वर्ष 1918 में अमेरिका में इनफ्लूएंजा की महामारी फैली थी. इसकी चपेट में लाखों लोग आ गए थे. जब तक यह महामारी काबू में आती तब तक 5 करोड से अधिक लोग मारे जा चुके थे.
यदि भविष्य में ऐसी ही कोई महामारी फैले तभी क्या इतनी ही जानहानि होगी? शायद नहीं. यदि भविष्य में बर्ड फ्लू जैसी कोई महामारी विकट रूप धारण करती भी है तो इतनी बडी संख्या में जानहानि नहीं होगी. और इसके लिए जो कई कारक जिम्मेदार होंगे उनमे से एक है भूतकाल में फैली महामारी से बचे लोग.
जीहाँ जो कुछ लोग उस महामारी से बच गए थे, वे ही अब हमारे लिए बचाव का जरिया बन रहे हैं.
माउंट सिनाई स्कूल ऑफ मेडिसीन के प्रोफेसर जेम्स क्रो और यूएस आर्मड फोर्सेज इंस्टिट्यूट ऑफ पेथोलोजी ने 2005 मे एक कार्यक्रम शुरू किया था. इसके तहत उन्होने 1918 मे फैली महामारी मे मारे गए लोगों के शरीर में से उस घातक वाइरस को फिर से प्राप्त किया (यह वाइरस और उससे मारे गए कुछ लोगों को अलास्का में डीप फ्रीज में सुरक्षित रखा गया है).
इसके बाद इस टीम ने उस महामारी से बच निकले कुछ लोगों को ढूंढ निकाला, जिनके उम्र अब 91 से 101 साल है. इनमें से 8 लोगों के शरीर से खून के सेम्पल लिए. इन सेम्पलों ने उस वाइरस के प्रति रिएक्शन किया. जिससे पता चला कि उनमें अभी भी उस वाइरस से लडने की क्षमता मौजूद है.
वैज्ञानिकों ने इसके बाद उन रक्त सेम्पलों मे से बी कोषों को अलग किया. और फिर उससे एंटीबोडीज तैयार की. उसके बाद कुछ चूहों पर इसका परीक्षण किया गया. सभी चूहों को उस वाइरस से ग्रस्त कर कुछ को यूँ ही छोड दिया गया, कुछ को अल्प मात्रा मे एंटीबोडी खुराक दी गई और कुछ को भारी मात्रा मे खुराक दी गई.
जिन चूहों को भारी मात्रा मे एंटीबोडी खुराक दी गई थी, वे बच गए. इससे पता चला कि उन कुछ बच गए लोगों के शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता ने 60 साल बाद भी वाइरस की पहचान बना कर रखी थी और उपचार भी.
अब यही एंटीबोडी बर्ड फ्लू जैसी घातक बिमारियों की रोकथाम मे काम आएगी.