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गुरुवार , , 19 नवम्बर
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भारत में पांडुलिपियों के संरक्षण का काम शुरू किया गया है, लेकिन इसकी रफ़्तार बहुत धीमी है.

विद्वानों को लगता है यदि रफ़्तार यही रही तो कहीं बहुमूल्य धरोहर खो न जाएँ.

भारत में कोई 50 लाख पांडुलिपियाँ हैं. अकेले राजस्थान में ही कोई साढ़े सात लाख पांडुलिपियाँ सूचीबद्ध की गई हैं. पांडुलिपियाँ कहीं ताड़पत्रों पर हैं तो कहीं कपड़े पर या कागज़ के टुकड़ों पर.

जयपुर में ही जैन मंदिरों में 25 हज़ार पांडुलिपियाँ हैं. इनमें से अब तक सिर्फ़ पांच हज़ार का संरक्षण हो सका है.

जयपुर में जैन विद्या संस्थान के पास ही कोई छह हज़ार पांडुलिपियाँ हैं.

इस संस्थान के निदेशक प्रोफ़ेसर कमल चंद सोगानी कहते हैं, "जब छापाख़ाना नहीं था तब इंसान के हाथों से इन पांडुलिपियों को रचा गया. लोग आज सोचते हैं कि अब छापाख़ाना आने से पांडुलिपियों का महत्व नहीं रहा."

वे कहते हैं, "अगर हमने इन्हें खो दिया तो ज्ञान का एक प्रचुर ख़ज़ाना नष्ट हो जाएगा. ये पांडुलिपियाँ ही बताती हैं कि कालिदास ने क्या लिखा था. इन में जैन, बौद्ध और हिन्दू धर्म की अमूल्य सामग्री है. लेकिन ये ख़राब हालत में हैं क्योंकि पांडुलिपियों के रखरखाव का काम ख़र्चीला है."

सहारा


राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन शुरू होने के बाद इनके संरक्षण को कुछ सहारा मिला है.

इस मिशन से जुड़ी कीर्ति श्रीवास्तव कहती हैं, "न केवल उत्तर में बल्कि दक्षिण भारत में भी पांडुलिपियों की बड़ी उपेक्षा हो रही है. हमने पांडुलिपियों को कचरे की मानिंद पड़े देखा है. लोग पैरों तले रौंदते निकल जाते हैं."

वे कहती हैं, "हमारी आज की ज्ञान की पुस्तकें इन्ही पांडुलिपियों पर ही आधारित हैं. इनमें हमारा धर्म, शास्त्र, शिक्षा सब कुछ शामिल है. अगर हम इन्हें छोड़ दें तो हमारे पास कुछ भी नहीं रहेगा. हमारी पाठ्य-पुस्तकें इन्ही पांडुलिपियों में संचित ज्ञान पर ही आधारित हैं."

कीर्ति जैन कहती हैं कि अब मिशन के ज़रिए इन ग्रंथों के बारे में चेतना पैदा हुई है.


राजस्थान में जनार्दन रॉय नागर विद्या पीठ में राजस्थानी भाषा विभाग के प्रमुख राजेंद्र बारहठ कहते हैं कि राजस्थान में पांडुलिपियों की परंपरा बहुत पुरानी है और समर्थ रही है.

वे बताते हैं, "पहले यहाँ गाँव-गाँव पोशालें चलती थीं, जो एक तरह की पाठशाला होती थीं. वहाँ पांडुलिपियाँ लिखी जाती थीं फिर इन पांडुलिपियों की प्रतियाँ तैयार की जाती थीं. जैसे कवि नरहरदास बारहठ ने पुष्कर में 'अवतार चरित' लिखा और उसकी एक सौ प्रतियाँ करवाईं. पहले पांडुलिपि की प्रतिलिपि तैयार करवाना पुण्य का काम माना जाता था. अब ऐसी परंपरा नहीं रही."


जैन विद्या संस्थान के सोमबाबू शर्मा पांडुलिपि संरक्षण से जुड़े हैं.

वे कहते है, "मैंने सर्वे में पाया कि पांडुलिपियों को बहुत ही उपेक्षित रखा जाता है, कहीं वो कचरे के ढेर में थीं तो कही बोरियों में ठूंस-ठूंस कर भरी हुई थीं, क्योंकि लोगों को इन पांडुलिपियों की महत्ता का ज्ञान नहीं है. अब जागरूकता के अभियान से फ़र्क़ पड़ा है."

राजस्थान में पांडुलिपि मिशन के संयोजक महेंद्र खड़गावत ने बीबीसी को बताया कि अब तक राज्य में साढ़े सात लाख पांडुलिपियों को सूचीबद्ध किया जा चुका है.


इन प्राचीन ग्रंथो में दर्ज ज्ञान ने इंसान की प्रगति में बहुत मदद की है, लेकिन अब इन ग्रंथों को तो ख़ुद मदद की ज़रूरत आ पड़ी है.

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