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भोपाल गैस कांड: 25 साल - 25 तथ्य |
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विशेष
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गुरुवार , , 03 दिसम्बर |
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3 दिसम्बर की सुबह भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड के कारखाने के पास की झुग्गी झोपंडियों के पास के पुलिस की गाड़ी निकली. गाड़ी पर लगे माइक से आवाज़ आ रही थी - घभराईए नहीं, अब स्थिति नियंत्रण में है. सब ठीक है.
लेकिन कुछ भी ठीक नहीं था. जिस समय यह घोषणा की जा रही थी उस समय हजारों लोग अपने निकट संबंधियों के मारे जाने से सकते में थे. मौतें अभी और भी होनी थी.
- भोपाल के काली मैदान स्थित यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड नामक कम्पनी "सेविन" नामक जंतुनाशक दवाई बनाती थी.
- 1969 में स्थापित इस कम्पनी में 50.9% स्वामित्व यूनियन कार्बाइड कोर्पोरेशन का था और बाकी का हिस्सा भारतीय निवेशकों का था.
- सेविन दवाई काफी लोकप्रिय थी, परंतु 80 के दशक में देश में कई बार सुखा पड़ा और इससे कृषि उत्पादन घट गया. नतीजतन कम्पनी को भी अपना उत्पादन घटाना पड़ा था.
- दुर्घटना के बाद की जाँच से पता चलता है कि कम्पनी में सुरक्षा मानकों को लेकर भयँकर अनियमितताएँ थी. खुद कम्पनी के अमेरिकी तकनीकविद मानते थे कि सुरक्षा मानक सही नहीं है.
- भोपाल गैस कांड के लिए जिम्मेदार जहरीली वायु है - मिथाइल आइसो साइनाइड.
- इस गैस के अलावा फ्रोजिन नामक गैस के रिसाव से भी इस कारखाने के कर्मचारियों के स्वास्थ्य पर विपरित प्रभाव पड़ता रहता था.
- दुर्घटना से तीन वर्ष पहले 3 दिसम्बर 1981 फ्रोजिन गैस के लीक होने से एक कर्मचारी मृत्यु को प्राप्त हुआ था. लेकिन इसके बावजूद सुरक्षा उपायों की समीक्षा में लापरवाही बरती गई.
- जनवरी 1982 को फिर से गैस रिसाव हुआ और 24 कर्मचारियों को अस्पताल ले जाया गया.
- 10 फरवरी 1982 मिथाइल आइसो साइनाइड गैस का रिसाव हुआ. 18 कर्मचारियों पर इसका प्रभाव पड़ा और उन्हें अस्पताल में भरती करवाना पड़ा.
- 5 अक्टूबर 1982 को फिर से गैस रिसाव हुआ और चेतावनी जारी करनी पड़ी. आसपास के लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया.
- जहरीली मिथाइल आइसो साइनाइड गैस को जमीन में आधी अंदर आधी बाहर ऐसी तीन टंकियों [610,611 और 619] में भरकर रखा जाता था. सुरक्षा मानक के हिसाब से हर टंकी को आधा ही भरा जाना चाहिए था.
- टंकियों में भरी जहरीली एमआईएस गैस रिसाव से बाहर ना निकल जाए इसलिए उसे शून्य डिग्री तापमान पर ठंडा रखा जाता था. ठंडा रखने के लिए टंकी के बाहर पाइपों में फ्रीओन गैस बहाई जाती थी. फ्रीओन गैस से पृथ्वी की ओजोन परत को नुकसान पहुँचता है.
- कम्पनी ने सुरक्षा मानकों की परवाह नहीं की थी. कंट्रोल रूम मात्र एक व्यक्ति के भरोसे चल रहा था.
- यदि एमआईसी गैस का रीसाव हो तो उसकी चेतावनी देने वाला अलार्म चार वर्ष से बंद पड़ा था.
- विभिन्न यंत्रों को 6 महिने के बदले 1 वर्ष में बदला जा रहा था.
- किसी भी रिसाव के समय लीक हो रही गैस को जला देने के लिए उपयुक्त फ्लेर टावर 5 महिने से बंद पड़ा था. यदि फ्लेर टावर चालू भी होता तो कोई खास फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उसकी रचना ही खामीयुक्त थी.
- वायुओं का वहन करने वाली पाइपलाइन को साफ करने वाला बोइलर प्लांट भी बंद था.
- दुर्घटना के समय 610 नम्बर की टंकी 42 टन एमआईसी के साथ ठसाठस भरी हुई थी.
- 2 दिसम्बर रात 11.30 बजे टंकियों में पानी भरने लगा. इससे टंकियों का दबाव सामान्य से 10 गुना अधिक हो गया और रिसाव होने लगा. अलार्म बजाया गया लेकिन रिसाव कम होने पर बंद कर दिया गया.
- रात 1 बजे फिर से रिसाव शुरू हुआ. इस बार गैस भारी मात्रा में बाहर निकली और कारखाने के आसपास फैलने लगी.
- रात 2 बजे के आसपास 610 नम्बर की टंकी में भारी मात्रा में पानी घुस गया. इससे हुए रिएक्शन से टंकी का तापमान 200 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो गया. टंकिया इतना तापमान सहन करने की हालत में ही नहीं थी. इससे गैस का रिसाव शुरू हुआ.
- उस समय आसपास के इलाकों के लोग आराम से नींद में सो रहे थे. नींद में सो रहे लोगों ने अचानक बैचेनी महसूस की. उनको सांस लेने में दिक्कत होने लगी. आँख और नाक जलने लगे. लोगों का चेतनातंत्र शिथिल हो गया और लोगों की समझशक्ति क्षीण हो गई. त्वचा ढीली हो गई और अंदरूनी अंग भी शिथिल हो गए.शरीर के रंगदृव्य नष्ट हो गए और सभी लोगों के शरीर सफेद पड़ गए.
- 30 हजार से अधिक लोग जहरीली गैस रिसाव से मारे गए.
- दुर्घटना का असर लम्बे काल तक रहा. बच्चों पर इसका घातक असर पडा. दुर्घटना के बाद जन्मे 14% नवजात शिशु एक माह के बाद मृत्यु को प्राप्त हुए.
- आज भी यूनियन कार्बाइड के आसपास की जमीन प्रदुषित है.
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