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बाजार से असहयोग
मेरे विचार
सोमवार , , 07 सितम्बर
मेरे विचार
manojkumar.jpg मनोज सिंह



गुवाहाटी से एक सम्मानीय पाठक का फोन आया था। बातचीत के दौरान कुछ-कुछ परेशान लग रहे थे। विस्तार से पूछने पर बताने लगे कि आजकल टीवी सीरियल में दिखाए जाने वाले अश्लील व भद्दे दृश्य के कारण वह बहुत दुःखी हैं। और कहने लगे कि मुझे इसके विरोध में लिखना चाहिए। हुआ यूं कि वह अपने परिवार के साथ सच बोलने पर आधारित एक टेलीविजन रिएलिटी शो देख रहे थे। उनके परिवार में माता-पिता व पत्नी के अतिरिक्त छोटे भाई-बहन भी हैं। कार्यक्रम में सच के नाम पर पूछे गए कुछ व्यक्तिगत अंतरंग सवाल-जवाब के दौरान ऐसी परिस्थिति बन गई कि वह अपने भाई-बहन और माता-पिता से अब नजर भी नहीं मिला सकते। और तब से घर के सभी लोग बहुत शर्मिंदा हैं।


उपरोक्त घटना घर-घर की कहानी है। हर सज्जन, सरल, शरीफ व आम आदमी इन कार्यक्रमों के विरोध में बात करता मिल जाएगा। इसमें कोई शक नहीं कि टेलीविजन पर आजकल अश्लीलता, अनैतिकता, अभद्रता, व नग्नता अपने चरम पर है। शादी के स्वयंवर के नाम पर नाते-रिश्तों की भावनाओं से खेला जाता है तो रोड शो के नाम पर सड़क छाप गुंडागर्दी, गाली-गलौज दिखाई जाती है और फिर जंगल में जंगलीपन हो या बंगले में नजरबंद तथाकथित सितारे, सभी में टीआरपी के चक्कर में सेक्स परोसा जा रहा है। अमूमन सीरियल की हालत तो और बदतर है। वैसे तो सेक्स हमारे जीवन का अभिन्न अंग है और आदिकाल से यह हमारी सभ्यता, संस्कृति व साहित्य में सम्मानीय स्थान पाता रहा है। नव रसों में श्रृंगार रस प्रमुख माना जाता रहा है। तभी तो श्रृंगार रस पर आधारित लोकप्रिय महाकाव्य लिखे गए। एक पूरा काल है रीतिकाल, जो इस रस में डूबा हुआ था। मगर आज जो कुछ दिखाया जा रहा है वो घटिया, सस्ता और बाजारू है। कलात्मक नहीं, श्रृंगारिक नहीं। यही नहीं, काल्पनिकता के नाम पर झूठ की यहां कोई सीमा नहीं रह गई। सितारा हैसियत पाने के लिए कला या गुण की आवश्यकता नहीं, विवादास्पद व्यक्ति होना काफी है। लोगों की भावनाओं को भड़काने के लिए मनगढ़त कहानियां गढ़ी जाती हैं। चर्चा में आने व बने रहने के लिए सच्चे-झूठे किस्से जबरन फैलाए व दिखाए जाते हैं। जिज्ञासा पैदा करने के उद्देश्य से अस्वाभाविक मोड़ कहानी में दिए जाते हैं। ड्राइंग रूप में बैठकर देखे जाने वाला टीवी बेडरूम व बाथरूम के दृश्य दिखाने लग पड़ा है। अब चूंकि बाजारवाद में पैसे से कुछ भी खरीदा जा सकता है और बिकने के लिए लोग तैयार हैं, बस कीमत व बोली लगाई जानी होती है। और फिर उसके बाद शरीर के किसी भी हिस्से से ही नहीं दिल और आत्म से भी खेला जा सकता है। और इस तरह से दर्शकों-पाठकों की भावनाओं, विचारों, दृष्टिकोण को दूषित किया जा रहा है। चूंकि मानव में संवेदना कूट-कूट कर भरी होती हैं, जिज्ञासा उसकी प्रवृत्ति है तो सेक्स के प्रति आकर्षण उसका स्वभाव है। आमतौर पर वह अपनी इंद्रियों के द्वारा नियंत्रित होने लग पड़ता है। और यह उसे पाश्विकता की ओर ले जाती है। वैसे तो शरीर की प्यास और मन की चाहत उसकी कभी भी पूरी नहीं हो सकती, संतुष्ट नहीं होती। यह प्राकृतिक व्यवस्था है। वह सदैव भूखा-प्यासा ही रहता है। सुबह का खाया शाम को खाने के लिए फिर तैयार। ऐसे में जंगली पशु से सामाजिक सभ्य मनुष्य बनाने के लिए उसकी इसी कमजोरियों को नियंत्रित करने की आवश्यकता होती है। मगर बाजार द्वारा उसकी इसी भावनाओं को, चाहतों को, इच्छाओं को, महत्वाकांक्षाओं को, प्यास को भड़काने का प्रयास किया जाता है। यकीनन इससे सामाजिक व्यवस्था पर असर तो पड़ेगा ही और पड़ रहा है।


