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ऑपरेशन ब्लू स्टार: 25 साल 25 बात |
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विशेष
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बुधवार , , 03 जून |
“क्रिकेट मैच देख आए?”
“जीहाँ गावस्कर का शतक भी!”
ये बातें पाकिस्तानी जासूसों की है जो अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में दाखिल हुए थे. उन्हें जनरैल सिंह भिंडरानवाले से मिलना था. गावस्कर का शतक और क्रिकेट मैच उनका कोडशब्द था.
जब यह बातचीत हो रही थी तब दिल्ली में ऑपरेशन ब्लू स्टार की रूपरेखा तैयार हो रही थी. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और सेना के वरिष्ठ अधिकारियों को भारतीय गुप्तचर संस्था रॉ ने कई ऐसे सबूत दिखाए जो साबित करते थे कि पाकिस्तान खालिस्तान आंदोलन को हवा दे रहा है और उसका इरादा भारत के टुकड़े करना है.
रॉ के अधिकारियों ने कथित तौर पर एक कागज़ का टुकडा दिखा जो नीले रंग का था [सिख धर्म एक पवित्र रंग] और उस पर चाँद सितारे का निशान था [इस्लाम का चिह्न]. मतलब साफ था.
अकाल तख्त पर कब्ज़ा किए बैठे भिंडरानवाले और उसके समर्थकों को बाहर निकालने के लिए प्रधानमंत्री ने सैन्य कार्रवाही की मंजूरी दी, इसका नाम रखा गया ऑपरेशन ब्लू स्टार.
- ऑपरेशन ब्लू स्टार भारतीय सेना द्वारा किया गया पहला ऐसा बड़ा ऑपरेशन था जिसमें उनको दुश्मनों से नहीं बल्कि खुद अपने नागरिकों से लड़ना था. ये वे नागरिक थे जिन्होनें अपनी मांगें मनवाने के लिए चरमपंथ को अपना लिया था और आंतकवादी घटनाओं को अंजाम दिया था.
- इसकी शुरूआत 1983 से हुई थी, जब अलग खालिस्तान की मांग जोर पकड़ चुकी थी और पंजाब अशांत होने लगा था. प्रतिदिन दर्जनों बेगुनाहों की जान जा रही थी.
- अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर में सिख अलगाववादियों ने कब्जा कर लिया था और इस कब्जे को छुड़ाने के लिए तत्कालिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सैन्य कार्रवाही का आदेश दिया.
- सेनाध्यक्ष जनरल वैद्य को ऑपरेशन की रूपरेखा तैयार करनी थी. उन्होने इस ऑपरेशन के लिए मेजर जनरल कुलदीप सिंह ब्रार को कमांडर बनाया.
- सिख अलगाववादियों का नैतृत्व जनरैलसिंह भिंडरानवाले कर रहा था. जनरैल सिंह का जन्म 12 फरवरी 1947 को फरीदकोट जिले के रोडे गाँव में हुआ था. वह विवादास्पद दमदमी टकसाल का नेता था.
- भिंडारावाले अलग सिख राष्ट्र के पक्ष में था और इसके लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार था. 1981 में इसे एक हत्या के कैस में गिरफ्तार किया गया लेकिन बाद में सबूतों के अभाव में छोड़ दिया गया. लेकिन भिंडरावाले पर भारतीय पुलिस की नजर हमेशा बनी रही.
- भिंडरावाले के समर्थकों ने अकाल तख्त पर कब्जा कर लिया था और मंदिर परिसर में भारी मात्रा में गोला बारूद जमा किया गया था.
- ऑपरेशन ब्लू स्टार जून 3 1984 को शुरू किया गया और यह ऑपरेशन जून 6 1984 तक चला.
- इस ऑपरेशन में सेना ने टेंकों और एपीसी मशीनों का भी सहारा लिया.
