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रक्षक जब भक्षक बन जाए
मेरे विचार
सोमवार , , 30 नवम्बर
मेरे विचार
manojkumar.jpg मनोज सिंह



क्या आपने कभी साक्षात्‌ ईश्वर के दर्शन किए हैं? अगर नहीं तो पूछना चाहूंगा, क्या कभी आप गंभीर रूप से बीमार पड़े हैं? भगवान न करे आपकी तबीयत कभी खराब हो, लेकिन अगर सवाल का जवाब हां है तो उस पल को याद करने की कोशिश कीजिए जब आप, स्ट्रेचर पर लेटे हुए या व्हीलचेयर पर बैठकर या किसी दोस्त-रिश्तेदार के कंधे का सहारा लेकर, डाक्टर को दिखाने गए थे। उस वक्त डाक्टर किसी मसीहा से कम नहीं लगा होगा। डाक्टर साहब बचा लीजिए, इस तरह के भाव पैदा हुए होंगे। हो सकता है हाथ जोड़कर प्रार्थना की हो या फिर अश्रुपूर्ण नेत्रों से अपने दर्द को बयान किया हो। इस वक्त डाक्टर अनायास ही हमारे लिये पूजनीय हो जाता है। यही कारण है जो अस्पताल जाने वाला मरीज अमूमन डाक्टर से आदर व सम्मान के साथ मिलता है और दयाभाव व प्रेम की उम्मीद करता है। दवा या दुआ के अतिरिक्त मरणासन्न अवस्था में कोई और रास्ता भी नहीं होता। आप बड़े से बड़े तीसमार-खां हो मगर डाक्टर के सामने झुकना ही पड़ता है। तभी इस पेशे का समाज में विशिष्ट स्थान रहा है। कहीं किसी रूप में गुरु से भी ज्यादा। आप बड़े होकर मां-बाप के सामने भी शायद नग्न होने में शरमाएंगे, तभी तो दुर्योधन भी माता गान्धारी  के सामने निर्वस्त्र नहीं जा पाए थे। मगर डाक्टर के सामने नंगे होने में शर्म नहीं आती। यहां संपूर्ण समर्पण की भावना भी नहीं कहा जा सकता। बल्कि इसे इंसान की लाचारी के रूप में देखा जाना चाहिए। वैसे बुजुर्गों ने यह कहकर सब कुछ कह दिया कि दाई से पेट नहीं छिपाते। और फिर क्यूं छिपाएं, वह रक्षक के रूप में है हमारा शुभचिंतक है। जन्मदाता कहें भी तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

विगत दिवस एक संवदेनशील मित्र अपने डाक्टर के पास से चैकअप करा के लौटा तो बहुत दुखी था। पूछने पर बताने लगा कि डाक्टर साहब ने अब अपने क्लीनिक में महंगे-महंगे फर्नीचर, दो रिसेप्शनिस्ट, दीवार पर टंगने वाली पतली टीवी और कई सारी बड़ी-बड़ी पेंटिंग्स लगा दी है। साथ ही पूरा अस्पताल वातानुकूलित कर दिया है। सुनकर मैं हैरान हुआ था, पूछा कि इसमें परेशान होने वाली क्या बात है? यह तो अच्छी बात है। सुनकर कुछ देर तक तो वह चुप रहा मगर फिर धीमे स्वर में कह गया, इन सब खर्चे की वसूली अब हम मरीजों से की जाएगी। मैंने फिर भी डाक्टर का पक्ष लेते हुए कहा था कि ठीक तो है अगर ज्यादा फीस लेंगे तो बदले में सुविधा भी तो दे रहे हैं। दोस्त ने तुरंत कहा था कि नहीं ये बात नहीं है, ऐसा हो तो कोई मुश्किल नहीं, डर इस बात का है कि अब जबरदस्ती कई तरह के नये-नये प्रयोग मेरे शरीर पर किए जाएंगे और छोटी-छोटी सी बात को बढ़ाकर डराकर महंगे-महंगे उपचार की सलाह दी जाएगी। यह बात सुनकर मैं सोचने के लिए मजबूर हुआ था। इस अविश्वास को पूरी तरह नकार भी नहीं सकता था।