बाजार की अवस्था और उपरोक्त व्यवस्था का खूब विरोध होता है। मीडिया की जमकर आलोचना होती है। लेख लिखे जाते हैं। न्यायालय में केस किए जाते हैं। सड़कों पर विभिन्न सामाजिक संगठन नारेबाजी भी करते हैं। इन अर्द्ध-नग्न नायिकाओं और जंगली नायकों के पुतले भी जलाये जाते हैं। इन सबके बावजूद यह सिलसिला थमने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है। उलटे इन नकली नायकों की आमदनी दिन-दुगुनी रात चौगुनी बढ़ रही है। कहीं-कहीं तो यह विरोध उनकी लोकप्रियता को बढ़ाने के लिए सहायक सिद्ध हो रहा है। क्या कारण है? असल में ये सब प्रयास सतही हैं। उनमें कोई सिद्धांत व विचारधारा नहीं। विरोध करने वाले, नारे लगाने वाले, न्यायालय में केस दर्ज करने वाले, नैतिकता की दुहाई देने वाले, घर पर पहुंचकर टीवी ऑन करके खुद इन कार्यक्रमों को देखने के लिए लालायित रहते हैं। अपनी मस्तिष्क में उठी उत्तेजना को शांत करने के लिए बाहर तो आलोचना करते हैं मगर घर में पहुंचकर दिल के हाथों मजबूर होकर उसी कार्यक्रम को फिर एकटक देखते भी हैं। क्योंकि उसके अंदर का जंगली मनुष्य अपनी पश्विकता को शांत करने के लिए उसे मजबूर करता है। वह टेलीविजन की स्क्रीन के सामने लज्जित तो होता है फिर भी अपनी जिज्ञासा, चाहत व विभिन्न तरह की प्यास के हाथों मजबूर होकर टकटकी लगाए देखता भी है।


शरीर की इंद्रियों के द्वारा नियंत्रित बाजार के विचारधारा की कोई आत्मा नहीं। यह स्वार्थ में डूबी होती है। यह ऐसा कालचक्र है जो अपनी गति में सबको उड़ा ले जा रहा है। तभी तो देखिए इन अनपढ़ गंवार भौंडा नाच करने वाले नचनियों को देखने के लिए आज की आधुनिक तथाकथित  पढ़ी-लिखी पूरी दुनिया पागल हो जाती है। सवाल उठता है कि फिर क्या किया जाए? इस आंधी-तूफान को कैसे रोका जाए? इस बर्बादी से कैसे बचा जाए? कुछ बुद्धिमान यह तर्क देते हैं कि संस्कृति व सभ्यता समय के साथ परिवर्तनशील है। यह स्वाभाविक है। समय के साथ समाज का स्वरूप भी बदलेगा। परंतु यह परिवर्तन आत्मघाती है। और फिर जब यह समाज के मूल सिद्धांतों को ही छिन्न-भिन्न करने लगे तो यह चिंतन नहीं चिंता का विषय बन जाता है। जब नींव ही डगमगा जाएगी तो इमारत कैसे टिकी रहेगी? ऐसे में उपाय भी सामान्य नहीं हो सकते। नींव तक पहुंचने के लिए मूल में जाना होगा। इतिहास के पन्नों को पलटना होगा। पुराने अनुभवों से सीखना होगा। और मन में विचार जागा कि एक बार फिर हमें स्वतंत्रता संग्राम के असहयोग आंदोलन के मूल तत्व का सहारा लेना चाहिए। जिस तरह से हमारे पूर्वजों ने ब्रिटिश हुकूमत के विरोध में विदेशी सामान की होली जलाई, वैसा ही कुछ करना होगा। सामान्य रूप में देखें तो हम अपनी कमजोरियों से पैदा दुष्परिणामों को दूसरों पर थोपते हैं, पूछा जाना चाहिए क्यों? जिस दिन हम इन कार्यक्रमों को देखना बंद कर देंगे, यह सब अपने आप ही समाप्त हो जाएंगे। कोई हमें जबरदस्ती तो नहीं करता इनको देखने के लिए, तो फिर हम इन कार्यक्रमों को देखते ही क्यो हैं? अगर हमें अपने ऊपर नियंत्रण नहीं तो उससे होने वाले दुष्परिणामों का दोषारोपण दूसरों पर क्यों? टीवी का चैनल बदलना तो अपने हाथ में है। अपने हाथ की उंगलियां हमारे वश में नहीं तो यह दोष हमारा हुआ। जिस दिन हम बाजार की मायावी शक्तियों के नियंत्रण से निकल जाएंगे बाजार हमारे नियंत्रण में आ जाएगा। जिस दिन हम इन परदे पर दिखने वाले नकली नायकों के सपनों की दुनिया के आकर्षण व मोहजाल से मुक्त होकर वास्तविक दुनिया में आ जाएंगे, उस दिन हमारा घर बाजार बनने से बच जाएगा।


