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विषमताओं के बावजूद विजयी
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भारतीय राजनीति और चुनावी प्रणाली ऐसी है कि चुनाव के बाद परिणामों की कल्पना करना लगभग असम्भव सा होता है. एग्ज़िट पोल चाहे कुछ कहें लेकिन जब ईवीएम से पर्चियाँ निकलनी शुरू होती है तब परिदृश्य अमुमन अपेक्षाओं के विपरित उभरता है.
महाराष्ट्र, हरियाणा और अरूणाचल प्रदेश के चुनावी नतीजे भी कुछ ऐसे ही हैं:
महाराष्ट्र:
इसे अशोक चव्हाण के नसीब की बलिहारी कहें या विलासराव देशमुख का “सबसे लकी” दिन, लेकिन कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन लगातार तीसरी बार बहुमत पा चुका है. आश्चर्य की बात यह है कि पिछले 10 सालों में गिनाने लायक एक भी बड़ी उपलब्धि हासिल ना किए जाने के बावजूद इस गठबंधन ने जीत हासिल कर ली. एक तरह से देखा जाए तो यह यूपीए की जीत ना होकर भगवा खेमे की हार है. भाजपा-शिवसेना अपने आपको मजबूत विपक्ष के रूप में तथा भविष्य की सरकार के रूप में पेश नहीं कर पाई. महाराष्ट्र में बिजली, पानी की समस्या विकट है. जो राज्य कभी निवेश के मामले में अग्रणी हुआ करता था वह अब कहीं नहीं है. लेकिन फिर भी जनता ने उसी सरकार को वोट दिया.
राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने भी वर्तमान यूति की जीत में महत्वपूर्ण योगदान निभाया. 13 सीटें जीतकर, तथा कई सीटों पर द्वितीय स्थान पर रहकर यह पार्टी भगवा खेमे के लिए एक बार फिर वोट कटाऊ पार्टी साबित हुई. यदि मनसे नहीं होती तो स्थिति एकदम अलग होती. 31 सीटों वाली मुम्बई में मनसे की बढ रही ताकत ना केवल भाजपा-शिवसेना बल्कि कांग्रेस-एनसीपी के लिए भी चुनौती साबित हो रही है.
यह सच है कि शिवसेना अपना आधार खोती जा रही है. इस चुनाव के नतीजे दर्शाते हैं कि यह पार्टी अब चौथे स्थान पर खिसक गई है. उससे अधिक सीटें कांग्रेस, एनसीपी तथा भाजपा ने जीती हैं [भाजपा ने शिवसेना के मुकाबले कम सीटों पर चुनाव लड़कर अधिक सीटें जीतीं].
इन तीन पार्टियों में से दो तो राष्ट्रीय पार्टियाँ हैं तथा एनसीपी का भी महाराष्ट्र के बाहर अस्तित्व है. परंतु शिवसेना अपने आपको एक क्षैत्र से आगे बढा नहीं पाई और अब वह क्षैत्र भी सिकुड़ रहा है. साफ तौर पर दिख रहा है कि बालासाहब का जादू अब नहीं चल रहा और कोई और उनकी गद्दी हथियाने जा रहा है. बालासाहब का दुर्भाग्य कि वह उनका बेटा नहीं है. बाल ठाकरे अब समझ रहे हैं कि उनकी पार्टी युवाओं के बीच लोकप्रिय नहीं है.
चुनाव में जीत हासिल होते ही पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने अपनी उपलब्धियाँ गिनवानी शुरू कर दी. वे अपने 4 साल के शासन को इस जीत के लिए जिम्मेदार मानते हैं, वहीं अशोक चव्हाण जीत का श्रेय तो टीमवर्क को देते हैं लेकिन खुद को कप्तान बताने से भी नहीं चुकते. जाहिर है, अब मुख्यमंत्री पद की दौड़ तेज होने वाली है और कांग्रेसी दिग्गज गांधी परिवार के आगे नतमस्तक होकर चाटुकारिता की हदें पार कर देंगे.
इस चुनाव में एनसीपी को जीवनदान मिल गया है. यह चुनाव उनके लिए करो या मरो की स्थिति था, परंतु शरद पवार के लिए राहत की बात है कि उनकी पार्टी अभी तक टीकी हुई है और प्रदेश में मजबूत भी है.
भाजपा के लिए एक तरफ कुँआ दूसरी तरफ खाई है. वह ना तो शिवसेना को छोड़ पा रही है ना ही साथ रख पा रही है. शिवसेना के साथ रहकर उसे कोई खास फायदा भी नहीं हो रहा. भाजपा के साथ दिक्कत यह है कि वह अपने किसी नेता को “प्रोजेक्ट” नहीं कर पाई. विपक्षी पार्टी के रूप में उसकी भूमिका ढुलमुल रही और इसका खामियाजा यह कि लगातार दूसरी बार बेहतर स्थिति में होने के बावजूद वह हार गई.
हरियाणा:
भजनलाल खुश हो सकते हैं कि 6 विधायकों के साथ अब वे किंगमेकर बन सकते हैं. कुलदीप बिश्नोई “उपमुख्यमंत्री” का सपना पाल रहे हैं और मुख्यमंत्री हुड्डा की नींद अब शायद उड़ चुकी है. उनकी सारी गणनाएँ गलत साबित हुई और वे अपनी पार्टी को बहुमत नहीं दिला पाए. 90 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस 40 सीटें पाकर सबसे बड़ी पार्टी तो बन गई लेकिन बहुमत से दूर रही. कांग्रेस ने पिछले चुनाव की अपेक्षा काफी खराब प्रदर्शन किया और अब हुड्डा यदि अपनी कुर्सी बचा ले जाते हैं तो उनके लिए यह बड़ी कामयाबी होगी, क्योंकि आलाकमान की वक्रदृष्टि उन पर हो चुकी है.
इनेलोद 31 सीटें हासिल कर बड़ी ताकत बनकर उभरा है, और अब शायद भाजपा को पछतावा हो रहा हो कि उसने इस पार्टी के साथ गठबंधन नहीं किया नहीं तो स्थिति और भी बेहतर होती और शायद कांग्रेस फिर से सत्ता में आने की कगार पर नहीं होती.
अरूणाचल:
अरूणाचल में कांग्रेस की जीत अपेक्षित ही थी. यह सीमावर्ती राज्य वैसे भी हमेशा से उसी पार्टी का समर्थन करता आया है जो केन्द्र में हो. यह उसके लिए अच्छा भी है. अरूणाचल में विपक्षी पार्टियों की मौजूदगी नगण्य है. इसलिए कांग्रेस की भारी भरकम जीत उम्मीद के अनुसार ही है.