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| चूक कहाँ हुई?
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नासा के LCROSS मून मिशन ने काफी चर्चाएँ जगाई थी. इस मिशन के तहत नासा ने एक रॉकेट के जरिए चन्द्रमा पर विस्फोट कर उसकी सतह के टुकड़ों को हवा में उछाला था. नासा का उद्देश्य इन टुकड़ों में पानी की खोज करना था.
LCROSS से दो टन का सेंटोर रॉकेट चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव से टकराया था इस भीड़ंत से सतह के टुकड़े उछले भी थे. वैज्ञानिकों को उम्मीद थी कि जो धूल और वाष्प निकलेगा वह इतनी ऊँचाई तक पहुँच जाएगा की सूर्य किरणों की जद में आ जाए. इसके बाद रॉकेट के पीछे चल रहे सैटेलाइट तथा अन्य संसाधनों की मदद से उन टुकड़ों की जाँच की जानी थी. पृथ्वी पर स्थित कई टेलिस्कोप और हब्बल स्पेस टेलिस्कोप भी इस काम में लगाए गए थे. लेकिन परिणाम अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं निकला.
न्यू साइंटिस्ट में छपी खबर को आधार मानें तो यह मिशन लगभग फ्लोप ही रहा. परंतु इसकी अधिक चर्चा नहीं हुई.
चूक कहाँ हुई?
नासा के वैज्ञानिकों की गणानाएँ और अनुमान गलत साबित हुए. LCROSS टीम के सदस्यों ने इस मिशन से पहले एक मॉडल बनाकर उस पर परिक्षण किया था. उनका मानना थ कि चन्द्रमा पर रॉकेट टकराने से जो मलबा उछलेगा वह 45 डिग्री के कोण पर उछाल भरेगा. लेकिन वास्तव में ऐसा हुआ नहीं. वास्तविक टक्कर के बाद जो मलबा सबसे तेजी से उछला उसने भी 30 डिग्री का कोण ही प्राप्त किया.
इसके अलावा नासा से जो एक और चूक हुई वह यह कि उसके वैज्ञानिक यह अनुमान लगाने में विफल रहे कि इस टकराव के बाद कितना मलबा निकलेगा. न्यू साइंटिस्ट के अनुसार रॉकेट के टकराने के बाद उछला मलबा काफी कम था और इससे अधिक नतीजे प्राप्त नहीं हो सकते थे.
टेक्सास के ल्यूनर एंड प्लेनेटरी इंस्टिट्यूट के पॉल स्पडिस का कहना है कि मलबे में पानी की मौजूदगी का पता चल जाने पर भी इससे यह पता नहीं चलता कि चन्द्रमा की सतह पर बर्फ की मात्रा कितनी है. इससे साबित होता है कि इस प्रोजेक्ट का जो मूल उद्देश्य था उसे हासिल कर पाने में नासा नाकामयाब रहा.