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दुनिया की पहली तैरने वाली पवनचक्की
तकनीक
मंगलवार , , 15 सितम्बर
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इस तरह की पवन चक्की समुद्र में 120 मीटर से लेकर 700 मीटर की गहराई वाले पानी में लगाई जा सकती है
जमीन पर, पहाड़ पर या रेत के टीलों के ऊपर लगी पवनचक्कियों को घुमते हुए तो आपने देखा ही होगा लेकिन क्या कभी पानी में तैरती पवनचक्की देखी है? नहीं देखी होगी. क्योंकि इस तरह की पवनचक्की अभी तक एक ही जगह पर लगाई गई है.

हाल ही में दुनिया की पहली तैरने वाली पवनचक्की का उद्घाटन नोर्वे के उत्तरी समुद्री इलाके में किया गया. इस पवनचक्की का नाम हाईविंड रखा गया है और इसकी ऊँचाई 65 मीटर और वजह 5300 टन है. यह पवनचक्की किनारे से 10 किलोमीटर दूर समुद्र में तैरती है.

यह पवनचक्की जिस फ्लोटर पर इस्टाल की गई है उसका इस्तेमाल कभी तेल के प्रोडक्शन यूनिट के बेस के तौर पर किया जाता था. पवनचक्की को इस प्लेटफार्म पर स्थिर रखने के लिए तीन केबल, पानी और पत्थरों का सहारा लिया गया है.

इस तरह की पवनचक्की की लागत आम पवनचक्कियों की अपेक्षा अधिक आती है. उदाहरण के लिए हाईविंड को ही लें तो 2.3 मेगावॉट बिजली पैदा करने वाली इस पवनचक्की की लागत 66 मिलीयन डॉलर आती है जो कि जमीन पर लगाई जाने वाली पवनचक्कियों की लागत से कहीं अधिक है.

तो फिर इस तरह की पवनचक्की को लगाने का लाभ क्या? स्टेटोइहाइड्रो के एन स्ट्रोम्मेन इसकी वजह बताते हैं कि इस तरह की पवन चक्की समुद्र में 120 मीटर से लेकर 700 मीटर की गहराई वाले पानी में लगाई जा सकती है, इससे इसे किनारे से काफी दूर भी लगाया जा सकता है, इससे यह कोई व्यवधान खड़ा नहीं करती. इसके अलावा आसपास खुला वातावरण मिलने से इसकी कार्यक्षमता भी बढ़ जाती है. इसका एक फायदा यह भी है कि चुँकि यह पवनचक्की जमीन पर नहीं लगती इसलिए कम्पनियों को जमीन अधिग्रहण की कार्यवाही नहीं कर पड़ती.

अभी तो इस तरह की एक ही पवनचक्की कार्यरत हुई है. लेकिन इस क्षैत्र का भविष्य उज्जवल है और एक दिन समुद्र में तैरती हुई पवनचक्कियाँ देखना एक आम बात होगी. 



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