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जेल: समीक्षा - एक और सार्थक प्रयास |
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समीक्षा
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शनिवार , , 07 नवम्बर |
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3.5/5
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भयावह सच्चाई
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मधुर भंडारकर यथार्थवादी फिल्में बनाने के लिए जाने जाते हैं. उन्होनें फैशन जगत से लेकर हाई सोसाइटी, कोर्पोरेट जगत और बार गर्ल्स के ऊपर फिल्में बनाई है. अब नया विषय है जेल.
मधुर ने जेल की हकीकत को बखुबी पर्दे पर उतारा है. मधुर की जेल अंदर तक खौफ पैदा करती है.
कहानी
फिल्म की कहानी है पराग दीक्षित (नील नितिन मुकेश) की, जो मानता है कि वह बहुत भाग्यशाली है.
पराग की जिंदगी में सबकुछ है. उसके पास अच्छा काम और एक अच्छी गर्लफ्रेंड मानसी (मुग्धा गोडसे) भी है.
लेकिन एक दिन कुछ ऐसा घटित होता है कि पराग गिरफ्तार हो जाता है और जल्द ही अपने आपको जेल में कैद पाता है.
यहाँ उसको जिंदगी की एक और सच्चाई का पता चलता है. पुलिस की पिटाई, कैदियों की लड़ाई, वर्चस्व, धोखेबाजी.. इन सब से पराग टूटने लगता है. पराग को केवल एक उम्मीद जीवित रखती है कि एक दिन वह "जेल" से छूट जाएगा.
क्यों देखें:
इस फिल्म के माध्यम से मधुर भंडारकर ने जेल के भीतर की भयावह सच्चाई को उजागर किया है. नील मुकेश का चेहरा मोहरा आम मध्यम वर्गीय युवा का नहीं है लेकिन उन्होने अपने पात्र को बखूबी निभाया है. नवाब के पात्र में मनोज वाजपेयी प्रभावित कर जाते हैं. छायांकन और निर्देशक काफी अच्छा है.
क्यों ना देखें:
मुग्धा गोड़से का पात्र अधिक प्रभावित नहीं करता. नील भी भावुक दृश्यों में नही जमते.
अंत में:
यदि आप जानना चाहते हैं कि जेल के अंदर की अंधेरी दुनिया आखिर कैसी होती है तो यह फिल्म जरूर देखिए.
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