रुकने का मौका मिला होगा। टीवी कलाकारों को यह देखकर आश्चर्य हुआ होगा कि वास्तविक जीवन कल्पना से कितना दूर है। बहुत दिनों बाद घर में काम करने पर साड़ियों की सिलवटे, बालों में अस्तव्यस्तता और चेहरे पर पसीना आया होगा। हां, मगर हाथों से बनाये गए खाने में खुद को भी स्वाद आया होगा और इन हीरोइनों के बच्चों ने भी मां के प्यार को पाया होगा। इन सभी चरित्रों का जीवन अब पूरे सुकून से बीत रहा होगा। सुबह उठकर भागने की टेंशन से दूर पति-पत्नी की रातें एक बार फिर जवान हुई होंगी। टूटने की कगार पर खड़े कई टीवी कलाकारों का वैवाहिक जीवन मात्र कुछ पल की शांति से फिर बचने के लिए प्रयासरत होगा। उधर, दर्शकों के घरों में कल्पनाओं में जी रही औरतों ने समय काटने के लिए घर के बाहर कदम रखे होंगे। पड़ोस की औरतों के बीच शाम की बातचीत का दौर शुरू हुआ होगा। माताओं ने बच्चों के धूल से सनकर लौटने पर उनकी बातें सुनी होंगी। थक कर आये हुए पति को, मजबूरीवश ही सही, उसने चाय का प्याला क्या दिया पति ने भी अपनी सारी थकावट दूर कर दिनभर की बातें उससे सुनी होंगी। उस आधे घंटे में, जिसमें हिन्दुस्तान की टीवी का अवाम, किसी ऐसे युग में चला जाता हो, जहां सब कुछ नकली हो, उससे दूर होकर वो वास्तविक जीवन जीने के लिए मजबूर हुआ होगा। एक मिनट ठहर कर हर सास ने सोचा होगा कि वास्तव में वो भी कभी बहू थी। यही नहीं बहू को भी इस बात का अहसास हुआ होगा कि वो भी एक दिन सास बनेगी। और फिर समय पाकर दोनों ने उठकर दूर बैठे अपने रिश्तों को फोन किया होगा सिर्फ यह जानने के लिए कि वो कैसे हैं। और पाया होगा कि जीवन की सत्यता इन सीरियलों से बहुत दूर है।
***
मनोज सिंह
425/3, सेक्टर 30-ए, चंडीगढ़।
www.manojsingh.com


 

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