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भविष्य की चिंता इंसानों के जिन में |
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रोचक तथ्य और जानकारी
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शुक्रवार , , 29 मई |
दादाजी आम का पेड़ लगाते हैं लेकिन फल तो उनके पौत्र ही खा पाते हैं. तो दादाजी आम का पेड़ क्यों लगाते हैं?
यह एक पुरानी गुजराती कहावत का एक भाग और इसका जवाब हमारे जिनेटिक कोड में छिपा हुआ है. हम इंसानों के अंदर भविष्य की चिंता करने की सहज प्रवृति होती है. हम लम्बे काल के लिए सोचते हैं चाहे उसके फल हम अपनी जिंदगी पर प्राप्त ना भी कर पाएँ.
क्या कभी आपने सोचा है हम आगामी 50-60 वर्षों के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान की बातें क्यों सोचते हैं? क्यों हमारे वैज्ञानिक आगामी सदी में विज्ञान की सम्भावनाओं पर विचार करते हैं, जबकि उनमें से कोई भी तब तक जीवित नहीं रहेगा.
वार्विक मेडिकल स्कूल के डॉ. पीटर सोजोउ के अनुसार हम इंसानों के अंदर भविष्य के समाज की चिंता करने की सहज प्रवृति होती है, चाहे उस काल तक हम जीवित रहें या ना रहें.
डॉ. सोजोउ के अनुसार हमारे पूर्वज अपने कबीलों और समुदायों को बचाए रखने की जद्दोजहद में व्यस्त रहते थे. हमारे पूर्वज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड रहे थे. उनके चारों तरह खतरा था और ऐसे समय में उन्हे अपने भविष्य की स्वाभाविक चिंता करनी होती थी.
कालांतर में उनकी यही प्रवृति इंसानों के जिन में शामिल हो गई और आज हम भले ही अधिक सुरक्षित वातावरण में जी रहे हों लेकिन भविष्य की चिंता करना हम आज भी नहीं छोड़ पा रहे हैं.
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