- इस ऑपरेशन में भारतीय सेना के सामने भिंडरावाले के साथ साथ मेजर जनरल शाहबेग सिंह एमवीसी की चुनौती भी थी. शाहबेग सिंह रिटायर होने से एक दिन पहले सेना से निकाल दिया गया था. शाहबेग सिंह ने स्वर्ण मंदिर के बाहरी परिसर में भारतीय सेना से मुकाबला किया. लेकिन वह अधिक देर तक टिक ना सका.
- जनरैल सिंह के समर्थकों के जबरदस्त प्रतिरोध से भारतीय सेना को भी आश्चर्य हुआ और अंत में कमांडो ऑपरेशन किया गया.
- दोनों तरफ से हुई भारी गोलाबारी में कई निर्दोष लोगों की जानें गई.
- भारतीय सेना को तब काफी हैरानी हुई जब सिख चरमपंथियों ने भारतीय सेना के टेंकों पर एंटी टेंक मिसाइलें दागी. कई टेंक तबाह हो गए थे. इससे साबित हुआ कि जनरैल सिंह के समर्थकों ने किस तरह से हथियार जमा कर रखे थे.
- इससे यह भी साबित हुआ कि इन लोगों को पाकिस्तान जैसे देश का पूर्ण समर्थन हासिल था. वहाँ से इन्हे पैसा और हथियार मिलता था. इसके अलावा विदेशों में रहने वाला सिख समुदाय का एक बडा वर्ग भी इन्हे आर्थिक मदद कर रहा था.
- इस ऑपरेशन की बागडोर मेजर जनरल कुलदीप सिंह ब्रार के हाथों में थी, जो अंत में लिफ्टिनेंट कर्नल बने और रिटायर हुए.
- दोनों तरफ से जारी भारी गोलाबारी के बाद 5 जून देर रात 1 बजे अकाल तख्त को मुक्त कराया जा सका. जनरैल सिंह भिंडरावाले मारा गया. लेकिन आसपास की इमारतों को मुक्त कराने में और 24 घंटें लगने थे.
- इस ऑपरेशन में भारी मात्रा में जानमाल का नुकसान हुआ. भारतीय सेना के अनुसार उसके 83 सैनिक शहीद हुए और 248 घायल हुए जबकि बड़ी संख्या में सिख चरमपंथी मारे गए. कुल 492 लोगों की भी जान गई जिसमें 4 बच्चे थे.
- लेकिन कुछ स्वतंत्र इतिहासकारों की राय अलग है. उनके अनुसार सेना के 700 जवान मारे गए थे और 5000 आम नागरिक भी.
- इस ऑपरेशन का देश और दुनिया पर व्यापक असर पड़ा था. देश के अंदर अशांति का वातावरण फैल गया था.
- बड़ी संख्या में सिख सेना अधिकारियों और जवानों ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था.
- लेखक खुशवंत सिंह ने अपना पद्म भुषण सम्मान लौटा दिया था. उनकी तरह ही कई अन्य सिखों ने भी अपने पुरस्कार लौटा दिए.
- कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कांग्रेस पार्टी छोड़ दी थी. बाद में कई साल बाद वे फिर कांग्रेस में शामिल भी हुए और मुख्यमंत्री भी बने.
- घटना के करीब 5 महीनों बाद 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी के उनके ही दो सुरक्षा अधिकारियों ने हत्या कर दी.
- जनरल वैद्य 10 अगस्त 1986 को पूणे में हत्या कर दी गई. इस हत्या के आरोपी सुखदेव सिंह सुक्खा और हरजिंदर सिंह ज़िंदा को 9 अक्टूबर 1992 को फाँसी हुई.
- इंदिरा गांधी की हत्या के बाद व्यापक पैमाने पर सिख विरोधी दंगे शुरू हो गए और हजारों की संख्या में सिख मारे गए. कई कांग्रेसी नेता कथित रूप से इस कत्लेआम में शामिल रहे.
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