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वह जमाना जब रॉकेट से भेजी जाती थी डाक
रोचक तथ्य और जानकारी
गुरुवार , , 15 जनवरी
तरकश ब्यूरो



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रॉकेट से डाक भेजना! यह ऐसी बात है जिस पर आसानी से यकीन करना मुश्किल हो जाता है. लेकिन यह सच है. एक समय ऐसा था जब एक जगह से दूसरी जगह डाक भेजने के लिए रॉकेटों का इस्तेमाल किए जाता था. दूसरा आश्चर्य, यह सेवा किसी पश्चिमी देश में नहीं बल्कि भारत में दी जाती थी.
 
इस सेवा के पीछे जिस व्यक्ति का हाथ था उसका नाम था स्टिफन हेक्टर टेलर स्मीथ. स्टिफन का जन्म भारत के शिलोंग शहर में 1891 में हुआ था. अपने कॉलेज के दिनों में स्मीथ ने रॉकेट विज्ञान का अध्ययन किया और कई मॉडल रॉकेट बनाए. वे कई प्रकार के प्रयोग करते थे, एक बार उन्होनें एक कीडे को रॉकेट से दागा था.
 
पढाई पूरी होने पर स्टिफन ने कई कार्य किए और अंत में डेंटिस्ट के तौर पर कलकत्ता में स्थाई हुए. उस समय कलकत्ता (अब कोलकाता) के डाइमंड हार्बर पर यात्री और मालवाहक जहाज आते थे. इन जहाजों को दिशासूचन देने के लिए कोलकाता के पास स्थित सागर टापू पर एक लाइटहाउस था. सागर टापू 300 वर्ग किलोमीटर का टापू है. अंग्रेज उस जगह पर अपनी एक छावनी रखते थे. यहाँ रहने वाले लोगों तक डाक समुद्री रास्ते से जाती थी और इसमे काफी समय लगता था.

उधर, स्टिफन स्मीथ भले ही डेंटिस्ट बन गए थे, लेकिन रॉकेट विज्ञान के प्रति उनका प्रेम जरा भी कम नही हुआ था. उन्होने सागर टापू तक डाक पहुँचाने के लिए एक नया नुस्खा आजमाने का प्रयत्न किया. उन्होने कोलकाता की ऑरियंट फायरवर्क्स कम्पनी से रॉकेट बनवाए, उनमे गनपाउडर भरा और 30 सितम्बर 1934 को पहला रॉकेट छोडा.
 
हालाँकि स्टिफन के प्रयास को दूनिया का ऐसा पहला प्रयास नही माना जा सकता. इससे पहले ऑस्ट्रिया में Friedrich Schmiedl ने और Gerhard Zucker ने जर्मनी मे भी इस प्रकार का प्रयास किया था. लेकिन वे इतने सफल नहीं हुए थे. 
 
स्टिफन ने अपने प्रयोग के लिए जिस रॉकेट का इस्तेमाल किया उसे एक जहाज के तूतक पर लगाया गया था और इसे सागर टापू तक जाना था. इसमें 143 डाक भी थी. लेकिन प्रयोग असफल रहा. रॉकेट हवा मे ही फूट गया और डाक पानी मे गिर गई.

लेकिन स्टिफन ने हार नही मानी और अपने प्रयोग जारी रखे. उन्होने अगले 10 साल तक रॉकेटों का प्रक्षेपण जारी रखा. कई बार असफल और कई बार सफल, इस तरह से डाक कभी सागर टापू पर पहुँचती रही कभी समुद्र के पानी मे गिरती रही.

स्टिफन ने बाद में सिक्किम के दूर्गम प्रदेशों मे भी रॉकेट से डाक भेजी. इसके अलावा 1935 में क्वेटा (अब पाकिस्तान) मे आए भूकम्प के दौरान रॉकेट के माध्यम से लोगों तक अनाज भी भेजा.

स्टिफन की रॉकेट डाक सेवा 4 दिसम्बर 1944 तक चली. तब तक एयरमेल सेवा शुरू हो चुकी थी और अंग्रेजों को रॉकेट डाक सेवा काफी मँहगी लगने लगी थी.

स्टिफन स्मीथ का 15 फरवरी 1951 को निधन हो गया. और इसके साथ ही रॉकेट डाक सेवा के जनक और इस सेवा का भी अंत हो गया. भारत सरकार ने स्टिफन स्मीथ की याद में 1992 मे एक डाक टिकट जारी की थी.



टिप्पणियाँ (2)add
वाह
द्वारा प्रेषित कमल शर्मा , जनवरी 15, 2009
स्टिफन हेक्टर टेलर स्मीथ को नमन। अदभुत प्रयोग की आपने बेहतर जानकारी दी।
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शुक्रिया
द्वारा प्रेषित Shuaib.in , जनवरी 15, 2009
शुक्रिया एक अच्छी जानकारी शेयर करने केलिए जिसका मुझे अबतक पता नहीं था।
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