| सोनपुर मेले के सुनहरे दिन ढले |
| बीबीसी हिन्दी | ||||
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मणिकांत ठाकुर
बिहार के सारण ज़िले के सोनपुर नगर में हर साल लगने वाले इस हरिहर क्षेत्र मेले में कभी लाखों की संख्या में पशुधन की ख़रीद - बिक्री हुआ करती थी. लेकिन अब वो आंकड़े कुछ हज़ार पर आकर सिमट गए हैं. सोनपुर मेले में एक तरफ गाय-बैल, हाथी- घोड़े और पालतू कुत्तों से लेकर रंग- बिरंगे पक्षियों के अलग-अलग बाज़ार. दूसरी तरफ खेती में काम आने वाले औज़ार, बीज, पौधे, बर्तन-बासन, कुर्सी-मेज़, खाट-पलंग और खिलौनों से सजी दुकानें. यानी ग्रामीण कृषक समाज की ज़रूरतों से जुड़ी तमाम चीज़ें एक साथ एक जगह उपलब्ध और वो भी एक महीने की लंबी अवधि तक. कहने के लिए भले ही यह पशु मेला हो, लेकिन सही मायने में इसे कृषि अर्थव्यवस्था से जुड़े हुए सामाजिक-सांस्कृतिक मेले की गरिमा मिली हुई थी. अतिप्राचीन मेला कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर यहाँ गंगा और गंडक नदी के संगम स्थल पर स्नान-पूजा के लिए हर साल लाखों लोगों की भीड़ जुटती रही है. पौराणिक कथा के अनुसार इसी स्थल पर हुए गज-ग्राह युद्घ में विष्णु और शिव के संयुक्त रूप वाले भगवान हरिहर ने दुष्ट घड़ियाल से निश्छल हाथी की प्राणरक्षा की थी. कहते हैं उसी समय से यह हरिहर क्षेत्र मेला आयोजित होता आ रहा है. लेकिन अब इस मेले के साथ जुड़े विश्वप्रसिद्ध, विराट, अतिप्राचीन और अदभुत जैसे भारी-भरकम विशेषण एक-एक करके दूर होते जा रहे हैं. अंग्रेजों के शासनकाल में इसे "एशिया का सबसे बड़ा पशु-मेला" नाम दिया गया था लेकिन अब वो भी अतिशयोक्ति लगने लगा है. आकर्षण घटने के कारण इस मेले का ये हाल क्यों हुआ इसके कारण अनेक हैं. इसमें राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन की रूचि घटती चली गई. इसलिए मेला-स्थल पर व्यवस्था संबंधी तमाम गड़बडियों और उपेक्षाओं ने मेले का आकर्षण कम कर दिया. सबसे बड़ी वजह बनी पशुओं की तस्करी. खासकर भारत से बांग्लादेश की तरफ गाय, बैल, भैंस और ऊँट को चोरी-छिपे बड़ी तादाद में भेजे जाने की शिकायतों के मद्देनज़र समस्या बढ़ी. इसलिए एक राज्य से दूसरे राज्य में पशुओं को लाने या ले जाने पर कई राज्य सरकारों ने प्रतिबंध लगा दिया. नतीजा ये हुआ कि व्यापारियों का इस मेले में पशुओं का लाया जाना लगातार कम होता गया. साथ ही कृषि और परिवहन सम्बन्धी यांत्रिक उपकरणों की भरमार हो जाने से भी बैल-घोड़े या ऊँट-हाथी की ज़रुरत सीमित हो गई. पशु व्यापारियों की सबसे बड़ी शिकायत ये है कि सरकारी रोक-टोक और भ्रष्टाचार के कारण अब इस मेले में किसानो को भी सही दाम में अच्छे पशु मिल पाना कठिन हो गया है. एक पशु व्यवसायी मोहम्मद रज़ा ने कहा, " रोक लगाने वाले सत्ताधारियों को ये क्यों नहीं सूझता कि हर रोज़ इस देश की सीमा से बाहर तस्करों या कसाइयों के हाथों बड़ी तादाद में गाय-बैल और ऊँट बेचे जा रहे हैं. वहाँ तो घूस दो और माल टपाओ का धंधा धड़ल्ले से होता है. लेकिन यहाँ मेले में बेचने वालों को परेशान करना सरकारी नीति है." व्यवसायियों का कहना है कि इस बार तो एक महीने तक चलने वाला ये पशु-मेला सात दिनों में हीं लगभग ख़ाली हो गया है. ये मेला सिर्फ नाच-गाने के थियेटरों और आधुनिक साज-श्रृंगार के सामान बेचने वाले मीना बाज़ारों तक सिमटता जा रहा है. निजी कंपनियों के उत्पादन और सरकारी विभागों के प्रचार वालों का शोर यहाँ बहुत बढ़ गया है. साफ़ दिखता है कि यह मेला ग्रामीण किसानों और लोकसंस्कृति से जुड़ी हुई अपनी पुरानी पहचान लगभग खो चुका है. फिर भी राज्य सरकार पिछले कई सालों से यहाँ अस्थाई पर्यटन ग्राम बसा कर सैलानियों को आकर्षित करने का प्रयास करती आ रही है.
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