यह सब इतना आसान नहीं। चूंकि यह लड़ाई किसी और से नहीं, अपने आप से करनी है। हां, इतिहास व जननायकों से हम सीख ले सकते हैं। गांधी जी ने अंग्रेजी हुकूमत से कैसे लोहा लिया था? अंग्रेजी साम्राज्य उन दिनों मजबूत, विशाल, ताकतवर, चालाक, बुद्धिमान व संगठित भी था। ठीक हमारी इंद्रियों की तरह। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान की जनता कमजोर, धर्मजाति में बंटी हुई, भाषा के नाम पर विभाजित व गरीब भी थी। हमारे कमजोर दिल की तरह। लोगों को समझ नहीं थी। वे अनपढ़ व असंगठित थे। ऐसी कमजोर व छितरी-बितरी सेना के साथ ब्रिटिश साम्राज्य से लोहा लेना कोई आसान काम नहीं था। गांधी अगर सीधे-सीधे लड़ते तो शायद हार जाते। चोट भी लगती। उन्होंने धीरे-धीरे बड़े सामान्य ढंग से अंग्रेजी शासन का विरोध स्वरूप असहयोग किया। विदेशी सामान का बहिष्कार किया। साथ ही साथ विभिन्न मुद्दों पर धीरे-धीरे आम जनता को संगठित किया। और एक दिन ऐसा आया कि अंग्रेजी हुकुमरानों को यह देश छोड़ना पड़ा।


आज हमारा समाज एक बार फिर मुश्किल में है। हर व्यक्ति आत्मकेंद्रित हो गया है। बाजार की शक्तियों ने परिवार के सदस्यों को एक ही छत के नीचे अलग-अलग कमरे में बांट दिया। लोगों के बीच दीवार खड़ी कर दी। हर आदमी एक उपभोक्ता बना दिया गया। वह बाजार का लक्ष्य बन चुका है। दूसरी तरफ हम दिल के हाथों मजबूर हैं और इंद्रियों के अधीन। इस प्रक्रिया में टेलीविजन ने महत्वपूर्ण एवं प्रमुख भूमिका अदा की। अगर हमें बाजार से निकलकर पुनः अपने सभ्य समाज में लौटना है, मानवीय संबंधों की मधुरता व रिश्तों की गर्माहट महसूस करनी हो तो सर्वप्रथम हमें इस टेलीविजन के शिकंजे से निकलना होगा। हर वो कार्यक्रम जो हमारे परिवार और समाज के लिए ठीक नहीं हैं उसे देखना तुरंत बंद करना होगा। जिस दिन देश की आम जनता यह प्रण कर ले कि वह भद्दे, अश्लील व गैर-जिम्मेदाराना कार्यक्रम नहीं देखेगी, कोई वजह नहीं कि ऐसे कार्यक्रम फिर बन पाएंगे। यह अपनी मौत खुद मर जाएंगे। सवाल सिर्फ इतना-सा है कि पहल कौन करे? दूसरों की तरफ देखने से अच्छा है शुरुआत स्वयं से होनी चाहिए। आज और अभी से। उठिए और बंद कर दीजिए उन सब को देखना, जो आंखों को चुभते हैं।

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मनोज सिंह
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