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- इंटरनेट पर खोज करने को “गूगल” नाम ही दे दिया गया है
- गूगल को अंग्रेजी में “रेफरेंस” सर्च इंजिन कहा जा सकता है
- वोल्फ्राम अल्फा में “Hindi” खोज करिए और आपको हिन्दी भाषा से संबंधित जानकारी सीधे ही एक पन्ने पर मिल जाएगी
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आम तौर पर ऐसा माना जाता है कि इंटरनेट पर खोज यानी
गूगल . आज करीब
65% इंटरनेट प्रयोक्ता किसी भे विषय पर खोज करने के लिए गूगल का प्रयोग करते हैं. यही वजह है कि इंटरनेट पर खोज करने को “गूगल” नाम ही दे दिया गया है. आज कई जगह यह पढा जा सकता है कि, क्या तुम कुछ ढूंढ रहे हो? तो गूगल कर लो.
तो क्या गूगल का कोई विकल्प नहीं है या फिर गूगल ही सबसे बेहतर सर्च इंजिन है. दूसरी बात काफी हद तक सही है.
गूगल लगातार लाखों साइटों की सारिणी बनाता रहता है और करोड़ो कीवर्ड उसके डेटाबेस में संग्रहित हैं. आपके द्वारा डाले गए कीवर्ड से इनका मिलान कर वह नतीजे प्रस्तुत करता है.
गूगल को अंग्रेजी में “रेफरेंस” सर्च इंजिन कहा जा सकता है यानी कि गूगल आपके खोज शब्दों को पढकर उससे संबंधित वेबपन्नों की सूचि आपके समक्ष पेश करता है. उसके बाद यह आपको तय करना होता है कि कौन सी कड़ी आपको वांछित परिणाम देगी.
लेकिन अब कुछ “इनरेफरेंस” सर्च इंजिन भी उपलब्ध है. ये वे सर्च इंजिन होते हैं जो आपकी खोज को पढकर कर किसी भी प्रकार की कड़ी उपलब्ध करवाने की बजाय सीधे परिणाम उपलब्ध करवाते हैं. ट्रु नोलेज और
वोल्फ्राम अल्फा ऐसे ही सर्च इंजिन हैं.
वोल्फ्राम अल्फा में “
Hindi ” खोज करिए और आपको हिन्दी भाषा से संबंधित जानकारी सीधे ही एक पन्ने पर मिल जाएगी. लेकिन यही खोज गूगल पर करने पर आपको ‘
हिन्दी ” के विकीपीडिया पन्ने के अलावा अन्य कई कड़ियाँ मिलेंगी जैसे कि – हिन्दी कैसे लिखें, हिन्दी ब्लाग, हिन्दी कविता आदि.
इस तरह के सर्च इंजिनों के कई फायदे हैं. एक तो यह कि ये आपका समय बचाते हैं. आप जो खोज करते हैं उसके नतीजे तुरंत मिल जाते हैं. दूसरा यह कि आप अवांछित साइटों तथा मेलवेर वाली साइटों पर जाने से बच जाते हैं क्योंकि आपको किसी कडी पर क्लिक नहीं करना पडता है. और तीसरा फायदा यह कि आपको “कुछ ज्यादा ही” परिणाम नहीं मिलते. बहुत अधिक जानकारी भी कभी कभी खीज पैदा कर देती है.
तो क्या भविष्य में गूगल की उपयोगिता कम हो जाएगी?
ऐसा भी नहीं लगता. इतनी सारी नई तकनीकों तथा नए सर्च इंजिनों के आ जाने के बाद भी गूगल की उपयोगिता उतनी ही बनी हुई है. इसकी वजह यह है कि गूगल आपकी खोज से संबंधित कई ऐसे आँकडे और जानकारियाँ प्रस्तुत करता है जो अमूमन नहीं मिलते.
दूसरा यह कि गूगल आपकी खोज से संबंधित अन्य कीवर्ड भी प्रस्तुत करता है जिससे आपका समय बचता है और अंत में सबसे बडी बात – गूगल कीवर्ड को पढकर उससे संबंधित वेबपन्ने प्रस्तुत करता है जो अन्य स्रोतों से आते हैं. ये स्रोत लगातार बढ रहे हैं और इससे आपको अधिक से अधिक जानकारी मिल जाती है. यह चीज वोल्फ्राम अल्फा जैसे सर्च इंजिनों में सम्भव नही है.
इस बहस का नतीजा यह कि दोनों तरह के सर्च इंजिनों की अपनी अपनी कमियाँ हैं तथा अपनी अपनी उपयोगिता है. यह आपके ऊपर निर्भर करता है कि आप कब किस प्रकार के सर्च इंजिन का उपयोग करते हैं.