ऐसा नहीं कि सभी डाक्टर धंधा करने लग पड़े हैं मगर बहुत हद तक उपरोक्त बात सच होने लगी है। बड़े शहरों के कई बड़े-बड़े अस्पतालों का बुरा हाल है। अब ये धर्मार्थ नहीं धंधा करने लग पड़े हैं। सेवा नहीं स्वार्थ और मेवा खाने का क्षेत्र बन चुका है। दूसरी तरफ बाजार में दुकान सजाकर बैठे डाक्टरों की भी मजबूरी है। पहले तो हजारों-लाखों खर्च करके डिग्री ली फिर इतना ही खर्च कर क्लीनिक खोला। अब हर कोई महात्मा तो है नहीं। हर एक की जिंदगी है, चाहत है, परिवार है। वर्तमान समाज में समय के साथ रहना है तो पैसे तो कमाने ही होंगे। अर्थात इस पेशे को भी व्यावसायिक रूप से सफल बनाना है। इसके लिए उसे अपने आप को और अस्पताल को नया रंग-रूप देना होगा। वरना आज की चकाचौंधभरी दुनिया में सामान्य अवस्था में बैठे हुए आदमी को आदमी नहीं समझा जाता। उसे अनपढ़ गंवार यहां तक कि कम पढ़ा-लिखा घोषित कर दिया जाता है। और कोई उसके पास नहीं जाता। वहीं वातानुकूलित, अंदर घुसकर किसी कोने में बैठे हुए सूटधारी आदमी को अकसर हम बड़ा मान लेते हैं और साथ में अंग्रेजी की न समझ आने वाली दो-चार डिग्रियां साथ हों तो सोने में सुहागा हो जाता है। ऐसे में खर्च किए गए पैसे वापस कहां से आएंगे? ये सब मरीजों से ही तो मिलेगा। अंत में रोगी पैसों का ब्लैंक चेक बन जाता है। जिसे हर दूसरा डाक्टर अपने मन मुताबिक रकम भरने के लिए होड़ लगाए बैठा है।

एक और दोस्त ने एक मजेदार किस्सा सुनाया था। उसके घुटने में दर्द था। घरवालों की जिद्द पर किसी अच्छे अस्पताल में दिखाने चला गया। उसे घुटने के आपरेशन व प्रत्यारोपण की सलाह दी गई। साथ में डराया भी गया कि अगर अतिशीघ्र इलाज नहीं कराया गया तो स्थिति बिगड़ सकती है। घबराकर मित्र ने पूछताछ की तो उसे सब कुछ विस्तार में समझाया गया। आकर्षक पेम्पलेट और बुकलेट दिए गए। दोस्त का टेलीफोन नंबर नोट किया गया। यह भी बता दिया गया कि आप दो सप्ताह में आपरेशन करा लीजिए। दोस्त ने घर में आकर सब कुछ बताया तो परिवार वाले घबराए और आपरेशन की तैयारी के बारे में सोचने लगे। स्वास्थ्य को लेकर चिंता बढ़ गई तो तुरंत पैसे इकट्ठे किए जाने लगे। ऐसे में परिवार के एक सदस्य ने एक पहचान के डाक्टर से सलाह लेने का मशविरा दिया। जांच-पड़ताल करने के बाद डाक्टर ने साफ शब्दों में कह दिया कि आपरेशन की कोई आवश्यकता नहीं है। और साथ ही कुछ व्यायाम और खाने-पीने में सुधार के साथ-साथ जीवनशैली में परिवर्तन की बात कही। दोस्त ने आपरेशन के नाम से डरकर नये सुझाव पर गंभीरता से अमल किया। योगासन और दिनचर्या में परिवर्तन लाने से मित्र के स्वास्थ्य में परिवर्तन हुआ। मगर इस बीच उसी अस्पताल से हर हफ्ते फोन आते रहे। पहले हफ्‌ते उससे आने की तिथि के बारे में सुनिश्चित किया गया। और जब मरीज उस तारीख पर नहीं पहुंचा तो दूसरे हफ्ते पूछताछ के लिए फोन किया गया। मित्र द्वारा इस बार मना करने पर उसे घुटनों के पैकेज में दस प्रतिशत की छूट देने की बात की गई। इसके बावजूद न मानने पर दस दिन बाद यह छूट 15 प्रतिशत पहुंच गई और अंत में मित्र के सीधे-सपाट मना करने पर तो छूट का प्रतिशत 25 प्रतिशत तक देने के लिए फोन कॉल आते रहे।

