घने जंगल में चींटियाँ जहाँ घर बनाती है उन पेड़ों को चींटी-वृक्ष या Myrmecophytes कहा जाता है. इन विशेष पेड़ों की टहनियों और जड़ों में सुरंगनुमा छेद होते हैं जहाँ चीटियाँ अपना घर बना लेती है.
संशोधकों का अब तक यह मानना होता था कि चींटियाँ केवल इसी प्रकार के वृक्षों में अपना घर बनाती है और चींटियों और इन वृक्षों के बीच एक विशिष्ट संबंध होता है. यह संबंध कुछ लो-कुछ पाओ के सिद्धांत पर काम करता है. यानी कि एक और चींटियों को जहाँ रहने के लिए घर मिलता है, वहीं चींटियों की जिम्मेदारी होती है कि वे वृक्षों को अन्य कीट पतंगों से सुरक्षित रखे. चींटियाँ अपने घर की सुरक्षा बखुबी करती हैं और आसपास मंडराने वाले कीट पतंगो पर हमला कर उन्हें मार देती है.
यही नहीं अपने घर बने वृक्ष के आसपास उगने वाले अन्य पौधे भी चींटियों के कोप का शिकार होते हैं. चींटियाँ इन्हें भी नष्ट कर देती है ताकी वे जमीन में से प्राप्त सारा पोषण और पानी स्वयं ना हड़प कर जाएँ.
यह व्याख्या सैद्धांतिक रूप से स्वीकार की गई है, लेकिन इस व्याख्या को भी तब झटका लगा जब पेरू के घने जंगलों में रहने वाले स्थानीय लोगों ने पाउलो विश्वविद्यालय के ग्लैन शेफर्ड और ईस्ट एंजलिया विश्वविद्यालय के डगलस यू को एक अलग ही कहानी सुनाई.
इन स्थानीय लोगों ने इस टीम को कुछ ऐसे पेड़ों के बारे में जानकारी दी जो चींटी-पेड़ नहीं हैं, यानी कि उनमें प्राकृतिक छेद नहीं होते. इन पेड़ों में भी चींटियों ने अपने लिए सुरंगे बना ली थी और वे यहाँ रहती थी.
पूरे जंगल में खोज करने पर यह बात सामने आई कि इस तरह के पेडों की संख्या काफी अधिक है. इस नई खोज के डार्विन के एक मंतव्य को झटका लगा है.
डार्विन ने कहा था कि कुछ पेड़ों में प्राकृतिक रूप से छेड होते हैं तथा वे चींटियों के लिए घर का काम करते हैं. उन्होनें चींटी और पेड़ के बीच एक अनोखा संबंध होने की बात कही थी. लेकिन रिचर्ड स्प्रश नामक प्रकृतिशाष्त्री ऐसा नहीं मानते. उनका मत है कि चींटियाँ भी आम कीट ही है और पेड़ों को उनसे भी उतना ही खतरा होता है. चींटियों को यदि अपेक्षाकृत घर ना मिले तो वे उन पेड़ों पर भी हमला कर सकती है जो प्राकृतिक रूप से उनका घर ना बन सकते हों.