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| इस तरह के कचरे से बगीचों की बेंचें, ओर्गेनिक मिट्टी, बगीचों के लिए इस्तेमाल की जाने वाली मिट्टी, खाद आदि बनाई जा सकती है
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प्रतिदिन लाखों करोड़ों टन कचरा यूँ ही फेंक दिया जाता है. बिजली सयंत्रों, खानों और महानगरपालिकाओं के द्वारा प्रतिदिन इतना कचरा निष्कासित किया जाता है जिसका यदि ढंग से इस्तेमाल किया जाए तो उससे उर्वरक बनाया जा सकता है तथा अन्य कई ऐसे पदार्थ बनाए जा सकते हैं जिसका योग्य विपणन किया जाए तो उससे ना केवल शहर की सुंदरता बढाई जा सकती है बल्कि इसे एक उद्योग का रूप देकर कमाई भी की जा सकती है.
यह राह दिखाई है है को-ओपरेटिव रिसर्च सेंटर के प्रोफेसर रिचर्ड हाइंस ने. रिचर्ड का लक्ष्य है औद्योगिक और म्यूनिसिपल कचरे का इस्तेमाल कर पर्यावरण अनुरूप पदार्थ बनाना जिसे बाजार में बेचा जा सके.
रिचर्ड का कहना है कि ऑस्ट्रेलिया में आज कोयले की खानों से 13 मिलियन टन राख पैदा होती है, शहरी इलाकों की गटर व्यवस्था, पार्क, खाद्यान्न आदि से लाखों टन बायो-सोलिड प्राप्त होते हैं. इस कचरे का यदि रचनात्मक तरीके से मिश्रण किया जाए तो ऐसे उत्पाद बनाए जा सकते हैं जो खाद की तरह काम दें, टोक्सिक मात्रा कम करने में मदद कर सकें और बाग-बगीचों की सुंदरता बढा सकें.
रिचर्ड का मानना है कि इस तरह के कचरे से बगीचों की बेंचें, ओर्गेनिक मिट्टी, बगीचों के लिए इस्तेमाल की जाने वाली मिट्टी, खाद आदि बनाई जा सकती है.
दो अलग अलग तरह के कचरे का मिश्रण किस तरह से उपयोगी साबित हो सकता है इसका उदाहरण देते हुए उन्होने कहा कि यदि हरित कचरे के अंदर 20% राख मिला दी जाए तो उसकी पानी सोखने की क्षमता बढ जाती है. इससे विशेष मिट्टी तैयार की जा सकती है जो शहरी वर्ग के लोगों के काम आए. ये लोग इस मिट्टी का उपयोग अपने बगीचों में कर सकते हैं. यह मिट्टी पानी सोखने की असाधारण क्षमता रखती है जिससे इन्हें बार बार पानी देने की आवश्यकता नहीं रहती.
रिचर्ड के उपाय शहरों द्वारा उत्सर्जित कचरे का रचनात्मक उपयोग किए जाने का रास्ता दिखाता है. जरूरत यह है कि सभी एजेंसियाँ इसके लिए एकीकृत प्रयास करने का प्रयत्न करे.