एक मुस्लिम बंधु ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि जातिप्रथा मात्र हिन्दूओं में पाई जाती है तथा मुस्लिम धर्म - उनके ही शब्दों में अमीर-गरीब, गुलाम-मालिक, हाकिम-मह्कूक, काले-गोरे, नाटे-लम्बे में कोई भेद नहीं रखता.”
मुझे लगता है मित्र सलीम खान ने कई महत्वपूर्ण तथ्यों की तरफ गौर ही नहीं किया, या करना नहीं चाहते.
जातिवाद एक कुप्रथा है, इसमें कोई शक नहीं परंतु यह किसी एक विशेष धर्म तक सिमित नहीं है. इंसान का स्वभाव ही ऐसा है कि वह होगा तो जातिप्रथा भी होगी और इस्लाम भी इससे अछूता नहीं है.
मेरे मन में सबसे पहले जो छवि उभरती है वह है मुख्तारन बीबी की. मुख्तारन बीबी पाकिस्तान के मीरवाला गाँव की रहने वाली है. उसके साथ जो हुआ वह आँखे खोलने वाला है.
एक अखबार की खबर को यदि ज्यों का त्यों लिखूँ तो - “तीन ऊँची जाति
के कबिलाई पुरूषों ने पहले उसके 11 वर्षीय भाई के साथ शारीरिक जबरदस्ती
की. बाद में उनके कृत्य को ढकने के लिए गाँव की कबिलाई कौंसिल ने आरोप
लगाया कि उस लडके के एक 30 वर्षीय ऊँची जाति की महिला के साथ अवैध संबंध
थे.
कौंसिल ने हुक्म जारी किया कि लडके की बहन मुख्तारन बीबी जो कि नीची जाति “गुज्जर” से आती है के साथ बलात्कार किया जाए.” [न्यूयार्क टाइम्स]
जाहिर है, उपरोक्त घटना से संबंधित सभी लोग मुस्लिम हैं.
मुस्लिम लोगों में भी जातिप्रथा होती है और ऊँची जाति के लोगों द्वारा
नीची जाति के लोगों को सताया जाता है. और यह आज की बात नहीं है.
शिया, सुन्नी और बोहरा तो छोडिए परंतु प्राचीन काल से मुस्लिम लोग अशरफ और अज़लफ
समूहों में बाँटे गए हैं. अशरफ लोगों के पूर्वज अरब थे और ये लोग ऊँची
जाति के माने जाते हैं. अज़लफ लोग “हिन्दूओं” से धर्मांतरित लोग समझे जाते
हैं और इन्हें नीची जाति का माना जाता है.
मुहम्मद बिन तुगलक के दरबार के सदस्य और तुर्की शिक्षाविद ज़ियाउद्दीन बरानी के द्वारा लिखे गए फतवा-ए-जहाँदारी मुस्लिम जातिप्रथा को उजागर करता है.
फतवा-ए-जहाँदारी में लिखा हुआ है कि अशरफ मुस्लिम अज़लफ मुस्लिमों की
अपेक्षा जातिगत रूप से श्रेष्ठ हैं. बात यहीं समाप्त नहीं होती.
ज़ियाउद्दीन बरानी ने इन दो जातियों की भी कई उपजातियाँ बनाई.
जियाउद्दीन ने सभी उच्च पदों के लिए अशरफ मुस्लिमों की पैरवी की.
ज़ियाउद्दीन बरानी के शब्दों में - अशरफ मुहम्मद की संतान हैं, उन्हें नीच
कुल में जन्मे अज़लफ लोगों की अपेक्षा अधिक सम्मान और सामाजिक स्थान मिलना
चाहिए.
ज़ियाउद्दीन ने स्पष्ट कहा है कि अज़लफ लोगों को शिक्षा देने की आवश्यक्ता नहीं है तथा वे अशरफ लोगों के दास हैं.
इसके अलावा एक तीसरी जाति अर्ज़ाल भी होती है. बाबासाहेब अम्बेडकर ने
अर्ज़ाल जाति के मुस्लिमों को हिन्दू अछूत लोगों के समकक्ष माना था.
अर्ज़ाल जाति में भी उपजातियाँ होती है. [मै उनके नाम नहीं लिख रहा हूँ,
मुझे ठीक नहीं लगता]. 1901 में भारत में जब जनसंख्या गणना कराई गई थी तो
उसमें दलित मुस्लिम का भी उल्लेख था.
दलित मुस्लिम की व्याख्या क्या लिखी गई थी देखिए -
“दलित मुस्लिम वह होता है जिसके साथ अन्य मुहम्मदन कोई संबंध नहीं रखता है
तथा जिसे मस्जिद में प्रवेश करने की तथा सार्वजनिक कब्रस्तानों का उपयोग
करने की अनुमति नहीं होती है.”
मेरे पास पूरी सूचि है जिसमें बताया गया है कि कौन से मुस्लिम समुदाय
नीची जाति के और कौन से समुदाय ऊँची जाति के माने जाते हैं. लेकिन मेरा मन
वे नाम यहाँ लिखने की अनुमति नहीं देता.
अंत में पूर्व नागरीक संसाधन विकास मंत्री श्री अर्जुन सिंह के शब्द -
“मुस्लिमों को अन्य पिछड़ी जाति श्रेणी में आरक्षण मिलना चाहिए और इसमें
दलित मुस्लिमों के लिए अलग से कोटा होना चाहिए”.
इसके अलावा कई ऐसे उदाहरण हैं जो साबित करते हैं कि मुस्लिम धर्म में भी जातिप्रथा होती है. उनका जिक्र बाद में.
[लेखक तरकश.कॉम के कार्यकारी सम्पादक हैं]