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समलैंगिक संबंध मान्य: समाज जुड़ा - भारत बँटा
विशेष
शुक्रवार , , 03 जुलाई
तरकश ब्यूरो



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  • अदालत ने माना कि समलैंगिक यौन संबंध बनाना गैरकानूनी नहीं हो सकता
  • धारा 377 सविँधान के खिलाफ है और मानव के गौरव की रक्षा का हनन करती है
  • धारा 377 का समावेश लार्ड मैकॉले ने किया किया था
  • आज हमारा स्वतंत्रता दिवस है – कुँअर मानवेन्द्र सिंह गोहिल
  • मुझे आज भारतीय होने पर गर्व हो रहा है – वेंडेल रोड्रिक, फैशन डिज़ायनर
  • यह फैसला दुर्भाग्यपूर्ण है और कांग्रेस की साजिश है – प्रकाश शर्मा, बजरंग दल समलैंगिकता इस्लाम और भारतीय सभ्यता के खिलाफ है – मौलाना खालिद रशीदी
  • समलैंगिकता स्वीकार्य आचरण नहीं है – फादर बाबु जोसेफ 
  • समलैंगिक संबंधों से अपराध और गंदी मानसिकता फैलेगी – बाबा रामदेव
  • अब सिखों से अनुरोध करेंगे कि वे ऐसा आचरण ना अपनाएँ – ज्ञानी गुरबचन सिंह
  • आप बेडरूम में क्या करते हैं, इससे आप अपराधी नहीं हो जाते – सेलिना जेटली, अभिनेत्री
  • हम इस मुद्दे पर चर्चा करने में असमर्थ हैं – सुष्मा स्वराज, भाजपा नेता 
  • इस मुद्दे का हमारी पार्टी से कोई लेना देना नहीं है – शकील अहमद, कांग्रेस प्रवक्ता

उपरोक्त बयानों से स्पष्ट है कि एक ऐसा मुद्दा देश में उठ रहा है जिस पर नागरिकों की राय बँट गई है और आने वाले समय में यह मुद्दा कई विवाद खडे कर सकता है.

दिल्ली उच्चन्यायालय के एक ऐतिहासिक फैसले ने भारत को बाँट दिया है. दिल्ली उच्चन्यालय ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए आईपीसी की धारा 377 को गैरकानूनी करार दिया और कहा कि इस धारा की वजह से सँविधान की उस मूल भावना का हनन होता है जिसमें कहा गया है कि देश का प्रत्यैक नागरिक स्वतंत्र है और उसे अपने अधिकारों के इस्तेमाल की छूट मिलती है.

अदालत ने माना कि समलैंगिक यौन संबंध बनाना गैरकानूनी नहीं हो सकता. इस तरह उच्च न्यायालय ने समलैंगिक संबंधों को कानूनी मान्यता दे दी. इससे एक और जहाँ देश के समलैंगिक लोगों तथा कुछ बुद्धिजीवियों में खुशी की लहर दौड़ गई है वहीं लगभग सभी धर्मगुरूओं ने इसका विरोध किया है. वहीं राजनेता समय की मांग को देखते हुए चुप्पी साध गए हैं.

उच्च न्यायालय के निर्णय के मुख्य बिंदु:
  • धारा 377 सविँधान के खिलाफ है और मानव के गौरव की रक्षा का हनन करती है.
  • 18 वर्ष से ऊपर के समलिंगी व्यक्तियों के बीच स्थापित होने वाला यौन सबंध गैर कानूनी नही है.
  • वयस्क व्यक्ति आपसी सहमति से समलैंगिक संबंध स्थापित कर सकते हैं.
  • 18 वर्ष से कम उम्र के लोगों के बीच यौन संबंध मान्य नही है.

समलैंगिक सेक्स को कानूनी मान्यता देने वाला भारत दुनिया का 127 वां देश बन गया है. दुनिया के कई अन्य देश इसे पहले से ही मान्यता दे चुके हैं वहीं अभी भी 80 देश ऐसे हैं जहाँ यह मान्य नही है.

