श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के पच्चीस वर्ष बाद भारत के सफलतम और सवार्धिक विवादास्पद प्रधानमंत्री का मूल्यांकन करना निश्चय ही कोई सरल विषय नहीं है.
उनकी निर्मम हत्या और तत्पश्चात घटित निंदनीय घटनाक्रम (उन्हीं की पार्टी के गुंडों द्वारा प्रायोजित घृणित सिख-विरोधी दंगे) श्रीमती गांधी की राजनीतिक विरासत के संतुलित मूल्यांकन के कार्य को कुछ विषम ज़रूर बनाता है.
श्रीमती इंदिरा गांधी के तीन स्वरूपों का प्रमुखता से उल्लेख किया जा सकता है. भारत की सर्वाधिक सफल प्रधानमंत्री, सर्वाधिक विवादास्पद प्रधानमंत्री या सर्वाधिक एकाधिकारवादी शासक के रूप में.
पूर्ण ईमानदारी बरतें तो यही मानना होगा कि श्रीमती इंदिरा गांधी इन तीनों ही गुणों (अवगुण) से संपन्न थीं, यद्यपि विधि का आभार मानें तो एक साथ उनके ये तीनों गुण (या अवगुण) ना प्रकट हुए ना ही क्रियाशील.
राज्यारोहण
श्रीमती इंदिरा गांधी के कार्यकाल के विश्लेषण हेतु उन परिस्थितियों पर नज़र डालना ज़रूरी है जिनमें उनका राज्यारोहण हुआ था. भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के आकस्मिक निधन के बाद राजगद्दी सम्हालने वाली श्रीमती गांधी को अपने ही पक्ष कांग्रेस के भीतर के कुछ विरोधी तत्वों से एक घोर संग्राम करना पड़ा.
सिंडिकेट के नाम से (कु) प्रसिद्ध नेतागण यह घोषित कर चुके थे कि “नेहरू जी की बेटी भले ही सत्ता भोगे, राज हम ही करेंगे.’’
कांग्रेस का ऊंट कौन सा करवट लेगा ये निर्धारित करने के लिए चले संघर्ष में श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपने राजनीतिक जीवन के पहले ही चरण में भरपूर एकाधिकारवादी प्रवृत्तियों को दर्शाया.
1969 में कांग्रेस का विभाजन हुआ, सिंडीकेट गुट की हार हुई और एक व्यक्ति की कांग्रेस का जन्म हुआ.
“नेहरू-गांधी परिवार का कांग्रेस’’ का सिलसिला आज भी जारी है. फलस्वरूप, रूस-चीन परस्त नेहरू कांग्रेस को, उनकी बेटी ने अधिकृत रूप से वामपक्ष गामी पार्टी बना दिया.
इसमें एक चतुराई यह भी थी कि श्रीमती गांधी ने राजनैतिक रणांगण से साम्यवादियों को निकाल बाहर भी कर दिया.
गूंगी गुड़िया से डिक्टेटर
बैंकों के राष्ट्रीयकरण द्वारा उन्होंने जहां एक ओर वामदलों का मुद्दा चुरा लिया, वहीं दूसरी ओर स्वतंत्र पार्टी तथा भारतीय जनसंघ को धनाढ्य और व्यापारिक हितचिंतकों की पार्टी बताकर बदनाम किया.
परिणामत: एक दृष्टि से भारत की राजनीति की गूंगी गुड़िया ने “डिक्टेटरशिप” का पहला चस्का लिया, जिसने अपना विकसित रूप 1975 में दिखाया. निरंकुश कांग्रेस और निरस्थ विरोधी दल देश के लिए घातक साबित हुआ और आज भी वह स्थिति कायम है.
श्रीमती गांधी प्रणित वामपंथी नीतियों को सौभाग्य से कांग्रेस ने 1993 के आसपास तिलांजलि दे दी, भले ही अंतरराष्ट्रीय दबावों के वशीभूत होकर. लेकिन इन आत्मघाती नीतियों से हम बहुत कुछ खो बैठे थे.
स्वाभाविक ही, श्रीमती गांधी के एकाधिकारवादी दास्तां की शुरूआत यहां थमी नहीं बल्कि 1974-75 में और भी खुलकर सामने आई.
पहले तो उन्होंने देश की न्यायपालिका द्वारा अपने चुनाव को अवैध ठहराए जाने पर न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करने के बजाए सीधे-सीधे टकराव का रास्ता अपनाया. उसके बाद देश और दुनिया ने श्रीमती गांधी का वह तानाशाही रूप देखा जिसका दर्शन किसी भारतीय राजनैतिक नेता ने पहले कभी प्रदर्शित नहीं किया था.
