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लेबोरेटरी में बने “सुनहरे कानों” वाले चूहे |
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विज्ञान
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शुक्रवार , , 13 नवम्बर |
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| इस चूहे की सुनने की क्षमता जबरदस्त थी और बुढापे में भी ज्यों की त्यों बनी रही |
वैसे इन चूहों के कानों का रंग सुनहरा नहीं है. इन्हें सुनहरे कानों वाले चूहे या गोल्डर इयर माइस कहा गया है क्योंकि इन चूहों की सुनने की क्षमता जबरदस्त है और बुजुर्ग हो जाने पर भी इनकी सुनने की शक्ति वैसी ही बनी रहती है.
ये चूहे अब उस तकनीक को विकसित करने मे मददगार साबित होंगे जिसकी मदद से बुजुर्ग व्यक्ति भी युवाओं की तरह सुन सकेंगे और उनकी श्राव्य क्षमता कमजोर नहीं होगी.
एक अनुमान के अनुसार दुनिया में 5% बुजुर्गों की सुनने की क्षमता उम्र के साथ कमजोर नहीं होती. इन नए चूहों की मदद से यह जानने की कोशिश की जा रही है कि आखिर कुछ बुजुर्ग व्यक्तियों की सुनने की क्षमता ढलती उम्र में भी ज्यों की त्यों कैसे बनी रहती है?
कैसे बने ये गोल्डन कान वाले चूहे?
ये चूहे रोबर्ट फ्राइज़िना की लेबोरेटरी में तैयार किए गए. इसके लिए दो अलग अलग जाति के चूहों के बीच प्रजनन क्रिया करवाई गई. इसमें से एक जाति है रोडेंट गोल्ड चूहा. इस चूहे की सुनने की क्षमता ढलती उम्र में कमजोर हो जाती है. दूसरी जाति है C57. इस जाति के चूहे की सुनने की क्षमता कम आयु में ही कमज़ोर हो जाती है.
वैज्ञानिकों ने इन दोनों जातियों के चूहों के बीच क्रोस ब्रिडिंग की और उससे उत्पन्न नए चूहे का परीक्षण किया. इस चूहे की सुनने की क्षमता जबरदस्त थी और बुढापे में भी ज्यों की त्यों बनी रही.
अब यह चूहा उन वैज्ञानिकों के आकर्षण का केन्द्र बन चुका है जो यह जानना चाहते हैं कि आखिर वे कौन से कारक हैं जो कुछ व्यक्तियों की सुनने की क्षमता को हमेशा एक समान रखते हैं.
फ्राइज़िना को उम्मीद है कि वह दिन दूर नहीं जब इन रहस्यों पर से पर्दा उठ जाएगा.
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