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| मून इम्पैक्ट प्रोब ने भी चन्द्रमा की धरती पर पानी पाया है
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इसरो अध्यक्ष जी माधवन नायर ने स्पष्ट किया है कि चन्द्रयान 1 के द्वारा चन्द्रमा पर पानी की खोज एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है. यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चन्द्रमा पर पानी की खोज मात्र नासा द्वारा लगाए गए मून मैपर यंत्र की वजह से ही ज्ञात नहीं हुई है.
किसने खोजा पानी?
दरअसल चंद्रयान-1 के साथ नासा के उपकरण लगे थे. इनमें से एक था 'मून मिनरलोजी मैपर [एम-3]'. इस यंत्र ने चन्द्रमा के ऊपर परावर्तित प्रकाश की वेवलेंथ का पता लगाया जो ऊपरी
मिट्टी की पतली परत पर मौजूद सामग्री में हाइड्रोजन और आक्सीजन के बीच
रासायनिक संबंध का संकेत देती है. सूरज की रोशनी पड़ने पर यह नीले रंग का आवरण बनाती है जो पानी की मौजूदगी का सबूत है.
नासा ने इस बारे में बयान दिया है कि चंद्रयान-1 द्वारा जुटाए गए विवरण का विश्लेषण कर एम-3 ने चंद्रमा पर
पानी के अस्तित्व की पुष्टि की है.
लेकिन इस खोज के लिए मात्र 'मून मिनरलोजी मैपर [एम-3]' ही जिम्मेदार नहीं है. इसरो अध्यक्ष जी माधवन नायर ने कहा है कि हमारे मून इम्पैक्ट प्रोब ने भी चन्द्रमा की धरती पर पानी
पाया है. मून इम्पैक्ट प्रोब चन्द्रमा की धरती से टकराने के बाद भी कार्यरत था उसके द्वारा किए गए प्रयोगों से भी चन्द्रमा की धरती पर पानी होने के संकेत मिले थे.
कैसा है पानी का स्वरूप?
यह मानना कि चन्द्रमा पर नदी या तालाब होंगे गलत है.
वहाँ पानी का स्वरूप अलग है.
दरअसल चन्द्रमा की सतह पर पानी जमा हुआ है और वह भी हाईड्रोजन और ऑक्सिजन के एक-एक अणुओं से बना है. सामान्य पानी हाईड्रोजन के दो और ऑक्सीजन के एक अणु से बनता है.
नायर के अनुसार चाँद पर स्थित चट्टानों से पानी निकाला जा सकता है लेकिन एक टन मिट्टी से कोई आधा लीटर पानी ही मिल सकता है.
कैसे बना यह पानी?
वैज्ञानिकों का मानना है कि चन्द्रमा पर इस समय जिस तरह का पानी मौजूद है वह नाभिकीय विखंडन के परिणामस्वरूप ही बना होगा. चंद्रमा
पर चट्टानों और मिट्टी में मौजूद आक्सीजन का सूर्य
द्वारा उत्सर्जित हाइड्रोजन के सयोंजन हुआ होगा और इस अंत:क्रिया से पानी बना होगा.
एम-3 वैज्ञानिक टीम की सदस्य लैरी टेलर के अनुसार सूर्य द्वारा उत्सर्जित हाईड्रोजन के प्रोटोन चंद्रमा से टकराते हैं और उसकी मिट्टी में मौजूद आक्सीजन को अन्य तत्वों से अलग कर देते हैं. इस तरह से ऑक्सीजन और हाईड्रोजन का सयोंजन होता है और पानी तैयार होता है.
आगे की राह!
इंसान की रूचि चन्द्रमा पर हमेशा से रही है. लेकिन विगत कुछ वर्षों से चन्द्रमा पर खोज अभियान भेजने का सिलसिला रूक गया था. जब भारत ने चन्द्र अभियान भेजने की बात की तो कई विशेषज्ञों की राय थी कि इस मिशन पर पैसा लगाना व्यर्थ है और भारत वही दोहरा रहा है जो बरसों पहले नासा और अन्य देशों के मिशन कर चुके हैं.
लेकिन अब यह सिद्ध हो गया है कि चन्द्रयान मिशन विफल नहीं है. चन्द्रयान के माध्यम से एक बहुत बड़ी खोज सामने आई है और इसके लिए नासा के एम3 यंत्र के साथ भारत के अपने एम.आई.पी. यानी मून इम्पैक्ट प्रोब के योगदान को भी नहीं भूलना चाहिए.
इससे आगे अब इंसान चन्द्रमा पर प्रक्षेपण तंत्र स्थापित करने की सोचेगा और भविष्य में वहाँ इंसानों के लिए लम्बे समय तक रूक कर प्रयोग और संशोधन करने का मार्ग भी खुल सकता है.