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| ओरांगउटान ऐसा इसलिए कर पाते हैं क्योंकि उन्होनें उत्क्रांति के दौर में एक नई कला सीख ली है
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सुमात्रा के घने जंगलों में निवास करने वाले ओरांगउटान अब विलुप्त होने की कगार पर हैं. दुनिया भर के कई संस्थान इस प्राणी का अभ्यास करने के लिए यहाँ आते रहते हैं. ऐसे ही एक संस्थान बायोमेडिकल साइंसेज़ जो कि यूनिवर्सिटी ऑफ लीवरपूल का एक हिस्सा है के रोबिन क्रोम्पटन ने अपने अभ्यास के दौरान यह पता लगाने की कोशिश की कि ओरांगउटान जैसा भारी प्राणी ऊँचे पेड़ों की नाजुक टहनियों पर मजे से कैसे चल लेता है, जबकि इस नस्ल के छोटे प्राणी जैसे कि बंदर ऐसा नहीं कर पाते!
रोबिन क्रोम्पटन ने अपने अभ्यास में पाया कि ओरांगउटान ऐसा इसलिए कर पाते हैं क्योंकि उन्होनें उत्क्रांति के दौर में एक नई कला सीख ली है और वह है अनियमित तरीके से चलना. यही वह तकनीक है जो लंडन के मिलिनियम ब्रिज को टिकाए रखती है. इस पूल के साथ समस्या यह है कि यह हिलती बहुत है. पहले इस पूल पर पैदल चलने वाले लोग एक ही लय मे एक ही दिशा में चलते थे, इससे इस पूल का डोलना और भी तेज हो जाता था. लेकिन बाद में इंजीनियरों ने पैदल मार्ग में बदलाव कर इस समस्या को सुलझा दिया.
ओरांगउटान भी यही करते हैं. रोबिन ने अपने अभ्यास में पाया कि ऊँचे वृक्षों की आपस में मिली हुई कमजोर टहनियों पर चलने के लिए ओरांगउटान कभी चार पाँवो पर चलते हैं, कभी लटक जाते हैं, कभी दो पाँवों पर खड़े हो जाते हैं, कभी झूल जाते हैं तो कभी पेड़ों के साथ झुक कर चलते हैं.
मतलब यह कि वे कभी चलने के लिए एक ही तरीका नहीं अपनाते और स्थिति के अनुसार बदलाव करते रहते हैं. इससे उनका वजन अन्य टहनियों पर वितरित हो जाता है और वे संतुलन नहीं खोते.
अन्य बंदर ऐसा नहीं करते और एक ही तरीके से चलने की या एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर जाने की कोशिश करते हैं और इस दौरान कई बार चोटिल हो जाते हैं.
अपनी इस खूबी के बावजूद ओरांगउटान अपने अस्तित्व को बचाए रखने में असफल हो रहे हैं.