समलैंगिक सेक्स को मान्यता देने वाला प्रथम देश डेनमार्क था. यहाँ सन 1989 को समलैंगिंग सबंधों को मान्यता दी गई थी. इसके बाद कई अन्य यूरोपीय देशों जैसे कि नोर्वे, स्वीडन और आयरलैंड ने भी इसे मान्यता दी. 2001 में नीदरलैंड ने समलैंगिक युगल को नागरिक विवाह अधिकार देकर नई प्रथा शुरू की और कई यूरोपीय देशों ने उसका अनुसरण भी किया.

समलैंगिक सेक्स संबंधित कानून:
यह कानून करीब 150 साल पुराना है. धारा 377 का समावेश लार्ड मैकॉले ने किया किया था. इस धारा के अनुसार समलैंगिक संबंध और अप्राकृतिक यौन संबंध स्थापित करना गैर कानूनी और सजापात्र गुनाह माना गया है. धारा 377 के अनुसार यदि कोई व्यक्ति किसी महिला या पशु के साथ अप्राकृतिक रूप से यौन संबंध [गुदामैथुन] –स्वैच्छा से ही सही – स्थापति करता है तो यह अपराध है. सन 1935 में इस धारा में सुधार किया गया और इसमें मुखमैथुन भी जोड दिया गया.

समलैंगिकता और धर्म:
प्राचीन धर्मग्रथों में शीव के अर्धनारिश्वर अवतार और विष्णु के मोहिनी अवतार का काफी जिक्र आता है. पौराणिक इतिहास का सबसे चर्चित समलिंगी पात्र शायद शिखंडी है. भीष्म की मृत्यु में महत्वपूर्ण पात्र निभाने वाले शिखंडी का जन्म कन्या के रूप में हुआ था. परंतु उसके पिता द्रुपद को यकीन था कि शिव के वचनानुसार शिखंडी एक दिन पुरूष बन जाएगा और उसे उसी तरह से पाला गया था. इससे शिखंडी महिला और पुरूष के बीच में पीस गया.

कई इस्लामी विद्वान भी समलैंगिकता की हिमायती थे अथवा स्वयं समलैंगिक थे. प्रसिद्ध लेखक सलीम किदवई के अनुसार  मीर तकी मीर इसका एक उदाहरण है. इसके अलावा शरमद शाहीद जिन्हे हरे भरे शाह के नाम से भी जाना जाता है और जिनकी कब्र दिल्ली की जामा मस्जिद में है, वे भी समलैंगिक थे ऐसी मान्यता है.
 
वास्तव में यह विषय काफी जटील है. लगभग हर धर्म के अगुवा इसका विरोध कर रहे हैं वहीं समाज का एक ऐसा वर्ग भी है जो इसका प्रखर हिमायती है. इस सब को देखते हुए आने वाले समय में इस विषय पर जोरदार बहस होने की सम्भावना है. और सरकार के लिए यह एक एक चुनौती है. 


टिप्पणियाँ (1)add
रसातल में गई दुनिया
द्वारा प्रेषित कमल शर्मा , जुलाई 03, 2009
समलैंगिकता पर बहस हो सकती है, अपने अपने विचार हो सकते हैं। लेकिन प्राकृतिक नहीं है। इस फैसले के बाद तो लगता है कि जल्‍दी ही पशुओं के साथ, मुखमैथुन को भी अदालत की मान्‍यता मिल जाएगी। किन अधिकारों का हनन होता है, हनन नहीं होता है लेकिन सभ्‍यता और संस्‍कृति भी कोई चीज होती है। अदालत से यह भी आज्ञा ली जानी चाहिए कि बेडरुम के बजाय आम चौराहों पर कुत्तों की तरह सेक्‍स किया जाए तो क्‍या एतराज है। जब वह आम सहमति से हो रहा हो। पूरे देश को महासत्ता बनने के बजाय सेक्‍स सत्ता बना दो.................।
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