आज के इंटरनेट युग ने दुनिया छोटी कर दी है और दुरियाँ मिटा दी है. नई नई तकनीकों ने सुदूर देशों में बैठे दो दोस्तों को इतना करीब ला दिया है कि भौगोलिक दूरी अर्थहीन रह गई है.
सोश्यल नेटवर्किंग साइटों जैसे कि
ट्विटर ,
फेसबुक ,
मायस्पेस और
ओर्कुट ने इस दूरी को पाटने में महत्वपूर्ण पात्र निभाया है. इन साइटों के अनगिनत फायदे हैं, परंतु क्या इन साइटों की वजह से बच्चों पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है.
एक सर्वे के नतीजों पर नज़र डालें तो पता चलता है कि 12 से 17 वर्ष आयु के 60% बच्चों और किशोरों की ओनलाइन प्रोफाइल है और वे सोश्यल नेटवर्किंग साइटों के माध्यम से अपने दोस्तों से जुड़े रहते हैं. 42% बच्चों ने माना कि वे प्रतिदिन फेसबुक या ओर्कुट जैसी सोश्यल नेटवर्किंग साइटों का उपयोग करते हैं.
फेसबुक और मायस्पेस में पंजीकरण करने के लिए 13 वर्ष या अधिक आयु आवश्यक होती है, परंतु जाँचने का कोई सटीक माध्यम ना होने से कोई भी बालक गलत विवरण देकर आसानी से अकाउंट खोल सकता है.
और तो और अब बच्चों के लिए विशेष सोश्यल नेटवर्किंग साइटे भी बन रही है.
KidSwirl.com ऐसी ही एक साइट है जो फेसबुक की तर्ज पर बनी है.
इस साइट को बनाने वाले टोबी क्लार्क बच्चों पर सेंसरशीप लादने का विरोध करते हैं. उनके अनुसार - आज का जमाना तकनीक आधारित है. आज बंदिशें नहीं चलेगी. बस आपको अपने बच्चों का सही मार्गदर्शन करना होगा.
स्वयं टोबी के दो बच्चे [उम्र 9 और 6 साल] उनकी साइट [KidSwirl.com] का इस्तेमाल करते हैं. टोबी कहते हैं वे अपने बच्चों को सोश्यल नेटवर्किंग करने से नहीं रोकते, बस समय का ध्यान रखते हैं.
बच्चों द्वारा सोश्यल नेटवर्किंग साइटों के इस्तेमाल का विरोध करने वाले संशोधकों का कहना है कि बच्चें चुँकि अपरिपक्व होते हैं इसलिए वे अपनी तथा अपने परिवार की गोपनियता को आसानी से जाहिर कर देते हैं. इससे असुरक्षा बढ जाती है. दूसरी तरफ बच्चे एक ऐसे संसार में जीने के आदि हो जाते हैं जहाँ मौखिक बातचीत नहीं होती बल्कि सबकुछ वर्चुअल होता है.
लेकिन कई संशोधक बच्चों के द्वारा सोश्यल नेटवर्किंग किए जाने से सहमत हैं. उनकी दलील है कि इससे बच्चे आपस में मेलजोल रखना सीखते हैं तथा इनसे उनका दिमागी विकास होता है.