आपातकाल
1975 की आपातकाल की घोषणा भारत के हज़ारों वर्षों के इतिहास और भारतीय मानस पर ही मानों एक आघात था. लोकतंत्र के दमन के इस प्रयास को देश के जन-मानस ने नापसंद किया और मौक़ा मिलते ही 1977 में उस तानाशाह के मंसूबों को अस्वीकार किया. 1977 में देश की जनता ने श्रीमती गांधी की सत्ता ही नहीं बल्कि उनके नैतिक अधिकार को भी जिस प्रकार खंडित कर दिया कोई भी ईमानदार विश्लेषक मानेगा कि श्रीमती गांधी उससे कभी उबर नहीं पाईं, ना ही उनका आभामंडल उन्हें पुन: प्राप्त हो सका.
हालांकि 1980 में विकल्प रहित जनता के विवश वोटों से वो फिर सत्तारूढ़ हुईं. श्रीमती गांधी पहले की इंदिरा जी कभी ना बन पाईं और एक के बाद एक गलतियों का दुखद सिलसिला चल पड़ा, जिनका समापन उनके त्रासद अवसान के साथ ही हुआ.
किंतु आपातकाल और अन्य अनेकानेक घटनाओं के आधार पर श्रीमती गांधी को एक उपलब्धिशून्य नेता के रूप में ख़ारिज करना उनकी स्मृतियों के प्रति अन्याय होगा. अधिनायकवादी और विवादास्पद वे भले रही हों, उनकी राष्ट्रनिष्ठा की अनदेखी नहीं की जा सकती है.
संभवत: उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है 1971 का युद्ध जिसमें पाकिस्तान की न
सिर्फ़ पराजय हुई, बल्कि विभाजन भी और बांग्लादेश को मुक्ति भी मिली.
श्रीमती गांधी की दृढ़ता, विश्व शक्तियों के सामने न झुकने की नीतिमत्ता
और समयानुकूल निर्णय क्षमता ने स्वतंत्र भारत को एक नया गौरवपूर्ण क्षण
दिलवाया.
पाकिस्तान का खंडित होना और
बांग्लादेश का निर्माण होना, वास्तव में ‘द्विराष्ट्र सिद्धांत’ के ताबूत
में एक नुकीला कील था. अपने जीवन के अंतकाल में श्रीमती गांधी को 1971 की
दृढ़ता फिर एक बार दिखानी पड़ी थी, जब उन्होंने खालिस्तानी अलगाववाद की
कमर तोड़ दी.
जहां पाकिस्तान को उनके पिता
की राजनीतिक परंपरा की कुत्सित विरासत कहा जा सकता है, वहीं खालिस्तान का
नासूर उन्हीं का पैदा किया हुआ था. 1971 का मनोबल-वर्धक सामरिक और
कूटनैतिक विजय और 1974 का परमाणु परीक्षण जिसने भारत को एक परमाणु शक्ति
बनाकर विश्व में सम्मानप्रद स्थान दिलवाया, श्रीमती गांधी के दूरदर्शी
राजनीति की परिचय दिलाता है.
क्या आज भारत को श्रीमती इंदिरा गांधी जैसे सशक्त नेता की आवश्यकता है?
सर्वत्र
व्याप्त अनुशासनहीनता और दुर्दशा को देखते हुए अनेक लोग इस प्रश्न का
उत्तर हां में देना चाहेंगे. किन्तु हैरानी की बात है कि जिस राजनीतिक दल
का उन्होंने पालन-पोषण किया, अर्थात कांग्रेस, वही आज उनके नाम को लेकर
आश्चर्यजनक मौन साधे हुए है.
इसका शायद कारण
यही है कि आज की कांग्रेस में (और अन्य दलों में भी?) स्वर्गीय इंदिरा
गांधी का राजनैतिक-कौशल और नेतृत्व क्षमता का तिल भर भी परिचय रखने वाला
कोई व्यक्ति नहीं है. भले ही कोई कितना दावा या अभिनय करें.
अपने
जीवन काल में श्रीमती इंदिरा गांधी अपनी पार्टी पर अपरने परिवार को थोपने
का मोह न छोड़ सकीं. यदि वह ऐसा कर पाती तो शायद एक बेहतर कांग्रेस और देश
विरासत में छोड़ जातीं. आश्चर्य नहीं कि आज उनकी अपनी पार्टी में लोग
‘इंदिरा अम्मा’ का नाम दबे स्वरों में ही लेते हैं. ज़रा याद कीजिए
कांग्रेस ने इंदिरा गांधी का चित्र चुनावी पोस्टरों में आख़िरी बार कब
किया. याद आए तो ज़रूर बताइएगा.
(लेखक
प्रसिद्ध स्तंभकार, आर्थिक और अंतरराष्ट्रीय विषयों के टिप्पणीकार हैं और
भारतीय जनता पार्टी के कार्यकारी परिषद के सदस्य हैं)
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