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पैसों से खुशियाँ नहीं खरीदी जा सकती, यह सच है! |
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रोचक तथ्य और जानकारी
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मंगलवार , , 11 अगस्त |
यह एक पुरानी कहावत है – पैसों से सबकुछ खरीदा जा सकता है परंतु खुशियाँ नहीं. यदि एक शोध और उसके कुछ विश्लेषणों पर गौर किया जाए तो पता चलता है कि यह कहावत गलत नहीं है, बशर्ते कि इंसान के लिए खुशियों के मायने क्या हों.
हाल ही में सम्पन्न अमेरिकन साइकोलोजी एसोशिएसन के 117वें वार्षिक सम्मेलन के दौरान बोलते हुए डॉ. एड डायनर और डॉ. रोबर्ट बिस्वास-डायनर ने बताया कि किस तरह से पैसों की वजह से जिंदगी आसान और बेहतर बन सकती है परंतु उससे व्यक्ति की दैनिक जिंदगी खुशहाल नहीं बन सकती.
गैलप ओर्गेनाइज़ेशन ने 2005-2006 में एक सर्वे करवाया था जिसमें 132 देशों के 1,36,000 लोगों ने भाग लिया था. इस सर्वे के माध्यम से यह जानने का प्रयास किया गया कि लोगों के लिए पैसों का कितना महत्व है और पैसों की वजह से उनकी भौतिक और व्यवहारिक खुशी में कितना अंतर आता है.
इस सर्वे के जाना गया कि भाग लेने वाले लोगों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति कैसी है. उस व्यक्ति की आर्थिक स्थिति का उसकी मनौवैज्ञानिक जरूरतों जैसे कि सम्मान, खुशी, और परिवार तथा मित्रों के सहयोग से मिलान किया गया.
नतीजों से पता चला कि पैसों की वजह से इंसान की भौतिक खुशी तो जरूर बढ जाती है. उसके अंदर संतुष्टि की भावना आने लगती है. लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि अमीर व्यक्ति के पास मानसिक खुशी भी आ जाएगी. मनौवैज्ञानिक खुशी तो व्यक्ति के कार्यकलापों और मेलजोल की भावना पर ही निर्भर करती है. उसे पैसों की ताकत से बढाया नहीं जा सकता.
जो खुशी परिवार के साथ रहने, मित्रों के साथ बातचीत करने, अपने पसंद का कार्य करने, प्रार्थना करने, नए दोस्त बनाने, किसी की मदद करने से प्राप्त होती है उसे पैसों से नहीं खरीदा जा सकता.
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