झूठ पकड़ने वाली मशीन तो अभी उपयोग में है, लेकिन अब एक नई तकनीक पर काम चल रहा है, जिससे उस इंसान की पहचान हो पाएगी जो डर रहा हो.
इस तकनीक के विकसित हो जाने के बाद भीड़भाड़ वाली जगहों पर भी अपराधियों, ड्रग माफियाओं या आतंकवादियों की पहचान हो पाएगी.
लंडन की सीटी यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक इस तकनीक को विकसित कर रहे हैं और उनका इरादा अगले दो तीन साल में पहला प्रोटोटाइप बना लेने का है.
कैसे काम करती है यह तकनीक?
यह तकनीक एक विशेष फेरोमोन के ऊपर निर्भर रहती है. यह फेरोमोन उस समय उत्सर्जित होता है जब कोई व्यक्ति डरने लगता है. डरे हुए व्यक्ति के पसीने से एक विशेष गंध आने लगती है और यह तकनीक उसी गंध की पहचान करती है.
हम इंसानों के अंदर भी इस गंध को पहचानने की क्षमता होती है, लेकिन हमें इसका कभी आभास नहीं होता. हम किसी भी डरे हुए व्यक्ति की पहचान तुरंत कर लेते हैं और इसके लिए उस व्यक्ति के चेहरे के हाव भाव के साथ साथ उसके पसीने की गंध भी पहचान बनाने में उपयोगी सिद्ध होती है.
लेकिन भीड़ भाड़ वाली जगह पर ऐसे किसी व्यक्ति की पहचान कर पाना मुश्किल हो जाता है और यह तकनीक वहीं काम आएगी.
क्या है मुश्किलें?
अभी यह परीक्षण शुरूआती दौर में है और अभी तक पहला प्रोटोटाइप भी नहीं बना है. इसलिए कह सकते हैं कि अभी तक यह मात्र एक विचार ही है. परंतु इस विचार पर आधारित मशीन बना पाना असम्भव नहीं है.
इस राह में जो कुछ मुश्किलें जरूर हैं जैसे कि इत्र की सुगंध से शरीर की गंध को दबा देना तथा दो इंसान की गंध के बीच प्राकृतिक अंतर की पहचान कर पाना.
लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि इन चुनौतियों के बावजूद डर पकड़ने वाली मशीन का निर्माण सम्भव है.