हम मनोरंजन के लिए फिल्में देखते हैं. परिवार के साथ पारिवारिक फिल्में, पत्नी के रोमांटिक फिल्में, दिल बहलाने के लिए कॉमेडी फिल्में देखना तो समझ में आता है परंतु हम भूतिया या हॉरर फिल्में क्यों देखते हैं? डरने के लिए! लेकिन कोई डरना क्यों चाहेगा?
इस सवाल के जवाब के लिए वैज्ञानिकों ने कई तरह के अभ्यास किए हैं और उन सब अभ्यासों का लगभग एक ही निष्कर्ष निकला है और वह यह कि हम गंदे और विकृत चेहरों को देखने और डरावनी धुनों को सुनने के लिए नहीं बल्कि रोमांचित होने और अपनी भावनाओं को उभारने के लिए हॉरर फिल्में देखते हैं.
नीदरलैंड की एक विश्वविद्यालय में सामाजिक साइकोलोजी के प्रोफेसर जैफरी गोल्डस्टीन के अनुसार लोग अपने अंदर डर पैदा करने के लिए ऐसी फिल्में देखते हैं. हम हमारे लिए वही मनोरंजन चुनते हैं जो हमें अंदर से प्रभावित करे.
यह कई कारकों पर निर्भर करता है. इनमें से कुछ कारक अनुवांशिक भी हो सकते हैं और कुछ वर्तमान परिस्थितियो पर निर्भर करते हैं. शायद इसलिए कई लोगों को हॉरर फिल्मों से बिल्कुल भी डर नहीं लगता लेकिन कई लोग विशेष रूप से महिलाएँ हल्की सी चीख से भी डर जाते हैं.
वस्तुत: हमारी दिमागी सरंचना इतनी जटील है कि उसके सभी भेदों का खुल पाना लगभग असम्भव है परंतु आधुनिक तकनीकों ने स्थिति कुछ हद तक बेहतर बनाई है.
हॉरर फिल्म देख रहे लोगों के दिमाग के न्यूरोन का अध्ययन कर न्यूयार्क विश्वविद्यालय के न्यूरोसाइंटिस्ट जोसेफ लीडक्स ने पता लगाया है कि हॉरर फिल्म से उत्पन्न उत्तेजना का प्रभाव काफी गहरा होता है. उनके अनुसार – हमारा दिमाग सोचने, समझने की अद्भूत शक्ति रखता है. इसलिए हम कह सकते हैं कि डर मात्र अनुवांशिक प्रतिक्रिया नहीं है बल्कि यह व्यक्ति के इतिहास और उसके वर्तमान का मिश्रण है.
व्यक्ति के अंदर के अनुवांशिक बदलाव और वर्तमान में अनुभव की गई घटनाओं का असर उसके डर को प्रभावित करता है.
न्यूयार्क विश्वविद्यालय के न्यूरोसाइंटिस्ट जोसेफ लीडक्स ने पता लगाया है कि हॉरर फिल्म से उत्पन्न उत्तेजना का प्रभाव काफी गहरा होता है. उनके अनुसार – हमारा दिमाग सोचने, समझने की अद्भूत शक्ति रखता है. इसलिए हम कह सकते हैं कि डर मात्र अनुवांशिक प्रतिक्रिया नहीं है बल्कि यह व्यक्ति के इतिहास और उसके वर्तमान का मिश्रण है.
व्यक्ति के अंदर के अनुवांशिक बदलाव और वर्तमान में अनुभव की गई घटनाओं का असर उसके डर को प्रभावित करता है.