यह एक भयावह मगर कड़वा सत्य है। ऐसा भी नहीं कि सभी मरीज पर यही तथ्य लागू होता है। कहीं-कहीं डाक्टरी परामर्श व आपरेशन आवश्यक भी हो जाता है और मरीज द्वारा अनदेखी करने से केस बिगड़ भी जाता है। मगर इससे उपरोक्त कृत्य का कुप्रभाव कम नहीं हो जाता। कुछ समय पूर्व तक पुलिस थाने और कोर्ट-कचहरी के चक्कर से आम आदमी डरा करता था। अब अस्पताल के नाम से भी भयभीत हो जाता है। बीमार आदमी वैसे ही असहाय होता है। उपर से अविश्वास का भय, उसे दोहरी मार पड़ती है। कई तो बीमारी से कम उसके बिल को देखकर अधमरे हो जाते हैं। जब कई अस्पतालों में पैसे न मिलने पर मृत शरीर को परिवारजनों को देने तक में नाटक करने के किस्से सुनने में आते हैं तो हद ही हो जाती है।

कोई भी आदमी पहली बात तो यह है कि वह बीमार होना ही नहीं चाहता। लेकिन अगर बीमार पड़ गया तो उसके पास डाक्टर के अतिरिक्त कोई और उपाय नहीं। और कुछ नहीं तो नीम-हकीम के चक्कर में पड़ जाता है। परेशान होकर अमूमन वह इनकी सलाह मान लिया करता है। इस दौरान उसके साथ की जाने वाली हर तरह की चालाकी बड़ी आसानी से सफल हो जाती है। डाक्टर की सलाह कुछ समय पूर्व तक आंख बंद करके मान ली जाती थी। मगर व्यापारीकरण के बाद से इस क्षेत्र में अब वो बात नहीं रही। अब मरीज डाक्टरों से उलझने लगे हैं, लड़ने लगे हैं, कोर्ट केस किए जाने लगे हैं। अब मरीज भी क्या करे, अजीब-अजीब किस्से-कहानियां सुनने व पढ़ने में आने लगे हैं। कई बार तो सुनकर विश्वास नहीं होता। बाएं पैर की जगह दाएं पैर का आपरेशन कर दिया जाता है और आदमी चलने-फिरने के लायक नहीं रह जाता। पैसा देकर बना हुआ डाक्टर तो और अधिक कमाने के चक्कर में लग जाता है। लोगों के जीवन से खेलता है। नकली और घटिया किस्म के कृत्रिम अंगों का व्यापार खूब फल-फूल रहा है। दवाइयों में मिलावट तो अब आम बात हो गई है। मिलावटी खाना खाकर आदी बन चुका आज का मनुष्य इस मिलावटी दवा को भी पचा जाता है और रोग ठीक नहीं होता। हां, कई बार नकली दवा का उलटा असर जरूर हो जाता है और रोगी कई बार बचने की जगह रिएक्शन से मर जाता है। बड़ी विकट समस्या आ खड़ी हुई है। छोटी-छोटी सी बीमारी में भी आदमी को परेशान कर दिया जाता है। जब भी किसी नये डाक्टर के पास मरीज जाता है तो हर डाक्टर नये सिरे से पूरे टेस्ट फिर करवाता है। अमूमन पहले के डाक्टर के द्वारा किए गए टेस्ट नहीं माने जाते। चिकित्सा के क्षेत्र में आजकल एक नेटवर्क तैयार किया जाता है जिसमें हर टेस्ट और चैकअप के लिए एक विशेषज्ञ डाक्टर अपनी पसंद का नियत रहता है। आपके अस्पताल में पहुंचते ही अप्रत्यक्ष रूप से एक पूरा गैंग आपको घेरने के लिए तैयार मिल जाएगा। बाजार में हर स्तर के अस्पताल हैं। स्टार होटलों की तरह यहां मरीज भी अपनी जेब के हिसाब से डाक्टर के पास जाता है। गोया कि मौत और बीमारी भी गरीब-अमीर की अलग होती है।

ऐसा नहीं कि यहां सकारात्मक पक्ष नहीं है। चिकित्सा जगत ने अभूतपूर्व उपलब्धियां हासिल की हैं। कई मरीजों को मरने से बचा लिया जाता है। लोगों की जीवन में खुशियां आई हैं। लेकिन फिर पैसों के लिए बिकने वाले कभी पूजनीय नहीं हो सकते। प्रेम और पैसा, इज्जत और धोखा एक साथ नहीं चल सकता। यह भी सच है कि हर मरीज को नहीं बचाया जा सकता। चिकित्सा विज्ञान और डाक्टर की भी अपनी सीमाएं हैं। लेकिन बात यहां एक विश्वास की हो रही है जिसे आखिरकार किसने तोड़ दिया? देवता और राक्षस हर युग में पाये जाते रहे हैं और देवताओं ने राक्षसों से मानवजाति की हमेशा रक्षा की है। लेकिन अगर देवता भी राक्षस का किरदार निभाने लगें तो इस समाज का विनाश सुनिश्चित है।

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मनोज सिंह
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