जैसे ही कोई हिन्दी फिल्म रिलीज होती है उसकी पाइरेटेड
कॉपी सडकों पर मिलनी शुरू हो जाती है. हद तो तब होती है जब किसी फिल्म की
पाइरेटेड कॉपी रिलीज से पहले ही बाजार में आ जाती है.
वीडियो पाइरेसी कई प्रकार से होती है. लेकिन सबसे प्रचलित तरीका होता है सिनेमा हॉल में कैमकोडर के साथ जाना और चल रही फिल्म को हुबहू उतार लेना.
लेकिन अब यह इतना आसान नहीं रह जाएगा यदि ओसाका विश्वविद्यालय के नोबोरू बाबागुची के द्वारा विकसित की गई तकनीक को सिनेमा हॉल के प्रबंधक अपना लें.
नोबोरू ने एक ऑडियो वाटरमार्क तकनीक विकसित की है. इस तकनीक की मदद से यह पता किया जा सकता है कि सिनेमा हॉल की किस सीट पर बैठा व्यक्ति वीडियो रिकार्डिंग कर रहा है?
यह तकनीक कैसे काम करती है?
इस तकनीक में फिल्म के ऑडियो ट्रेक में एक और वाटरमार्क ट्रेक जोड दिया जाता है. इसकी तरंगों को निश्चित अनुपात और समय पर बदला जाता है. हॉल में लगे विभिन्न स्पीकरों मे से यह वाटरमार्क आवाज अलग अलग समय पर प्रवाहित होती है.
इसके कैमकॉडर के माइक्रोफोन से टकराकर लौट रही आवाज को रिकार्ड कर लिया जाता है और बाद में यह पता लगा लिया जाता है कि जिस सीट पर माइक्रोफोन वाला कैमकॉडर लगा है वह सीट स्पीकर से कितनी दूर है.
इस तकनीक से अवैध रूप से शूटिंग कर रहे वीडियो पाइरेट को तो पकडा जा सकता है.
लेकिन उस स्थिति में क्या होगा जब सिनेमा हॉल के प्रबंधक ही पाइरेसी मे संलग्न हो.
उसका तो कोई इलाज नहीं!